बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| त्वमिति, सत्यमेतत्, किन्तु नापूर्वविध्यर्थता; पक्षे प्राप्तस्य नियमार्थतैव । | तो ठीक है; किंतु यह अपूर्वविधि नहीं हो सकती, बल्कि एक पक्षमें प्राप्त होनेवाली उपासनाका नियम करनेके लिये ही है। |
| कथं पुनरुपासनस्य पक्षप्राप्तिः? | पूर्व०—किंतु एक पक्षमें उपासनाकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? |
| यावता पारिशेष्यादात्मविज्ञान-स्मृतिसन्ततिः नित्यैवेत्यभिहितम्। | क्योंकि ऊपर यह कहा जा चुका है कि परिशेषतः आत्मविज्ञान-सम्बन्धिनी स्मृतिका प्रवाह नित्य प्राप्त ही है। |
| (आत्मोपासन-वाक्यानां नियम-विध्यर्थत्वसाधनम्)<br><br>बाढम्, यद्यप्येवम्; शरीरारम्भकस्य कर्मणो नियतफलत्वात्, सम्यग्ज्ञानप्राप्तावप्यवश्यम्भाविनी प्रवृत्तिर्वाङ्मनःकायानाम्, लब्धवृत्तेः कर्मणो बलीयस्त्वात् मुक्तेष्वादिप्रवृत्तिवत् । तेन पक्षे प्राप्तं ज्ञानप्रवृत्तिदौर्बल्यम्। तस्मात्त्यागवैराग्यादि-साधनबलावलम्बेन आत्मविज्ञान-स्मृतिसन्ततिर्नियन्तव्या भवति, न त्वपूर्वा कर्तव्या; प्राप्तत्वाद् | सिद्धान्ती—ठीक है, यद्यपि ऐसा ही है; तथापि शरीरारम्भक कर्मका फल निश्चित होनेके कारण सम्यग्ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर भी वाणी, मन और शरीरकी चेष्टा अवश्यम्भाविनी ही है, क्योंकि जो कर्म फलोन्मुख हो चुका है वह तो छूटे हुए बाण आदिकी प्रवृत्तिके समान अधिक बलवान् है ही। अतः एक पक्षमें ज्ञानप्रवृत्तिकी दुर्बलता प्राप्त होती है। अतः त्याग-वैराग्यादि साधनोंके बलका आश्रय लेकर आत्मविज्ञानस्मृतिके प्रवाहका नियमन ही करना होता है, उसे अपूर्व रूपसे नहीं करना पड़ता, क्योंकि |
१. अर्थात् आत्मज्ञानसे अनात्मचिन्तनकी निवृत्ति हो जानेपर अन्तमें।
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २२९
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २२९
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| इत्यवोचाम। तस्मात् प्राप्तविज्ञान-स्मृतिसन्ताननियमविध्यर्थानि “विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत” इत्यादि-वाक्यानि, अन्यार्थासम्भवात्। | हम कह चुके हैं कि आत्मज्ञान होनेपर वह प्राप्त है ही। अतः “विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत” इत्यादि वाक्य प्राप्त विज्ञानकी स्मृतिके प्रवाहकी नियम-विधिके लिये ही हैं, क्योंकि उनका अन्य अर्थ होना असम्भव है। |
| नन्वनात्मोपासनमिदम्, इति-शब्दप्रयोगात्; यथा 'प्रियमित्येतदुपासीत' इत्यादौ न प्रियादि-गुणा एवोपास्याः, किं तर्हि ? प्रियादिगुणवत्प्राणाद्येवोपास्यम्; तथेहापि इतिपरात्मशब्दप्रयोगाद् आत्मगुणवदनात्मवस्तूपास्यमिति गम्यते। | पूर्व०—किंतु 'आत्मा' शब्दके आगे 'इति' शब्दका प्रयोग होनेसे यह अनात्मोपासना जान पड़ती है। जिस प्रकार 'प्रियमित्येतदुपासीत' इत्यादि वाक्योंमें प्रियादि गुण ही उपास्य नहीं हैं; तो फिर कौन उपास्य है ? प्रियादि गुणवान् प्राणादि ही उपास्य हैं, उसी प्रकार यहाँ भी 'इति' जिसके आगे है ऐसे 'आत्मा' शब्दका प्रयोग होनेसे यही जान पड़ता है कि आत्माके समान गुणोंवाली अनात्मवस्तु ही उपास्य है। |
| आत्मोपास्यत्ववाक्यवैलक्षण्याच्च, परेण च वक्ष्यति—“आत्मानमेव लोकमुपासीत” (१।४।१५) इति। तत्र च वाक्ये आत्मैवो-पास्यत्वेनाभिप्रेतो द्वितीयाश्रवणा-दात्मानमेवेति। इह तु न द्वितीया | इसके सिवा आत्माका उपास्यत्व बतलानेवाले वाक्यसे इसकी विलक्ष-णता होनेके कारण भी यह वाक्य अनात्मोपासनसम्बन्धी ही है। आगे श्रुति कहेगी “आत्मानमेवं लोक-मुपासीत ।” वहाँ इस वाक्यमें उपास्यरूपसे आत्मा ही अभिप्रेत है, क्योंकि 'आत्मानमेव' इस प्रकार 'आत्मानम्' पदमें वहाँ द्वितीया सुनी जाती है; किंतु यहाँ द्वितीया |
१. यह प्रिय है—इस प्रकार उपासना करे।
२. 'आत्मा' रूप ही लोककी उपासना करे।
२३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| श्रूयते। इतिपरश्चात्मशब्दः 'आत्मेत्येवोपासीत' इति। अतो नात्मोपास्य आत्मगुणश्चान्य इति त्ववगम्यते। | नहीं सुनी जाती और 'आत्मेत्येवोपासीत' इसमें 'आत्मा' शब्दके आगे 'इति' भी है। अतः यही ज्ञात होता है कि यहाँ 'आत्मा' उपास्य नहीं है, अपितु आत्माके समान गुणवाला उससे भिन्न—अनात्मा ही उपास्य है। | | न; वाक्यशेष आत्मन उपास्यत्वेनावगमात्। अस्यैव वाक्यस्य शेषे आत्मैवोपास्यत्वेनावगम्यते—"तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्मा", (बृ० उ० १।४।७) "अन्तरतरं यदयमात्मा" (बृ०उ० १।४।८) "आत्मानमेवावेत्" (१।४।१०) इति। | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वाक्यशेषमें आत्मा ही उपास्यरूपसे जाना गया है। इसी वाक्यके अन्तमें उपास्यरूपसे आत्मा ही जाना जाता है, यथा—"यह जो आत्मा है वही इस सम्पूर्ण जगत्का प्राप्तव्य है", "यह जो आत्मा है अन्तरतर है", "आत्माहीको जाना" इत्यादि। | | प्रविष्टस्य दर्शनप्रतिषेधादनुपास्यत्वमिति चेत्। यस्यात्मनः प्रवेश उक्तः तस्यैव दर्शनं वार्यते "तं न पश्यन्ति" (४।३।२३) इति प्रकृतोपादानात्। तस्मादात्मनोऽनुपास्यत्वमेवेति चेत्! | पूर्व०- किंतु [शरीरके भीतर] प्रविष्ट आत्माके दर्शनका प्रतिषेध होनेसे तो उसका अनुपास्यत्व सिद्ध होता है। जिस आत्माका प्रवेश बतलाया गया है उसीके दर्शनका "तं¹ न पश्यन्ति" इस वाक्यके 'तम्' पदसे ग्रहण करके निषेध करते हैं। अतः आत्माका अनुपास्यत्व ही सिद्ध होता है। | | न, अकृत्स्नत्वदोषात्। दर्शन- | सिद्धान्ती—यह बात नहीं है, वह तो असम्पूर्णतारूपदोषके कारण |
१. उसे नहीं देखते।
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३१
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३१
