बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1271, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५७
( सन्तान ) की उत्पत्ति करते हुए [ जीवित रहते हैं ], वैसे ही हम जीवित रहे।' यह सुनकर वाक्ने शरीरमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥
| वागेव प्रथमं हास्माच्छरीरादुच्चक्रामोत्क्रान्तवती । सा चोत्क्रम्य संवत्सरं प्रोष्य प्रोषिता भूत्वा पुनरागत्योवाच—कथमशकत शक्तवन्तो यूयं मदृते मां बिना जीवितुमिति ? <br><br> त एवमुक्ता ऊचुर्यथा लोकेऽकला मूका अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणनव्यापारं कुर्वन्तः प्राणेन पश्यन्तो दर्शनव्यापारं चक्षुषा कुर्वन्तस्तथा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा कार्याकार्यादिविषयं प्रजायमाना रेतसा पुत्रानुत्पादयन्त एवमजीविषम वयमित्येवं प्राणैर्दत्तोत्तरा वागात्मनोऽस्मिन्नवसिष्ठत्वं बुद्ध्वा प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥ | पहले वाक्ने ही इस शरीरसे उत्क्रमण किया । उसने उत्क्रमण कर एक वर्ष बाहर रहकर फिर लौटकर कहा, 'तुमलोग मेरे बिना किस प्रकार जीवित रह सके थे ?' <br><br> उससे इस प्रकार कहे जानेपर वे बोले, 'जिस प्रकार लोकमें अकल अर्थात् मूक पुरुष वाणीसे न बोलते हुए प्राणसे प्राणन अर्थात् प्राणव्यापार करते हुए, नेत्रसे देखते—दर्शनव्यापार करते हुए, इसी प्रकार श्रोत्रसे सुनते हुए, मनसे कार्याकार्यादि विषयको जानते हुए और वीर्यसे प्रजनन अर्थात् पुत्रादिकी उत्पत्ति करते हुए [जीवित रहते हैं], उसी प्रकार हम भी जीवित रहे; प्राणोंसे ऐसा उत्तर पाकर वाक्ने अपनेको वसिष्ठ न समझकर इस शरीरमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥ |
चक्षुका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश
चक्षुर्होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथान्धा अपश्यन्तश्चक्षुषा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः