बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1270, कुल 1402 में से
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| १२५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| नेकाशुचिसंघातत्वाज्जीवतोऽपि पाप्मैव, ततोऽपिकष्टतरं यस्मिन्नुत्क्रान्ते भवति; वैराग्यार्थमिदमुच्यते—पापीय इति; स वो युष्माकं मध्ये वसिष्ठो भविष्यति। जानन्नपि वसिष्ठं प्रजापतिर्नोवाचायं वसिष्ठ इतीतरेषामप्रियपरिहाराय ॥ ७॥ | होनेके कारण जीवित पुरुषका भी शरीर पापमय ही है, किंतु जिसके उत्क्रमण करनेपर यह उससे भी अधिक कष्टतर (दुर्दशाग्रस्त) हो जाय वही तुममेंसे वसिष्ठ होगा।' 'पापीय:' यह बात वैराग्यके लिये कही गयी है। प्रजापतिने वसिष्ठको जानते हुए भी दूसरोंको अप्रिय न लगे इसके लिये 'यह वसिष्ठ है' ऐसा [स्पष्ट] नहीं कहा ॥ ७॥ |
अपनी उत्कृष्ट्ताकी परीक्षाके लिये वाक्का उत्क्रमण और पुनः प्रवेश
| त एवमुक्ता ब्रह्मणा प्राणा आत्मनो वीर्यपरीक्षणाय क्रमेणोच्चक्रमुः; तत्र— | ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उन प्राणोंने अपने पराक्रमकी परीक्षा करनेके लिये क्रमशः उत्क्रमण करना आरम्भ किया; उनमेंसे— |
वाघोच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत महते जीवितुमिति ते होचुर्यथाकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वाँसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥
[पहले] वाक्ने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्षतक बाहर रहकर लौटकर कहा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके थे?' यह सुनकर उन्होंने कहा, 'जैसे मूक पुरुष वाणीसे न बोलते हुए भी प्राणसे प्राणक्रिया करते, नेत्रसे देखते, श्रोत्रसे सुनते, मनसे जानते और रेतस्से प्रजा