बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1264, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| ननु वयोनिमित्तं ज्येष्ठत्वम्; तदिच्छात्तः कथं भवति ? इत्युच्यते । नैष दोषः, प्राणवद् वृत्तिलाभस्यैव ज्येष्ठत्वस्य विवक्षितत्वात् ॥ १ ॥ | किंतु ज्येष्ठत्व तो आयुके कारण होता है, वह इच्छासे कैसे हो सकता है। ऐसी शङ्का होनेपर कहते हैं—यह दोष नहीं है; क्योंकि प्राणके समान [यहाँ भी] वृत्तिलाभ ही ज्येष्ठत्वरूपसे विवक्षित है¹॥ १ ॥ |
वसिष्ठादृष्टिसे वाक्की उपासना
यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति वाग् वै वसिष्ठा वसिष्ठः स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ २ ॥
जो वसिष्ठाको जानता है, वह स्वजनोंमें वसिष्ठ होता है। वाक् ही वसिष्ठा है। जो ऐसी उपासना करता है, वह स्वजनोंमें तथा और भी जिनमें चाहता है, उनमें वसिष्ठ होता है ॥ २ ॥
| यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति । तद्दर्शनानुरूपेण फलम् । येषां च ज्ञातिव्यतिरेकेण वसिष्ठो भवितुमिच्छति तेषां च वसिष्ठो भवति । उच्यतां तर्हि कासौ वसिष्ठेति ? वाग् वै वसिष्ठा । वासयत्यतिशयेन वस्ते | जो वसिष्ठाको जानता है, वह स्वजनोंमें वसिष्ठ होता है। उसकी उपासनाके अनुसार ही फल होता है। तथा अपनी जातिसे भिन्न जिन लोगोंमें वह वसिष्ठ होना चाहता है, उनमें भी वसिष्ठ हो जाता है। अच्छा तो बतलाइये, वसिष्ठा कौन है? [इसपर कहते हैं—] वाक् ही वसिष्ठा है। अतिशयरूपसे बसाती है, अथवा |
१. जिस प्रकार अन्नभक्षणादिके कारण चक्षु आदि इन्द्रियोंके वृत्तिलाभका कारण होनेसे प्राण ज्येष्ठ है, उसी प्रकार अन्य जीवोंका जीवन प्राणोपासकके अधीन होनेसे वह उनमें ज्येष्ठ है। उसका ज्येष्ठत्व आयुके कारण नहीं है।