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| प्रतिषेधोऽकृत्स्नत्वदोषाभिप्रायेण नात्मोपास्यत्वप्रतिषेधाय । प्राणनादिक्रियाविशिष्टत्वेन विशेषणात् । आत्मनश्चेदुपास्यत्वमनभिप्रेतं प्राणनाद्येकैकक्रियाविशिष्टस्यात्मनोऽकृत्स्नत्ववचनमनर्थकं स्यात् “अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवति” (१ । ४ । ७) इति । अतोऽनेकैकविशिष्टस्त्वात्मा कृत्स्नत्वादुपास्य एवेति सिद्धम् ।<br><br>यस्त्वात्मशब्दस्य इतिपरः प्रयोगः, आत्मशब्दप्रत्यययोः आत्मतत्त्वस्य परमार्थतोऽविषयत्वज्ञापनार्थम्, अन्यथा आत्मानमुपासीतेत्येवमवक्ष्यत् । तथा चार्थादात्मनि शब्दप्रत्ययावनुज्ञातौ स्याताम्; तच्चानिष्टम्, “नेति नेति” (२ । ३ । ६) “विज्ञातारमरे केन विजानीयात्”, (२ । ४ । १४) “अविज्ञातं विज्ञातृ” (३ । ८ । १२) “यतो | है । अर्थात् आत्माके दर्शनका प्रतिषेध तो उसमें असम्पूर्णतारूप दोषके अभिप्रायसे है, आत्माके उपास्यत्वका प्रतिषेध करनेके अभिप्रायसे नहीं है, क्योंकि प्राणनादि क्रियाविशिष्टत्वसे उसे विशेषित किया गया है । यदि आत्माका उपास्यत्व अभिप्रेत न होता तो “अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवति”¹ इस वाक्यसे प्राणनादि एक-एक क्रियासे विशिष्ट आत्माको असम्पूर्ण बतलाना व्यर्थ होता । अतः यह सिद्ध होता है कि जो एक-एक क्रियासे विशिष्ट नहीं है, वह आत्मा तो पूर्ण होनेके कारण उपास्य ही है ।<br><br>तथा ‘आत्मा’ शब्दका जो उसके आगे ‘इति’ शब्द लगाकर प्रयोग किया गया है वह आत्मतत्त्वको परमार्थतः आत्मशब्द और आत्मप्रत्ययका अविषय सूचित करनेके लिये है । नहीं तो श्रुति ‘आत्मानमुपासीत’—आत्माकी उपासना करे—ऐसा ही कहती । ऐसा कहनेपर आत्मामें स्वतः ही आत्मशब्द और आत्मप्रत्ययकी विषयता अनुमोदित हो जाती और ऐसा होना “यह नहीं है, यह नहीं है”, “अरे मैत्रेयि ! विज्ञाताको किससे जाने”, “वह [स्वयं] अविज्ञात [किंतु दूसरोंका] विज्ञाता |
१. अतः एक-एक क्रियासे विशिष्ट होनेके कारण यह असम्पूर्ण ही होता है ।
| २३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
| २३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह'' (तै० उ० २।४।१) इत्यादिश्रुतिभ्यः। यत्तु ''आत्मानमेव लोकमुपासीत'' (१।४।१५) इति तदनात्मोपासनप्रसङ्गनिवृत्तिपरत्वान्न वाक्यान्तरम्। | है'' "जहाँसे वाणी उसे न पाकर मनके सहित लौट आती है" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार इष्ट नहीं है। और "आत्मारूप ही लोककी उपासना करे" ऐसी जो श्रुति है वह अनात्मोपासनके प्रसंगकी निवृत्ति करनेवाली होनेसे कोई भिन्न प्रकारका वाक्य नहीं है। |
| कथमात्मैवोपास्यः<br>अविज्ञातत्वसामान्यादात्मा ज्ञातव्योऽनात्मा च। तत्र कस्मादात्मोपासने एव यत्न आस्थीयते “आत्मत्येवोपासीत” इति नेतरविज्ञान इति ? | पूर्व०-किंतु पूर्णतया ज्ञात न होनेमें समान होनेके कारण तो आत्मा और अनात्मा दोनों ही ज्ञातव्य हैं। फिर इनमेंसे "आत्मत्येवोपासीत" इस वाक्यके अनुसार आत्मोपासनामें ही यत्न करनेकी आस्था क्यों की जाय, अनात्मोपासनामें क्यों नहीं ? |
| अत्रोच्यते—तदेतदेव प्रकृतं पदनीयं गमनीयं नान्यत्। अस्य सर्वस्येति निर्धारणार्था षष्ठी। अस्मिन्सर्वस्मिन्नित्यर्थः। यदयमात्मा यदेतदात्मतत्त्वम्। | सिद्धान्ती—इसपर हमारा कथन है कि इन सबमें यह प्रकृत आत्मा ही पदनीय—गन्तव्य है, अन्य (अनात्मा) नहीं। 'अस्य सर्वस्य' इन पदोंमें निश्चयार्थिका षष्ठी है; इसका तात्पर्य 'अस्मिन् सर्वस्मिन्' (इस सबमें) ऐसा है। 'यदयमात्मा' अर्थात् यह जो आत्मतत्त्व है [वह सबमें गन्तव्य—ज्ञातव्य है]। |
| किं न विज्ञातव्यमेवान्यत् ? न; किं तर्हि ? ज्ञातव्यत्वेऽपि न पृथग्ज्ञानान्तरमपेक्षत आत्मज्ञानात्। कस्मात् ? अनेनात्मना | तो क्या अन्य ज्ञातव्य ही नहीं है ? ऐसी बात नहीं है। तो क्या है ?—ज्ञातव्य होनेपर भी उसे आत्मज्ञानसे भिन्न किस ज्ञानान्तरकी अपेक्षा नहीं है। क्यों नहीं है ? |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३३
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३३
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी (भाष्यार्थ) |
|---|---|
| ज्ञातेन हि यस्मादेतत्सर्वमनात्मजातम् अन्यद्यत्तत्सर्वं समस्तं वेद जानाति। | क्योंकि इस आत्माके जान लेनेपर ही अन्य जो कुछ अनात्मजात है उस सभीको पुरुष जान लेता है। |
| नन्वन्यज्ञानेनान्यन्न ज्ञायत इति। | पूर्व०—किंतु अन्य पदार्थके ज्ञानसे दूसरेका ज्ञान तो हुआ नहीं करता। |
| अस्य परिहारं दुन्दुभ्यादिग्रन्थेन वक्ष्यामः। कथं पुनरेतत् पदनीयमित्युच्यते—यथा ह वै लोके पदेन, गवादिखुराङ्कितो देशः पदमित्युच्यते तेन पदेन, नष्टं विवित्सितं पशुं पदेनान्वेषमाणोऽनुविन्देल्लभेत्। एवमात्मनि लब्धे सर्वमनुलभत इत्यर्थः। | सिद्धान्ती—इसका निराकरण हम दुन्दुभ्यादि ग्रन्थसे करेंगे। किंतु यह आत्मा पदनीय (गमनीय) किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है—जिस प्रकार लोकमें पदसे—गौ आदिके खुरसे अङ्कित देश 'पद' कहा जाता है, उस पदसे—उस पदके द्वारा खोजनेवाला पुरुष जिसको पाना अभीष्ट है ऐसे खोये हुए पशुको पा लेता है उसी प्रकार आत्माके प्राप्त हो जानेपर पुरुष सभी पा लेता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। |
| नन्वात्मनि ज्ञाते सर्वमन्यज्ज्ञायत इति ज्ञाने प्रकृते, कथं लाभोऽप्रकृत उच्यत इति ? | पूर्व०—किंतु 'आत्माको जाननेपर अन्य सबको जान लेता है' इस प्रकार यहाँ ज्ञानका प्रसंग होनेपर [ 'अनुविन्देत्' इस पदसे ] जिसका कोई प्रसंग नहीं है उस लाभकी बात क्यों कही जाती है ? |
| न; ज्ञानलाभयोरेकार्थत्वस्य विवक्षितत्वात्। आत्मनो ह्यलाभोऽज्ञा- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि ज्ञान और लाभ इनकी एकार्थता ही विवक्षित है। अज्ञान ही आत्माका अलाभ है, अतः ज्ञान ही |
