भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1263, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1263
ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२४९

| निषेककालादारभ्य गर्भं पुष्यति प्राणः; प्राणे हि लब्धवृत्तौ पश्चाच्चक्षुरादीनां वृत्तिलाभः; अतो युक्तं प्राणस्य ज्येष्ठत्वं चक्षुरादिषु । | गर्भाधानके समयसे ही प्राण गर्भका पोषण करता है। प्राणके वृत्तियुक्त हो जानेके पीछे ही चक्षु आदिको वृत्तिलाभ होता है; अतः चक्षु आदिमें प्राणका ज्येष्ठत्व उचित ही है। | | भवति तु कश्चित् कुले ज्येष्ठः; गुणहीनत्वान्न श्रेष्ठः। मध्यमः कनिष्ठो वा गुणाढ्यत्वाद् भवेच्छ्रेष्ठो न ज्येष्ठः। न तु तथेहेत्याह—‘प्राण एव तु ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च।’ कथं पुनः श्रेष्ठ्यमवगम्यते प्राणस्य ? तदिह संवादेन दर्शयिष्यामः । | कुलमें कोई व्यक्ति (आयुमें) ज्येष्ठ तो होता है, किंतु गुणहीन होनेके कारण वह श्रेष्ठ नहीं माना जाता। इसी प्रकार गुणसम्पन्न होनेके कारण मध्यम अथवा कनिष्ठ श्रेष्ठ तो होता है, किंतु ज्येष्ठ नहीं माना जाता; किंतु यहाँ ऐसा नहीं है। (यही बात श्रुति बतलाती है)—‘प्राण ही ज्येष्ठ है और श्रेष्ठ भी’। प्राणकी श्रेष्ठता कैसे जानी जाती है? यह बात यहाँ हम संवादसे प्रदर्शित करेंगे। | | सर्वथापि तु प्राणं ज्येष्ठश्रेष्ठगुणं यो वेदोपास्ते, स स्वानां ज्ञातीनां ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च भवति ज्येष्ठश्रेष्ठगुणोपासनसामर्थ्यात्। स्वव्यतिरेकेणापि च येषां मध्ये ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च भविष्यामीति बुभूषति भवितुमिच्छति तेषामपि ज्येष्ठश्रेष्ठप्राणदर्शी ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च भवति। | जो किसी भी १प्रकार ज्येष्ठ-श्रेष्ठगुणवाले प्राणको जानता अर्थात् उसकी उपासना करता है, वह ज्येष्ठ-श्रेष्ठ गुणवान्की उपासनाके सामर्थ्यसे अपनोंमें अर्थात् ज्ञातिजनोंमें ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है। अपनोंसे भिन्न दूसरे जिन-किन्हींमें भी वह ‘मैं ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाऊँ’ इस प्रकार ज्येष्ठ-श्रेष्ठ होनेकी इच्छा करता है, उनमें भी यह ज्येष्ठ-श्रेष्ठ प्राणोपासक ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है। |


१. अर्थात् प्राणका ज्येष्ठत्व और श्रेष्ठत्व आरोपित हो अथवा वास्तविक।

बृ० उ० ७६—