बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1265, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५१
| वेति वसिष्ठा । वाग्मिनो हि धनवन्तो वसन्त्यतिशयेन ।<br><br>आच्छादनार्थस्य वा वसेर्वसिष्ठा । अभिभवन्ति हि वाचा वाग्मिनोऽन्यान् । तेन वसिष्ठगुणवत्परिज्ञानाद् वसिष्ठगुणो भवतीति दर्शनानुरूपं फलम् ॥ २ ॥ | बसती है, इसलिये यह वसिष्ठा है; क्योंकि जो अच्छे वक्ता धनवान् होते हैं, वे ही अतिशयतापूर्वक बसते हैं।<br><br>अथवा आच्छादनार्थक 'वस्' धातुसे 'वसिष्ठा' शब्द निष्पन्न होता है। वाक्कुशल लोग वाणीसे दूसरोंका पराभव कर देते हैं। अतः वसिष्ठगुणयुक्त पदार्थके विज्ञानसे उपासक वसिष्ठगुणवान् हो जाता है—इस प्रकार ज्ञानके अनुसार फल होता है ॥ २ ॥ |
प्रतिष्ठादृष्टिसे चक्षुकी उपासना
यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥ ३ ॥
जो प्रतिष्ठाको जानता है, वह समान देश-कालमें प्रतिष्ठित होता है और दुर्गम देश-कालमें भी प्रतिष्ठित होता है। चक्षु ही प्रतिष्ठा है। चक्षुसे ही समान और दुर्गम देश-कालमें प्रतिष्ठित होता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह समान और दुर्गममें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३ ॥
| यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठत्यनयेति प्रतिष्ठा तां प्रतिष्ठां प्रतिष्ठागुणवतीं यो वेद तस्यैतत् फलम्—प्रतितिष्ठति समे देशे काले च तथा दुर्गे विषमे च दुर्गमने च देशे दुर्भिक्षादौ वा काले विषमे। | जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है, जिससे प्रतिष्ठित होता है, उसे प्रतिष्ठा कहते हैं; उस प्रतिष्ठाको अर्थात् प्रतिष्ठागुणवती (चक्षु) को जो जानता है, उसे यह फल मिलता है कि वह समान देश और कालमें प्रतिष्ठित होता है तथा दुर्ग—विषम यानी दुर्गम्य देशमें और दुर्भिक्षादि विषम कालमें भी प्रतिष्ठित होता है। |