२३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| नमेव, तस्माज्ज्ञानमेवात्मनो लाभः, नानात्मलाभवदप्राप्तप्राप्तिलक्षण आत्मलाभः, लब्धृलब्धव्ययोर्भेदाभावात् । यत्र ह्यात्मनोऽनात्मा लब्धा, लब्धव्योऽनात्मा । स चाप्राप्त उत्पाद्यादिक्रियाव्यवहितः कारकविशेषोपादानेन क्रियाविशेषमुत्पाद्य लब्धव्यः । | आत्माका लाभ है, अनात्मलाभके समान आत्मलाभ अप्राप्तकी प्राप्ति होना नहीं है, क्योंकि यहाँ लाभ करनेवाले और लब्ध होनेवाली वस्तुमें कोई भेद नहीं है। जहाँ अनात्मा आत्माका लब्धव्य होता है वहाँ ही आत्मा उपलब्ध करनेवाला और अनात्मा उपलब्ध होने योग्य होता है। वह अप्राप्त अर्थात् उत्पाद्यादि क्रियाओंसे व्यवहित होता है तथा कारकविशेषके उपादानसे क्रियाविशेषको उत्पन्न करके उसे प्राप्त करना होता है। | | स त्वप्राप्तप्राप्तिलक्षणोऽनित्यः, मिथ्याज्ञानजनितकामकियाप्रभवत्वात्, स्वप्ने पुत्रादिलाभवत् । | वह अनात्मलाभ तो मिथ्या ज्ञानजनित काम और क्रियासे उत्पन्न होनेवाला होनेके कारण स्वप्नमें पुत्रादिलाभके समान अप्राप्तप्राप्तिरूप और अनित्य होता है; किंतु यह आत्मा तो उससे विपरीत स्वभाववाला है। आत्मा ही होनेके कारण यह उत्पाद्यादि क्रियासे व्यवहित नहीं है। नित्यप्राप्तस्वरूप होनेपर भी अविद्या ही उसका व्यवधान है। जिस प्रकार विपरीत ज्ञानवश रजतरूपसे भासनेवाली गृह्यमाण शुक्तिका ( सीप ) का अग्रहण विपरीत ज्ञानरूप व्यवधानवाला ही है तथा ज्ञान ही उसका ग्रहण है, क्योंकि वह ज्ञान विपरीत ज्ञानरूप | | अयं तु तद्विपरीत आत्मा । आत्मत्वादेव नोत्पाद्यादिक्रियाव्यवहितः । नित्यलब्धस्वरूपत्वेऽपि सत्यविद्यामात्रं व्यवधानम् । यथा गृह्यमाणाया अपि शुक्तिकाय विपर्ययेण रजताभासाया अग्रहणं विपरीतज्ञानव्यवधानमात्रम्, तथा ग्रहणं ज्ञानमात्रमेव, विपरीतज्ञा- | |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३५
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| नव्यवधानापोहार्थत्वाज्ज्ञानस्य । एवमिहाप्यात्मनोऽलाभोऽविद्यामात्रव्यवधानम् । तस्माद्विद्यया तदपोहनमात्रमेव लाभो नान्यः कदाचिदप्युपपद्यते । तस्मादात्मलाभे ज्ञानादर्थान्तरसाधनस्यानर्थक्यं वक्ष्यामः । तस्मान्निराशङ्कमेव ज्ञानलाभयोरेकार्थत्वं विवक्षन्नाह—ज्ञानं प्रकृत्य, अनुविन्देदिति । विन्दतेर्लाभार्थत्वात् । | व्यवधानकी निवृत्ति करनेवाला है । इसी प्रकार यहाँ भी आत्माका अलाभ अविद्यामात्र व्यवधानवाला ही है । अतः विद्यासे उसे दूर कर देना ही आत्माका लाभ करना है, इसके सिवा और किसी प्रकारका आत्मलाभ होना कभी सम्भव नहीं है । इसीसे आत्मलाभमें हमने ज्ञानसे भिन्न किसी अन्य साधनकी व्यर्थता बतलायी है । अतः 'ज्ञान' और 'लाभ' इन दोनोंकी एकार्थतामें कुछ भी शङ्का नहीं है—यह बतलानेकी इच्छासे ही श्रुतिने ज्ञानका प्रकरण उठाकर 'अनुविन्देत्' (लाभ करता है) ऐसा कहा है, क्योंकि [तुदादिगणपठित लृकारानुबन्धी] 'विद्' धातुका अर्थ लाभ है । |
