भारतकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५१

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५१


| वेति वसिष्ठा । वाग्मिनो हि धनवन्तो वसन्त्यतिशयेन ।<br><br>आच्छादनार्थस्य वा वसेर्वसिष्ठा । अभिभवन्ति हि वाचा वाग्मिनोऽन्यान् । तेन वसिष्ठगुणवत्परिज्ञानाद् वसिष्ठगुणो भवतीति दर्शनानुरूपं फलम् ॥ २ ॥ | बसती है, इसलिये यह वसिष्ठा है; क्योंकि जो अच्छे वक्ता धनवान् होते हैं, वे ही अतिशयतापूर्वक बसते हैं।<br><br>अथवा आच्छादनार्थक 'वस्' धातुसे 'वसिष्ठा' शब्द निष्पन्न होता है। वाक्कुशल लोग वाणीसे दूसरोंका पराभव कर देते हैं। अतः वसिष्ठगुणयुक्त पदार्थके विज्ञानसे उपासक वसिष्ठगुणवान् हो जाता है—इस प्रकार ज्ञानके अनुसार फल होता है ॥ २ ॥ |


प्रतिष्ठादृष्टिसे चक्षुकी उपासना

यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥ ३ ॥

जो प्रतिष्ठाको जानता है, वह समान देश-कालमें प्रतिष्ठित होता है और दुर्गम देश-कालमें भी प्रतिष्ठित होता है। चक्षु ही प्रतिष्ठा है। चक्षुसे ही समान और दुर्गम देश-कालमें प्रतिष्ठित होता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह समान और दुर्गममें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३ ॥


| यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठत्यनयेति प्रतिष्ठा तां प्रतिष्ठां प्रतिष्ठागुणवतीं यो वेद तस्यैतत् फलम्—प्रतितिष्ठति समे देशे काले च तथा दुर्गे विषमे च दुर्गमने च देशे दुर्भिक्षादौ वा काले विषमे। | जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है, जिससे प्रतिष्ठित होता है, उसे प्रतिष्ठा कहते हैं; उस प्रतिष्ठाको अर्थात् प्रतिष्ठागुणवती (चक्षु) को जो जानता है, उसे यह फल मिलता है कि वह समान देश और कालमें प्रतिष्ठित होता है तथा दुर्ग—विषम यानी दुर्गम्य देशमें और दुर्भिक्षादि विषम कालमें भी प्रतिष्ठित होता है। |

१२५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१२५२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

| यद्येवमुच्यतां काऽसौ प्रतिष्ठा ?<br><br>चक्षुर्वै प्रतिष्ठा । कथं चक्षुषः<br><br>प्रतिष्ठात्वम् ? इत्याह-‘चक्षुषा हि<br><br>समे च दुर्गे च दृष्ट्वा प्रतितिष्ठति’<br><br>अतोऽनुरूपं फलं प्रतितिष्ठति समे<br><br>प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं<br><br>वेदेति ॥ ३ ॥ | यदि ऐसी बात है, तो बताइये यह प्रतिष्ठा क्या है ? ( ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता है-) चक्षु ही प्रतिष्ठा है। चक्षुका प्रतिष्ठात्व कैसे है ? यह श्रुति बतलाती है-‘क्योंकि सम और विषम देश-कालमें चक्षुसे देखकर ही पुरुष प्रतिष्ठित होता है। अतः जो ऐसी उपासना करता है,उसे उसके अनुरूप यह फल मिलता है कि वह सममें प्रतिष्ठित होता है और दुर्गमें भी प्रतिष्ठित होता है ॥३॥ |

सम्पदृष्टिसे श्रोत्रकी उपासना

यो ह वै संपदं वेद सँहास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै संपच्छ्रोत्रे हीमे सर्वे वेदा अभिसंपन्नाः सँहास्मै पद्यते यं कामं कामयते य एवं वेद ॥४॥

जो सम्पदको जानता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो जाता है। श्रोत्र ही सम्पद है। श्रोत्रमें ही ये सब वेद सब प्रकार निष्पन्न हैं। जो ऐसी उपासना करता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो जाता है॥ ४॥

| यो ह वै संपदं वेद संपद्गुण-<br><br>युक्तं यो वेद तस्यैतत् फलमस्मै<br><br>विदुषे संपद्यते ह । किम् ? यं<br><br>कामं कामयते स कामः; किं पुनः<br><br>संपद्गुणकम्? श्रोत्रं वै संपत्, कथं | जो भी सम्पदको जानता है, अर्थात् सम्पदगुणवान्‌को जानता है,उसे यह फल मिलता है—उस विद्वान्‌को प्राप्त हो जाता है। क्या प्राप्त हो जाता है ? जिस भोगकी वह इच्छा करता है वह भोग। अच्छा तो, सम्पद्गुणयुक्त क्या है ? श्रोत्र ही |

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२५३ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२५३

| पुनः श्रोत्रस्य संपद्गुणत्वम् ? इत्युच्यते। श्रोत्रे सति हि यस्मात् सर्वे वेदा अभिसंपन्नाः श्रोत्रेेन्द्रियवतोऽध्येयत्वात्। वेदविहितकर्मायत्ताश्च कामास्तस्माच्छ्रोत्रं संपत् अतो विज्ञानानुरूपं फलम्; सं हास्मै पद्यते यं कामं कामयते य एवं वेद ॥ ४ ॥ | सम्पद है। किंतु श्रोत्रका सम्पद्गुणत्व किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है। श्रोत्रके रहते ही सम्पूर्ण वेद सब प्रकार निष्पन्न होते हैं, क्योंकि वे श्रोत्रेन्द्रियवान्द्वारा हो अध्ययन किये जा सकते हैं और भोग तो वेदविहित कर्मोंके ही अधीन हैं, इसलिये श्रोत्र सम्पद् है। अतः विज्ञान (उपासना) के अनुरूप ही फल मिलता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे मिल जाता है।४। |

आयतनदृष्टिसे मनकी उपासना

यो ह वा आयतनं वेदायतन ँस्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतनँ स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥ ५ ॥

जो आयतनको जानता है, वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है। मन ही आयतन है जो इस प्रकार उपासना करता है; वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है ॥ ५ ॥

| यो ह वा आयतनं वेद-आयतनमाश्रयस्तदू यो वेदायतनंस्वानां भवत्यायतनं जनानामन्येषामपि। किं पुनस्तदायतनम् इत्युच्यते-मनोवा आयतनमाश्रय इन्द्रियाणां | जो भी आयतनको जानता है-आयतन आश्रयको कहते हैं, उसे जो कोई जानता है, वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है। अच्छा तो वह आयतन क्या है? इसपर कहा जाता है-मन ही आयतन अर्थात् इन्द्रिय |

१२५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६

१२५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६


| विषयाणां च। मनआश्रिता हि विषया आत्मनो भोग्यत्वं प्रतिपद्यन्ते; मनःसंकल्पवशानि चेन्द्रियाणि प्रवर्तन्ते निवर्तन्ते च; अतो मन आयतनमिन्द्रियाणाम्। अतो दर्शनानुरूपेण फलमायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥ ५ ॥ | और विषयोंका आश्रय है। मनके आश्रित रहकर ही विषय आत्माके भोग्यत्वको प्राप्त होते हैं। मनके संकल्पके अधीन ही इन्द्रियाँ [ अपने अपने विषयोंमें] प्रवृत्त और [उनसे] निवृत्त होती हैं; अतः मन इन्द्रियोंका आयतन है। इसलिये जो ऐसी उपासना करता है, उसे इस दृष्टिके अनुरूप ही यह फल मिलता है कि वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है ॥ ५ ॥ |

प्रजातिदृष्टिसे रेतस्की उपासना

यो ह वै प्रजातिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभी रेतो वै प्रजातिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥

जो भी प्रजापतिको जानता है वह प्रजा और पशुओंद्वारा प्रजात-(वृद्धिको प्राप्त) होता है। रेतस् ही प्रजापति है। जो ऐसा जानता है, वह प्रजा और पशुओंद्वारा प्रजात होता है ॥ ६ ॥

| यो ह वै प्रजातिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभिश्च संपन्नो भवति।<br><br>रेतो वै प्रजातिः। रेतसा प्रजननेन्द्रियमुपलक्ष्यते। तद्विज्ञानानुरूपं फलं प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥ | जो प्रजातिको जानता है, वह प्रजात होता अर्थात् प्रजा और पशुओंद्वारा सम्पन्न होता है। वीर्य ही प्रजाति है। 'रेतस्' शब्दसे प्रजननेन्द्रिय उपलक्षित होती है। जो ऐसी उपासना करता है, उसे उसकी दृष्टिके अनुरूप यह फल मिलता है कि वह प्रजा और पशुओंसे प्रजात (सम्पन्न) होता है ॥ ६ ॥ |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५५

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५५


अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करते हुए वागादि प्राणोंका ब्रह्माके पास जाना और ब्रह्माद्वारा उसका निर्णय करनेके लिये एक कसौटी बताना

ते हेमे प्राणा अहँश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदँ शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७ ॥

वे ये प्राण 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रकार विवाद करते हुए ब्रह्माके पास गये। उससे बोले 'हममें कौन वसिष्ठ है?' उसने कहा, 'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर (शरीरसे अलग हो जानेपर) यह शरीर अपनेको अधिक पापी मानता है, वही तुममें वसिष्ठ है ॥ ७ ॥

ते हेमे प्राणा वागादयोऽहं श्रेयसेऽहं श्रेयानित्येतरस्मै प्रयोजनाय विवदमाना विरुद्धं वदमाना ब्रह्म जग्मुर्ब्रह्म गतवन्तो ब्रह्मशब्दवाच्यं प्रजापतिं गत्वा च तद् ब्रह्म होचुरुक्तवन्तः—को नोऽस्माकं मध्ये वसिष्ठः; कोऽस्माकं मध्ये वसति च वासयति च ?<br><br>तद् ब्रह्म तैः पृष्टं सद्धोवाचोक्तवद् यस्मिन् वो युष्माकं मध्य उत्क्रान्ते निर्गते शरीरादिदं शरीरं पूर्वस्मादतिशयेन पापीयः पापतरं मन्यते लोकः—शरीरं हि नामा-वे ये वागादि प्राण 'अहं श्रेयसे'—'मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रयोजनके लिये आपसमें विवाद करते हुए—एक दूसरेके विरुद्ध बोलते हुए ब्रह्माके पास गये। अर्थात् ब्रह्मशब्दवाच्य प्रजापतिके पास गये; उन्होंने जाकर उस ब्रह्मासे कहा—'हममें कौन वसिष्ठ है; हममेंसे कौन बसता और बसाता है?'<br><br>उनसे पूछे जानेपर वह ब्रह्मा बोला, 'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर—शरीरसे निकल जानेपर इस शरीरको लोग पहलेकी अपेक्षा अत्यन्त पापीय—अधिक पापमय (अपवित्र) मानते हैं—यों तो अनेकों अपवित्र वस्तुओंका संघात

१२५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६

१२५६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६
नेकाशुचिसंघातत्वाज्जीवतोऽपि पाप्मैव, ततोऽपिकष्टतरं यस्मिन्नुत्क्रान्ते भवति; वैराग्यार्थमिदमुच्यते—पापीय इति; स वो युष्माकं मध्ये वसिष्ठो भविष्यति। जानन्नपि वसिष्ठं प्रजापतिर्नोवाचायं वसिष्ठ इतीतरेषामप्रियपरिहाराय ॥ ७॥होनेके कारण जीवित पुरुषका भी शरीर पापमय ही है, किंतु जिसके उत्क्रमण करनेपर यह उससे भी अधिक कष्टतर (दुर्दशाग्रस्त) हो जाय वही तुममेंसे वसिष्ठ होगा।' 'पापीय:' यह बात वैराग्यके लिये कही गयी है। प्रजापतिने वसिष्ठको जानते हुए भी दूसरोंको अप्रिय न लगे इसके लिये 'यह वसिष्ठ है' ऐसा [स्पष्ट] नहीं कहा ॥ ७॥

