बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1280, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1280
| १२६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| षेधातिक्रमे दोष एव स्यादन्यविषयत्वान्न ह वा इत्यादेः। | इसलिये उस प्रतिषेधका अतिक्रमण करनेसे तो दोष ही होगा, क्योंकि 'न ह वा' इत्यादि आगेके वाक्यका विषय दूसरा [यानी प्राण] ही है। |
| न च ब्राह्मणादिशरीरस्य सर्वान्नत्वदर्शनमिह विधीयते, किंतु प्राणमात्रस्यैव। यथा च सामान्येन सर्वान्नस्य प्राणस्य किञ्चिदन्नजातं कस्यचिज्जीवनहेतुः, यथा विषं विषजस्य कृमेः, तदेवान्यस्य प्राणान्नमपि सद् दृष्टमेव दोषमुत्पादयति मरणादिलक्षणम्। तथा सर्वान्नस्यापि प्राणस्य प्रतिषिद्धान्नभक्षणे ब्राह्मणत्वादिदेहसंबन्धाद्दोष एव स्यात्; तस्मान्मिथ्याज्ञानमेवाभक्ष्यभक्षणे दोषाभावज्ञानम्। | इसके सिवा यहाँ ब्राह्मणादि शरीरकी सर्वान्नत्व-दृष्टिका विधान भी नहीं किया जाता, किंतु केवल प्राणमात्रकी सर्वान्नत्वदृष्टि बतलायी गयी है। जिस प्रकार सामान्यरूपसे सर्वान्नप्राणका कोई अन्नसमूह किसीके जीवनका हेतु होता है, जैसे कि विषसे उत्पन्न हुए कीड़ेके लिये विष, किंतु वही दूसरेका प्राणान्न होनेपर भी उसके लिये मरणादिरूप प्रत्यक्ष दोष उत्पन्न कर देता है। इसी प्रकार सर्वान्नभक्षी प्राणको भी ब्राह्मणादिदेहका सम्बन्ध होनेके कारण प्रतिषिद्ध अन्न भक्षण करनेमें दोष ही होगा। अतः अभक्ष्यभक्षणमें दोषाभावका ज्ञान होना मिथ्या ज्ञान ही है। |
| आपो वास इति; आपोभक्ष्यमाणा वासःस्थानीयास्तव; अत्र च प्राणस्यापो वास इत्येतद् दर्शनं विधीयते; न तु वासःकार्य आपो विनियोक्तुं शक्याः। तस्माद् यथाप्राप्तेऽब्भक्षणे दर्शनमात्रं कर्तव्यम्। | 'आपो वासः' इत्यादि, भक्षण किया जाता हुआ जल तुम्हारा वस्त्रस्थानीय है। यहाँ जल प्राणका वस्त्र है—इस दृष्टिका विधानमात्र किया गया है। वस्त्रके काममें जलका उपयोग नहीं किया जा सकता। अतः यथाप्राप्त जलपानमें केवल ऐसी दृष्टिमात्र ही करनी चाहिये। |