| गुणविज्ञानफलमिदमुच्यते—<br><br>(उपासनफलम्)<br>यथायमात्मा नामरूपानुप्रवेशेन ख्यातिं गत आत्मत्यादिनामरूपाभ्यां प्राणादिसंहतिं च श्लोकं प्राप्तवानित्येवं यो वेद, स कीर्त्तिं ख्यातिं श्लोकं च सङ्गतमिष्टैः सह विन्दते लभते । यद्वा यथोक्तं वस्तु यो वेद मुमुक्षूणामपेक्षितं | इस गुणविज्ञानका यह फल बतलाया जाता है—जिस प्रकार यह आत्मा नाम-रूपके अनुप्रवेशसे ख्यातिको तथा आत्मा इत्यादि नाम-रूपोंके कारण प्राणादिसंघातरूप श्लोक (इष्टजनोंके समागम) को प्राप्त हुआ है उसी प्रकार जो ऐसा जानता है वह ख्याति—कीर्ति और श्लोक—इष्टजनोंके साथ समागम लाभ करता है । अथवा जो उपर्युक्त वस्तुको जानता है वह मुमुक्षुओंके अपेक्षित |
२३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
२३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
| कीर्तिशब्दितमैक्यज्ञानं तत्फलं<br><br>श्लोकशब्दितां मुक्तिमाप्नोतीति<br><br>मुख्यमेव फलम् ॥७॥ | 'कीर्ति' शब्दसे कहे जानेवाले ऐक्य-ज्ञान और उसके फल 'श्लोक' शब्दसे कही जानेवाली मुक्तिको प्राप्त करता है। अर्थात् उसे आत्म-ज्ञानका मुख्य फल ही प्राप्त हो जाता है ॥७॥ |
निरतिशय प्रियरूपसे आत्माकी उपासना
| कुतश्चात्मतत्त्वमेव ज्ञेयमना-<br>दृत्यान्यदित्याह— | किंतु और सबकी उपेक्षा करके आत्मतत्त्व ही क्यों जाननेयोग्य है? इसपर श्रुति कहती है— |
तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्प्रेयोऽन्यस्मात्सर्वस्मा-
दन्तरतरं यदयमात्मा। स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं
ब्रूयात्प्रियं रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव
प्रियमुपासीत। स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य
प्रियं प्रमायुकं भवति ॥ ८ ॥
वह यह आत्मतत्त्व पुत्रसे अधिक प्रिय है, धनसे अधिक प्रिय है और अन्य सबसे भी अधिक प्रिय है; क्योंकि यह आत्मा उनकी अपेक्षा अन्तरतर है। वह जो आत्मप्रियदर्शी है यदि आत्मासे भिन्न (अनात्मा) को प्रिय कहनेवाले पुरुषसे कहे कि 'तेरा प्रिय नष्ट हो जायगा' तो वैसा ही हो जायगा, क्योंकि वह समर्थ होता है। अतः आत्मा-रूप प्रियकी ही उपासना करे। जो आत्मा-रूप प्रियकी ही उपासना करता है उसका प्रिय अत्यन्त मरणशील नहीं होता ॥ ८ ॥
| तदेतदात्मतत्त्वं प्रेयः प्रियतरं पुत्रात्। पुत्रो हि लोके प्रियः | वह यह आत्मतत्त्व पुत्रसे प्रेय—प्रियतर है। लोकमें पुत्र प्रियरूपसे |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३७
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| प्रसिद्धस्तस्मादपि प्रियतरमिति निरतिशयप्रियत्वं दर्शयति। तथा वित्ताद्धिरण्यरत्नादेः, तथा अन्यस्माद्यद्यल्लोके प्रियत्वेन प्रसिद्धं तस्मात्सर्वस्मादित्यर्थः। | प्रसिद्ध है, आत्मा उससे भी प्रियतर है, ऐसा कहकर श्रुति उसका निरतिशय प्रियत्व प्रदर्शित करती है। तथा वह धन यानी सुवर्ण-रत्नादिसे और लोकमें जो प्रियरूप-से प्रसिद्ध है उस और सबसे भी प्रियतर है। |