अपनी उत्कृष्ट्ताकी परीक्षाके लिये वाक्‌का उत्क्रमण और पुनः प्रवेश

त एवमुक्ता ब्रह्मणा प्राणा आत्मनो वीर्यपरीक्षणाय क्रमेणोच्चक्रमुः; तत्र—ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उन प्राणोंने अपने पराक्रमकी परीक्षा करनेके लिये क्रमशः उत्क्रमण करना आरम्भ किया; उनमेंसे—

वाघोच्‍चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत महते जीवितुमिति ते होचुर्यथाकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वाँसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥

[पहले] वाक्‌ने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्षतक बाहर रहकर लौटकर कहा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके थे?' यह सुनकर उन्होंने कहा, 'जैसे मूक पुरुष वाणीसे न बोलते हुए भी प्राणसे प्राणक्रिया करते, नेत्रसे देखते, श्रोत्रसे सुनते, मनसे जानते और रेतस्‌से प्रजा

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५७

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५७

( सन्तान ) की उत्पत्ति करते हुए [ जीवित रहते हैं ], वैसे ही हम जीवित रहे।' यह सुनकर वाक्‌ने शरीरमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥

वागेव प्रथमं हास्माच्छरीरादुच्चक्रामोत्क्रान्तवती । सा चोत्क्रम्य संवत्सरं प्रोष्य प्रोषिता भूत्वा पुनरागत्योवाच—कथमशकत शक्तवन्तो यूयं मदृते मां बिना जीवितुमिति ? <br><br> त एवमुक्ता ऊचुर्यथा लोकेऽकला मूका अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणनव्यापारं कुर्वन्तः प्राणेन पश्यन्तो दर्शनव्यापारं चक्षुषा कुर्वन्तस्तथा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा कार्याकार्यादिविषयं प्रजायमाना रेतसा पुत्रानुत्पादयन्त एवमजीविषम वयमित्येवं प्राणैर्दत्तोत्तरा वागात्मनोऽस्मिन्नवसिष्ठत्वं बुद्ध्वा प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥पहले वाक्‌ने ही इस शरीरसे उत्क्रमण किया । उसने उत्क्रमण कर एक वर्ष बाहर रहकर फिर लौटकर कहा, 'तुमलोग मेरे बिना किस प्रकार जीवित रह सके थे ?' <br><br> उससे इस प्रकार कहे जानेपर वे बोले, 'जिस प्रकार लोकमें अकल अर्थात् मूक पुरुष वाणीसे न बोलते हुए प्राणसे प्राणन अर्थात् प्राणव्यापार करते हुए, नेत्रसे देखते—दर्शनव्यापार करते हुए, इसी प्रकार श्रोत्रसे सुनते हुए, मनसे कार्याकार्यादि विषयको जानते हुए और वीर्यसे प्रजनन अर्थात् पुत्रादिकी उत्पत्ति करते हुए [जीवित रहते हैं], उसी प्रकार हम भी जीवित रहे; प्राणोंसे ऐसा उत्तर पाकर वाक्‌ने अपनेको वसिष्ठ न समझकर इस शरीरमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥

चक्षुका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश

चक्षुर्होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथान्धा अपश्यन्तश्चक्षुषा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः

१२५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१२५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

श्रोत्रेण विद्वाꣳसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजी-
विष्मेति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥

चक्षुने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले—'जिस प्रकार अन्धे लोग नेत्रसे न देखते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, श्रोत्रसे सुनते, मनसे जानते और रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न करते हुए [जीवित रहते हैं], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर चक्षुने प्रवेश किया ॥ ९ ॥

श्रोत्रका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश

श्रोत्रꣳ होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्यागत्यो-
वाच कथमशकत महते जीवितुमिति ते होचुर्यथा
बधिरा अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो
वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वाꣳसो मनसा प्रजायमाना
रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥

श्रोत्रने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले—'जिस प्रकार बहरे आदमी कानोंसे न सुनते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, मनसे जानते और रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न करते हुए [जीवित रहते हैं], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर श्रोत्रने प्रवेश किया ॥ १० ॥

मनका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश

मनो होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच
कथमशकत महते जीवितुमिति ते होचुर्यथा मुग्धा अवि-
द्वाꣳसो मनसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्त-

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५९

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५९


इच्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजी- विष्मेति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥

मनने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले, 'जिस प्रकार मुग्ध पुरुष मनसे न समझते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, कानसे सुनते और रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न करते हुए [ जीवित रहते हैं ], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर मनने शरीरमें प्रवेश किया ॥ ११ ॥

रेतस्‌का उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश

रेतो होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा क्लीबा अप्रजायमाना रेतसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वाꣳसो मनसैवम- जीविष्मेति प्रविवेश ह रेतः ॥ १२ ॥

रेतस्‌ने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर फिर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले, 'जिस प्रकार नपुंसक लोग रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न न करते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, श्रोत्रसे सुनते और मनसे जानते हुए [ जीवित रहते हैं ], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर वीर्यने शरीरमें प्रवेश किया ॥ १२ ॥

| तथा चक्षुर्होच्चक्रामेत्यादि पूर्ववत् । श्रोत्रं मनः प्रजातिरिति ॥ ९—१२ ॥ | इसी प्रकार चक्षुर्होच्चक्राम' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है। अबतक श्रोत्र, मन, प्रजाति [रेतस्] इत्यादिने उत्क्रमण किया ॥ ९—१२ ॥ |

१२६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१२६०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

