बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1266, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| यद्येवमुच्यतां काऽसौ प्रतिष्ठा ?<br><br>चक्षुर्वै प्रतिष्ठा । कथं चक्षुषः<br><br>प्रतिष्ठात्वम् ? इत्याह-‘चक्षुषा हि<br><br>समे च दुर्गे च दृष्ट्वा प्रतितिष्ठति’<br><br>अतोऽनुरूपं फलं प्रतितिष्ठति समे<br><br>प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं<br><br>वेदेति ॥ ३ ॥ | यदि ऐसी बात है, तो बताइये यह प्रतिष्ठा क्या है ? ( ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता है-) चक्षु ही प्रतिष्ठा है। चक्षुका प्रतिष्ठात्व कैसे है ? यह श्रुति बतलाती है-‘क्योंकि सम और विषम देश-कालमें चक्षुसे देखकर ही पुरुष प्रतिष्ठित होता है। अतः जो ऐसी उपासना करता है,उसे उसके अनुरूप यह फल मिलता है कि वह सममें प्रतिष्ठित होता है और दुर्गमें भी प्रतिष्ठित होता है ॥३॥ |
सम्पदृष्टिसे श्रोत्रकी उपासना
यो ह वै संपदं वेद सँहास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै संपच्छ्रोत्रे हीमे सर्वे वेदा अभिसंपन्नाः सँहास्मै पद्यते यं कामं कामयते य एवं वेद ॥४॥
जो सम्पदको जानता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो जाता है। श्रोत्र ही सम्पद है। श्रोत्रमें ही ये सब वेद सब प्रकार निष्पन्न हैं। जो ऐसी उपासना करता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो जाता है॥ ४॥
| यो ह वै संपदं वेद संपद्गुण-<br><br>युक्तं यो वेद तस्यैतत् फलमस्मै<br><br>विदुषे संपद्यते ह । किम् ? यं<br><br>कामं कामयते स कामः; किं पुनः<br><br>संपद्गुणकम्? श्रोत्रं वै संपत्, कथं | जो भी सम्पदको जानता है, अर्थात् सम्पदगुणवान्को जानता है,उसे यह फल मिलता है—उस विद्वान्को प्राप्त हो जाता है। क्या प्राप्त हो जाता है ? जिस भोगकी वह इच्छा करता है वह भोग। अच्छा तो, सम्पद्गुणयुक्त क्या है ? श्रोत्र ही |