बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1272, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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श्रोत्रेण विद्वाꣳसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजी-
विष्मेति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥
चक्षुने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले—'जिस प्रकार अन्धे लोग नेत्रसे न देखते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, श्रोत्रसे सुनते, मनसे जानते और रेतस्से प्रजा उत्पन्न करते हुए [जीवित रहते हैं], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर चक्षुने प्रवेश किया ॥ ९ ॥
श्रोत्रका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश
श्रोत्रꣳ होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्यागत्यो-
वाच कथमशकत महते जीवितुमिति ते होचुर्यथा
बधिरा अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो
वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वाꣳसो मनसा प्रजायमाना
रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥
श्रोत्रने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले—'जिस प्रकार बहरे आदमी कानोंसे न सुनते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, मनसे जानते और रेतस्से प्रजा उत्पन्न करते हुए [जीवित रहते हैं], उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर श्रोत्रने प्रवेश किया ॥ १० ॥
मनका उत्क्रमण और परीक्षामें असफल होकर पुनः प्रवेश
मनो होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच
कथमशकत महते जीवितुमिति ते होचुर्यथा मुग्धा अवि-
द्वाꣳसो मनसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्त-