प्राणके उत्क्रमण करते ही अन्य इन्द्रियोंका विचलित हो जाना और उसकी श्रेष्ठता स्वीकार करना

अथ ह प्राण उत्क्रमिष्यन् यथा महासुहयः सैन्धवः पड्वीशशङ्कून् संवृहेदेवँ हैवेमान् प्राणान् संववर्ह ते होचुर्मा भगव उत्क्रमीर्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति तस्यो मे बलिं कुरुतेति तथेति ॥ १३ ॥

फिर प्राण उत्क्रमण करने लगा, तो जिस प्रकार सिन्धुदेशीय महान् अश्व पैर बांधनेके खूँटोंको उखाड़ डालता है, उसी प्रकार वह इन सब प्राणोंको स्थानच्युत करने लगा। उन्होंने कहा, 'भगवन् ! आप उत्क्रमण न करें, आपके बिना हम जीवित नहीं रह सकते।' प्राणने कहा, 'अच्छा तो मुझे बलि (भेंट) दिया करो।' [अन्य इन्द्रियोंने कहा—] 'बहुत अच्छा' ॥ १३ ॥

अथ ह प्राण उत्क्रमिष्यन्नु-फिर प्राण 'उत्क्रमिष्यन्'—
त्क्रमणं करिष्यंस्तदानीमेव स्वस्था-उत्क्रमण करने लगा। उसी समय
नात् प्रचलिता वागादयः।वागादि प्राण अपने स्थानसे
किमिव ? इत्याह—यथा लोकेचलायमान हो गये। किसके
महांश्चासौ सुहयश्च महासुहयःसमान ? यह बतलाते हैं—जिस
शोभनो हयो लक्षणोपेतो महान्प्रकार लोकमें महासुहयः—जो
परिमाणतः सिन्धुदेशे भवःमहान् हो और सुहय—शोभन हय
सैन्धवोऽभिजनतः पड्वीशशङ्-अर्थात् सुलक्षण-सम्पन्न अश्व
कून् पादबन्धनशङ्कून् पड्वी-(घोड़ा) हो तथा परिमाणतः महान्
शाश्च ते शङ्कवश्च तान् संवृहे-हो एवं सैन्धव'—सिन्धुदेशमें उत्पन्न
हुआ अर्थात् उत्तम जातिका हो, वह
जिस प्रकार परीक्षाके लिये सवारके
चढ़ते ही पड्वीश शङ्कुओंको—पैर
बाँधनेके खूँटोंको—जो पड्वीश हों
और शङ्कु हों, उनको संवृहेत्—

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | १२६१ |

ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थे१२६१
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-भाषार्थ
दुष्टच्छेद्युगपदुत्खनेदश्वारोह आरूढे परीक्षणाय; एवं हैवेमान् वागादीन् प्राणान् संववर्होत्खतवान् स्वस्थानाद् अंशितवान् ।उखाड़ डालता है; इसी प्रकार उसने इन वागादि प्राणोंको 'संवर्ह'—उखाड़ दिया—अपने स्थानसे विचलित कर दिया।
ते वागादयो होचुर्ह भगवो भगवन् मोत्क्रमीर्यस्मान्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते त्वां विना जीवितुमिति । यद्येवं मम श्रेष्ठता विज्ञाता भवद्भिरहमत्र श्रेष्ठस्तस्य उ मे मम बलिं करं कुरुत करं प्रयच्छतेति ।उन वागादिने कहा, 'हे भगवन्! आप उत्क्रमण न करें; क्योंकि आपके बिना हम जीवित नहीं रह सकते।' [ प्राण बोला—] 'यदि ऐसी बात है तो तुमलोगोंको मेरी श्रेष्ठताका पता लग गया; यहाँ मैं ही श्रेष्ठ हूँ। अतः उस मुझको तुमलोग बलि दिया करो अर्थात् कर (भेंट) दिया करो।
अयं च प्राणसंवादः कल्पितो विदुषः श्रेष्ठपरीक्षणप्रकारोपदेशः । अनेन हि प्रकारेण विद्वान् को नु खल्वत्र श्रेष्ठ इति परीक्षणं करोति । स एष परीक्षणप्रकारः संवादभूतः कथ्यते; न ह्यन्यथा संहत्यकारिणां सतामेषामञ्जसैव संवत्सरमात्रमेवैकैकस्य निर्गमनाद्युपपद्यते । तस्माद् विद्वानेवानेन प्रकारेण विचारयति वागादीनां प्रधानबुभुत्सुरुपासनाय । बलिं प्रार्थिताः सन्तः प्राणास्तथेति प्रतिज्ञातवन्तः ॥ १३ ॥यह प्राणसंवाद कल्पित है, इससे विद्वान्के लिये श्रेष्ठ पुरुषकी परीक्षा करनेके प्रकारका उपदेश दिया गया है। इसी प्रकार विद्वान् 'यहाँ श्रेष्ठ कौन है?' इसकी परीक्षा करता है। वह यह परीक्षाका प्रकार संवादरूपसे कहा गया है; नहीं तो इन मिलकर कार्य करनेवाले वागादिका एक-एक करके एक-एक वर्षतक साक्षात्रूपसे बाहर निकलना आदि सम्भव नहीं है। अतः वागादिमेंसे प्रधानको जाननेकी इच्छावाला उपासक ही उपासनाके लिये इस प्रकार विचार करता है। प्राणद्वारा बलि माँगे जानेपर वागादि प्राणोंने 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर प्रतिज्ञा की ॥ १३ ॥

१२६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६

१२६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६

वागादिकृत प्राणकी स्तुति और उसे अन्न तथा वस्त्र-प्रदान

सा ह वागुवाच यद् वा अहं वसिष्ठास्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति यद् वा अहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसीति चक्षुर्यद् वा अहँ संपदस्मि त्वं तत् संपदसीति श्रोत्रं यद् वा अहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति मनो यद् वा अहं प्रजातिरस्मि त्वं तत्प्रजातिरसीति रेतस्तस्यो मे किमन्नं किं वास इति यदिदं किञ्चाश्वभ्य आ कृमिभ्य आ कीटपतङ्गेभ्यस्तत्तेऽन्नमापो वास इति न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्नं प्रतिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नं वेद तद्विद्वाँ सः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वाचामन्त्येतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते ॥ १४ ॥

उस वागिन्द्रियने कहा, 'मैं जो वसिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस वसिष्ठ गुणसे युक्त हो।' 'मैं जो प्रतिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस प्रतिष्ठासे युक्त हो' ऐसा नेत्रने कहा। 'मैं जो सम्पद् हूँ, सो तुम ही उस सम्पद्से युक्त हो' ऐसा श्रोत्रने कहा। 'मैं जो आयतन हूँ, सो तुम्हीं वह आयतन हो' ऐसा मनने कहा। 'मैं जो प्रजाति हूँ, सो तुम ही उस प्रजातिसे युक्त हो' ऐसा रेतस्ने कहा। [ प्राणने कहा—] 'किंतु ऐसे गुणोंसे युक्त होनेपर मेरा अन्न क्या है और वस्त्र क्या है?' [ वागादि बोले—] 'कुत्ते, कृमि और कीट-पतङ्गोंसे लेकर यह जो कुछ भी है, वह सब तेरा अन्न है और जल ही वस्त्र है।' [ उपासनाका फल —] 'जो इस प्रकार प्राणके अन्नको जानता है, उसके द्वारा अभक्ष्यभक्षण नहीं होता और अभक्ष्यका प्रतिग्रह (संग्रह) भी नहीं होता। ऐसा जाननेवाले श्रोत्रिय भोजन करनेसे पूर्व आचमन करते हैं तथा भोजन करके आचमन करते हैं। इसीको वे उस प्राणको अनग्न करना मानते हैं ॥ १४ ॥

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२६३

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२६३


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
सा ह वाक् प्रथमं बलिदानाय प्रवृत्ता ह किलोवाचोक्तवती यद् वा अहं वसिष्ठास्मि यन्मम वसिष्ठत्वं तत्तवैव तेन वसिष्ठगुणेन त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति । यद् वा अहं प्रतिष्ठास्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसि या मम प्रतिष्ठा सा त्वमसीति चक्षुः । समानमन्यत्; संपदायतनप्रजातित्वगुणान् क्रमेण समर्पितवन्तः ।प्रथम बलि देनेके लिये प्रवृत्त हुई उस वागिन्द्रियने कहा, 'मैं जो वसिष्ठा हूँ-मेरा जो वसिष्ठत्व है, वह तुम्हारा ही है अर्थात् उस वसिष्ठत्वरूप गुणसे तुम्हीं वह वसिष्ठ हो।' 'और मैं जो प्रतिष्ठा हूँ; वह प्रतिष्ठा तुम्हीं हो, अर्थात् मेरी जो प्रतिष्ठा है वह तुम हो' ऐसा चक्षुने कहा। शेष अर्थ इसीके समान है। उन्होंने अपने सम्पद, आयतन और प्रजातित्व गुणोंको क्रमशः प्राणको समर्पित किया।
यद्येवं साधु बलिं दत्तवन्तो भवन्तो ब्रूत तस्य उ म एवं-गुणविशिष्टस्य किमन्नं किं वास इति ? आहुरितरे—यदिदं लोके किञ्च किञ्चिदन्नं नामापि—आ श्वभ्य आ कृमिभ्य आ कीटपतङ्गेभ्यः, यच्च श्वान्नं कृम्यन्नं कीटपतङ्गान्नं च तेन सह सर्वमेव यत् किञ्चित् प्राणिभिरद्यमानमन्नं तत् सर्वं तवान्नम्, सर्वं प्राणस्यान्नमिति दृष्टिरत्र विधीयते ।[ प्राण बोला—] 'यदि ऐसी बात है तो तुमलोगोंने अच्छी भेंट दी। अब यह बताओ कि उस ऐसे गुणवाले मेरा अन्न क्या है और वस्त्र क्या है?' अन्य प्राणोंने कहा, 'लोकमें कुत्ते, कृमि और कीट-पतङ्गादिसे लेकर जितना भी अन्न है, जो भी कुत्तेका अन्न, कृमिका अन्न और कीट-पतङ्गोंका अन्न है, उसके सहित प्राणियोंद्वारा भक्षण किया जानेवाला जितना अन्न है, वह सभी तुम्हारा अन्न है।' यहाँ 'यह सब प्राणका अन्न है' ऐसी दृष्टिका विधान किया जाता है।

१२६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१२६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

| केचित्तु सर्वभक्षणे दोषाभावं वदन्ति प्राणान्नविदः; तदसत्; शास्त्रान्तरेण प्रतिषिद्धत्वात्। तेनास्य विकल्प इति चेत्? न; अविधायकत्वात्; न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवतीति सर्वं प्राणस्यान्नमित्येतस्य विज्ञानस्य विहितस्य स्तुत्यर्थमेतत्; तेनैकवाक्यतापत्तेः। न तु शास्त्रान्तरविहितस्य बाधने सामर्थ्यमन्यपरत्वादस्य; प्राणमात्रस्य सर्वमन्नमित्येतद्दर्शनमिह विधित्सितं न तु सर्वं भक्षयेदिति। | कोई-कोई तो कहते हैं कि प्राणोपासकको सर्वभक्षणमें दोष नहीं है, किंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि अन्य शास्त्र इसका निषेध करते हैं। यदि उन शास्त्रोंसे इसका विकल्प माना जाय तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यह वाक्य विधान करनेवाला नहीं है; 'इसके द्वारा अभक्ष्य भक्षण नही किया जाता' यह आगेका वाक्य 'सब प्राणका ही अन्न है' इस प्रकार विधान किये गये विज्ञानकी स्तुतिके लिये है; क्योंकि उसके साथ इसकी एकवाक्यता सम्भव है। शास्त्रान्तरद्वारा विहित अर्थका बाध करनेमें इसकी सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि यह वाक्य अन्यपरक है। यहाँ तो इसी दृष्टिका विधान करना अभीष्ट है कि सब अन्न अकेले प्राणका ही है, यह बतलाना अपेक्षित नहीं कि सब कुछ खा ले। | | यत्तु सर्वभक्षणे दोषाभावज्ञानं तन्मिथ्यैव प्रमाणाभावात्। | जो ऐसा कहते हैं, कि इससे सर्वभक्षणमें दोषाभावका ज्ञान होता है; उनका वह कथन कोई प्रमाण न होनेके कारण मिथ्या ही है। | | विदुषः प्राणत्वात् सर्वान्नोपपत्तेः सामर्थ्याददोष एवेति चेत्? न; | यदि कोई कहे कि प्राणरूप होनेके कारण प्राणोपासकका सभी अन्न हो सकता है, सामर्थ्य होनेके कारण इसमें कोई दोष है ही नहीं, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२६५

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२६५


शाङ्करभाष्यम्शाङ्करभाष्यार्थ
अशेषान्नत्वानुपपत्तेः । सत्यं यद्यपि विद्वान् प्राणो येन कार्यकारणसंघातेन विशिष्टस्य विद्वत्ता तेन कार्यकारणसंघातेन कृमिकीटदेवाद्यशेषान्नभक्षणं नोपपद्यते ।<br><br>तेन तत्राशेषान्नभक्षणे दोषाभावज्ञापनमनर्थकम्; अप्राप्तत्वादशेषान्नभक्षणदोषस्य ।सब कुछ उसका अन्न होना सम्भव नहीं है । यद्यपि यह सत्य है कि विद्वान् प्राण ही है, तो भी जिस देहेन्द्रियसंघातसे विशिष्ट पुरुषकी विद्वत्ता स्वीकार की जाती है, उस देहेन्द्रियसंघातद्वारा कृमि, कीट एवं देवादि—इन सभीके अन्नोंको भक्षण करना उसके लिये सम्भव नहीं है । इसलिये उसके लिये सर्वान्नभक्षणमें दोषाभाव दिखलाना व्यर्थ है; क्योंकि उसके प्रति सर्वान्नभक्षणरूप दोष तो प्राप्त ही नहीं होता ।
ननु प्राणः सन् भक्षयत्येव कृमिकीटाद्यन्नमपि । बाढम्; किंतु न तद्विषयः प्रतिषेधोऽस्ति; तस्माद् दैवरक्तं किंशुकम्, तत्र दोषाभावः । अतस्तद्रूपेण दोषाभावज्ञापनमनर्थकम्; अप्राप्तत्वादशेषान्नभक्षणदोषस्य; येन तु कार्यकारणसंघातसंबन्धेन प्रतिषेधः क्रियते तत्संबन्धेन त्विह नैव प्रतिप्रसवोऽस्ति; तस्मात्तत्प्रति-किंतु प्राणरूपसे तो वह कृमिकीटादिके अन्नको भी भक्षण करता ही है । ठीक है, किंतु उस प्राणके विषयमें तो कहीं प्रतिषेध नहीं किया गया । इसलिये यदि पलाशके फूलको देवने ही लाल बना दिया है तो उसमें कोई दोष नहीं है । अतः प्राणरूपसे उसके दोषाभावको बतलाना व्यर्थ है, क्योंकि उसमें तो सर्वान्नभक्षणरूप दोष प्राप्त ही नहीं होता; जिस कार्यकारणसंघातके सम्बन्धसे प्रतिषेध किया जाता है; उसका सम्बन्ध रहनेके कारण तो यहाँ (प्राणवेत्ताके विषयमें) उस प्रतिषेधका प्रतिप्रसव¹ हो ही नहीं सकता ।

१. निषेधको बाध करके विधिका अनुमोदन करना प्रतिप्रसव कहलाता है ।

बृ० उ० ८०—

१२६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१२६६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६
संस्कृतहिन्दी
षेधातिक्रमे दोष एव स्यादन्यविषयत्वान्न ह वा इत्यादेः।इसलिये उस प्रतिषेधका अतिक्रमण करनेसे तो दोष ही होगा, क्योंकि 'न ह वा' इत्यादि आगेके वाक्यका विषय दूसरा [यानी प्राण] ही है।
न च ब्राह्मणादिशरीरस्य सर्वान्नत्वदर्शनमिह विधीयते, किंतु प्राणमात्रस्यैव। यथा च सामान्येन सर्वान्नस्य प्राणस्य किञ्चिदन्नजातं कस्यचिज्जीवनहेतुः, यथा विषं विषजस्य कृमेः, तदेवान्यस्य प्राणान्नमपि सद् दृष्टमेव दोषमुत्पादयति मरणादिलक्षणम्। तथा सर्वान्नस्यापि प्राणस्य प्रतिषिद्धान्नभक्षणे ब्राह्मणत्वादिदेहसंबन्धाद्दोष एव स्यात्; तस्मान्मिथ्याज्ञानमेवाभक्ष्यभक्षणे दोषाभावज्ञानम्।इसके सिवा यहाँ ब्राह्मणादि शरीरकी सर्वान्नत्व-दृष्टिका विधान भी नहीं किया जाता, किंतु केवल प्राणमात्रकी सर्वान्नत्वदृष्टि बतलायी गयी है। जिस प्रकार सामान्यरूपसे सर्वान्नप्राणका कोई अन्नसमूह किसीके जीवनका हेतु होता है, जैसे कि विषसे उत्पन्न हुए कीड़ेके लिये विष, किंतु वही दूसरेका प्राणान्न होनेपर भी उसके लिये मरणादिरूप प्रत्यक्ष दोष उत्पन्न कर देता है। इसी प्रकार सर्वान्नभक्षी प्राणको भी ब्राह्मणादिदेहका सम्बन्ध होनेके कारण प्रतिषिद्ध अन्न भक्षण करनेमें दोष ही होगा। अतः अभक्ष्यभक्षणमें दोषाभावका ज्ञान होना मिथ्या ज्ञान ही है।
आपो वास इति; आपोभक्ष्यमाणा वासःस्थानीयास्तव; अत्र च प्राणस्यापो वास इत्येतद् दर्शनं विधीयते; न तु वासःकार्य आपो विनियोक्तुं शक्याः। तस्माद् यथाप्राप्तेऽब्भक्षणे दर्शनमात्रं कर्तव्यम्।'आपो वासः' इत्यादि, भक्षण किया जाता हुआ जल तुम्हारा वस्त्रस्थानीय है। यहाँ जल प्राणका वस्त्र है—इस दृष्टिका विधानमात्र किया गया है। वस्त्रके काममें जलका उपयोग नहीं किया जा सकता। अतः यथाप्राप्त जलपानमें केवल ऐसी दृष्टिमात्र ही करनी चाहिये।

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ १२६७

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ १२६७


संस्कृतहिन्दी
न ह वा अस्य सर्वं प्राणस्यान्नमित्येवंविदोऽनन्नमनदनीयं जग्धं भुक्तं न भवति ह; यद्यप्यनेनानदनीयं भुक्तमदनीयमेव भुक्तं स्यान्न तु तत्कृतदोषेण लिप्यते, इत्येतद् विद्यास्तुतिरित्यवोचाम; तथा नानन्नं प्रतिगृहीतं यद्यप्यप्रतिग्राह्यं हस्त्यादि प्रतिगृहीतं स्यात्, तदप्यन्नमेव प्रतिग्राह्यं प्रतिगृहीतं स्यात् । तत्राप्यप्रतिग्राह्यप्रतिग्रहदोषेण न लिप्यत इति स्तुत्यर्थमेव ।इस प्रकार जाननेवाले अर्थात् सब प्राणका अन्न है—ऐसा जाननेवाले इस विद्वान्से अनन्न—अभक्ष्य नहीं भक्षण किया जाता । यदि यह कोई अभक्ष्य खा ले तो भी इससे भक्ष्य ही खाया गया है, यह उससे होनेवाले दोषसे लिप्त नहीं होता--इस प्रकार यह इस विद्याकी स्तुति है--ऐसा हम पहले कह चुके हैं। इस प्रकार इसके द्वारा अनन्नका प्रतिग्रह भी नहीं होता, यद्यपि यह दानमें नहीं लेनेयोग्य हाथी आदिको भी ग्रहण करे तो वह भी अन्न यानी लेनेयोग्य वस्तुका ही प्रतिग्रह ( ग्रहण ) होगा । वहाँ भी 'यह अप्रतिग्राह्यके प्रतिग्रहरूप दोषसे लिप्त नहीं होता' इस प्रकार यह वाक्य स्तुतिके लिये ही है।
य एवमेतदनस्य प्राणस्यान्नं वेद, फलं तु प्राणात्मभाव एव । न त्वेतत्फलाभिप्रायेण, किं तर्हि ? स्तुत्यभिप्रायेणेति । नन्वेतदेव फलं कस्मान्न भवति ? न, प्राणात्मदर्शिनः प्राणात्मभाव एव फलम् ।जो इस प्रकार इस अन अर्थात् प्राणके अन्नको जानता है, उसे प्राणात्मभावरूप फल ही मिलता है। यह कथन इस फलके अभिप्रायसे नहीं है, तो किसलिये है । स्तुतिके अभिप्रायसे । [ प्रश्न-] किंतु यही इसका फल क्यों नहीं होता । [ उत्तर--]नहीं, प्राणात्मदर्शीका फल तो प्राणात्मभाव ही है। उस

१. अर्थात् नहीं लेने योग्य वस्तुके लेने रूप दोषसे ।

| १२६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |

१२६८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६
संस्कृतहिन्दी
तत्र च प्राणात्मभूतस्य सर्वात्मनोऽनदनीयमप्याद्यमेव; तथाप्रतिग्राह्यमपि प्रतिग्राह्यमेवेति यथाप्राप्तमेवोपादाय विद्या स्तूयते अतो नैव फलविधिसरूपता वाक्यस्य ।अवस्था में प्राणात्मभावको प्राप्त हुए इस सर्वात्माका अभक्ष्य भी भक्ष्य ही है तथा अप्रतिग्राह्य भी प्रतिग्राह्य ही है—इस प्रकार यथाप्राप्त स्थितिको ही लेकर इस उपासनाकी स्तुति की जाती है। अतः इस वाक्यकी फलविधिसरूपता नहीं है।
यस्मादापो वासः प्राणस्य, तस्माद् विद्वांसो ब्राह्मणाःश्रोत्रिया अधीतवेदा अशिष्यन्तो भोक्ष्यमाणो आचामन्त्योऽशित्वाचामन्ति भुक्त्वा चोत्तरकालमपो भक्षयन्ति । तत्र तेषामाचमतां कोऽभिप्रायः ? इत्याह—एतमेवानं प्राणमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते । अस्ति चैतद् यो यस्मै वासो ददाति स तमनग्नं करोमीति हि मन्यते; प्राणस्य चापो वास इति ह्युक्तम्; यदपः पिबामि तत् प्राणस्य वासो ददामीति विज्ञानं कर्तव्यमित्येवमर्थमेतत् ।क्योंकि जल प्राणका वस्त्र है, इसलिये श्रोत्रिय--जिन्होंने वेदाध्ययन किया है वे विद्वान् ब्राह्मण जब अशन अर्थात् भोजन करनेको होते हैं तो पहले जलका आचमन करते हैं तथा अशन करके भी आचमन करते हैं अर्थात् भोजन करके उसके पीछे भी जल पीते हैं। वहाँ उनके जलपान करनेका क्या अभिप्राय होता है। सो श्रुति बतलाती है--वे इस प्राणको ही हम अनग्न कर रहे हैं--ऐसा मानते हैं। यह बात प्रसिद्ध है कि जो जिसको वस्त्र देता है, वह 'उसे मैं अनग्न कर रहा हूँ' ऐसा मानता है। प्राणका वस्त्र जल है--यह तो कहा ही जा चुका है। अतः यह उपदेश इसलिये है कि 'मैं जो जल पीता हूँ वह प्राणको वस्त्र देता हूँ'--ऐसी दृष्टि करनी चाहिये।
ननु भोक्ष्यमाणो भुक्तवांश्च प्रयतो भविष्यामीत्याचामति; तत्र-शङ्का-किंतु भोजन करनेवाला तथा भोजन कर चुकनेवाला मनुष्य तो इसलिये आचमन करता है कि मैं आचमन करनेसे पवित्र हो जाऊँगा,

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ १२६९

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ १२६९

संस्कृतहिन्दी
च प्राणस्यानग्नताकरणार्थत्वे च द्विकार्यताचमनस्य स्यात्; न च कार्यद्वयमाचमनस्यैकस्य युक्तम्, यदि प्रायत्यार्थं नानग्नतार्थम्, अथानग्नतार्थं न प्रायत्यार्थम् । यस्मादेवम्, तस्माद् द्वितीयमाचमनान्तरं प्राणस्यानग्नताकरणाय भवतु ।वहाँ यदि प्राण को अनग्न करना (वस्त्र देना) उद्देश्य रहे तो उस आचमनके दो कार्य हो जायंगे; किंतु एक ही आचमनके दो कार्य होने उचित नहीं हैं! यदि वह शुद्धिके लिये होगा तो प्राणकी अनग्नताके लिये नहीं हो सकता और यदि प्राणकी अनग्नताके लिये होगा तो शुद्धिके लिये नहीं हो सकता। चूँकि ऐसा है, इसलिये दूसरा आचमन प्राणकी अनग्नताके लिये हो सकता है।
न, क्रियाद्वित्वोपपत्तेः । द्वे ह्येते क्रिये भोक्ष्यमाणस्य भुक्तवतश्च यदाचमनं स्मृतिविहितं तत् प्रायत्यार्थं भवति क्रियामात्रमेव न तु तत्र प्रायत्यं दर्शनाद्यपेक्षते । तत्र चाचमनाङ्गभूतास्वप्सु वासोविज्ञानं प्राणस्येतिकर्तव्यतया चोद्यते, न तु तस्मिन् क्रियमाणे आचमनस्य प्रायत्यार्थता बाध्यते, क्रियान्तरत्वादाचमनस्य । तस्माद्समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि दो क्रियाओंका होना युक्तिसंगत है। ये दोनों ही क्रियाएँ होती हैं, भोजन करनेवाले और भोजन कर चुकनेवालेका जो स्मृतिविहित आचमन होता है वह केवल क्रियामात्र और शुद्धिके लिये ही होता है, उसमें शुद्धिको किसी दृष्टि आदिकी अपेक्षा नहीं है। वहाँ आचमनके अङ्गभूत जलमें प्राणके वस्त्रविज्ञानका तो इतिकर्त्तव्यतारूपसे विधान किया जाता है, उसके करनेपर आचमनकी शुद्ध्यर्थताका बाध होता हो—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि आचमन तो दूसरी

१२७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६

१२७०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

| भोक्ष्यमाणस्य भुक्तवतश्च यदाचमनं तत्रापो वासः प्राणस्येति दर्शनमात्रं विधीयते, अप्राप्तत्वादिन्यतः ॥ १४ ॥ | ही क्रिया है। अतः भोजन करनेवाले और भोजन कर चुकनेवालेका जो आचमन है, उसमें 'जल प्राणका वस्त्र है' ऐसी दृष्टिमात्रका विधान किया जाता है, क्योंकि किसी अन्य प्रमाणसे इसकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १४ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये प्रथमं प्राणसंवादब्राह्मणम् ॥१॥


द्वितीय ब्राह्मण

| [प्रकरण-सम्बन्धः] श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेय इत्यस्य सम्बन्धः—खिलाधिकारोऽयम्, तत्र यदनुक्तं तदुच्यते। सप्तमाध्यायान्ते ज्ञानकर्मसमुच्चयकारिणाऽग्नेर्मार्गयाचनं कृतम्—अग्ने नय सुपथेति। तत्रानेकेषां पथां सद्भावो मन्त्रेण सामर्थ्यात् प्रदर्शितः; सुपथेति विशेषणात्। पन्थानश्च कृतविपाकप्रतिपत्तिमार्गाः। वक्ष्यति च—यत् कृत्वेत्यादि। | 'श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः' इत्यादि इस ब्राह्मणका सम्बन्ध इस प्रकार है। यह खिलप्रकरण है। इसमें पहले जो नहीं कहा गया, वह बतलाया जाता है। सप्तम (उपनिषद्के पञ्चम) अध्यायके अन्तमें ज्ञानकर्मसमुच्चयकारी पुरुषके द्वारा 'अग्ने नय सुपथा'—इत्यादि मन्त्रद्वारा अग्निसे देवयान मार्गकी याचना की गयी है। वहाँ उस मन्त्रद्वारा सामर्थ्यसे अनेक मार्गोंकी सत्ता प्रदर्शित होती है; क्योंकि उसमें 'सुपथा' ऐसा विशेषण दिया गया है। और 'पथ' किये हुए कर्मोंके फलभोगके मार्गोंका नाम है। यह बात श्रुति 'यत् कृत्वा'<sup></sup> इत्यादि मन्त्रसे कहेगी भी। |


१. इसी ब्राह्मणका दूसरा मन्त्र।