| तत्कस्मादात्मतत्त्वमेव प्रियतरं न प्राणादि? इत्युच्यते—अन्तरतरं बाह्यात्पुत्रवित्तादेः प्राणपिण्डसमुदायो ह्यन्तरोऽभ्यन्तरः सन्निकृष्ट आत्मनः। तस्मादप्यन्तरादन्तरतरं यदयमात्मा यदेतदात्मतत्त्वम्। यो हि लोके निरतिशयप्रियः स सर्वप्रयत्नेन लब्धव्यो भवति। तथाऽयमात्मा सर्वलौकिकप्रियेभ्यः प्रियतमः। तस्मात्तल्लाभे महान्यत्न आस्थेय इत्यर्थः, कर्त्तव्यताप्राप्तमप्यन्यप्रियलाभे यत्नमुज्झित्वा। | किंतु यह क्या बात है कि आत्मतत्त्व ही प्रियतर है, प्राणादि नहीं हैं? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—यह अन्तरतर (अत्यन्त समीपवर्ती) है। पुत्र-धन आदि बाह्य पदार्थोंकी अपेक्षा प्राण और पिण्ड-समुदाय अन्तर—अभ्यन्तर अर्थात् आत्माका समीपवर्ती है और उस अन्तरसे भी अन्तरतर यह जो आत्मा अर्थात् आत्मतत्त्व है वह है। लोकमें जो सबसे बढ़कर प्रिय होता है वह सर्वप्रयत्नद्वारा प्राप्तव्य होता है, तथा यह आत्मा समस्त लौकिक प्रिय पदार्थोंसे प्रियतम है; अतः अभिप्राय यह है कि अन्य प्रिय पदार्थोंकी प्राप्तिके लिये यदि कोई यत्न अवश्यकर्तव्यतारूपसे प्राप्त हो तो भी उसे छोड़कर आत्माकी प्राप्तिके लिये ही महान् यत्न करना चाहिये। |
| कस्मात्पुनः आत्मानात्मप्रियोरन्यतरप्रियहानेन इतरप्रियो- | इसका क्या कारण है कि यदि आत्मा और अनात्मा-इन दो प्रिय पदार्थोंमेंसे किसी एक प्रिय पदार्थका |
२३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| पादानप्राप्तौ आत्मप्रियोपादानेनै- | त्याग करनेपर ही दूसरे प्रिय पदा- | | वेतरहानं क्रियते न विपर्ययः ? | र्थकी प्राप्ति होती हो तो आत्मा-रूप प्रियको ग्रहण करके अनात्माका | | इत्युच्यते—स यः कश्चिदन्यमना- | ही त्याग किया जाता है, इसके विपरीत नहीं किया जाता ? ऐसा | | त्मविशेषं पुत्रादिकं प्रियतर- | प्रश्न होनेपर कहते हैं—वह जो | | मात्मनः सकाशाद् ब्रुवाणं ब्रूया- | आत्मप्रियवादी है यदि किसी दूसरे यानी पुत्रादि अनात्मविशेषको | | दात्मप्रियवादी । किम् ? प्रियं | आत्माकी अपेक्षा प्रियतर बतलाने- | | तवाभिमतं पुत्रादिलक्षणं रोत्स्य- | वालेसे कहे—क्या कहे ? यही कि ‘तेरा प्रिय यानी पुत्रादिरूप अभि- | | त्यावरणं प्राणसंरोधं प्राप्स्यति । | मत पदार्थ ‘रोत्स्यति’—आवरण | | विनङ्क्ष्यतीति । स कस्मादेवं | यानी प्राणसंरोधको प्राप्त हो जायगा अर्थात् नष्ट हो जायगा।’ ऐसा वह | | ब्रवीति ? यस्मादीश्वरः समर्थः | क्यों कहेगा ? क्योंकि वह ऐसा | | पर्याप्तोऽसावेवं वक्तुं ह यस्मात्त- | कहनेमें ईश्वर अर्थात् समर्थ— | | स्मात्तथैव स्याद्यत्तेनोक्तं प्राण- | पर्याप्त है; क्योंकि ऐसा है, इसलिये वैसा ही होगा । यानी उसने जैसा | | संरोधं प्राप्स्यति । यथाभूतवादी | कहा है वह प्राणसंरोधको प्राप्त हो जायगा। क्योंकि वह यथार्थवादी | | हि सः, तस्मात्स ईश्वरो वक्तुम् । | है, इसलिये ऐसा कहनेमें समर्थ है। | | ईश्वरशब्दः क्षिप्रवाचीति | किन्हींका मत है कि ‘ईश्वर’ | | केचित् । भवेद्यदि प्रसिद्धिः स्यात्। | शब्द क्षिप्र (शीघ्र) इस अर्थमें है। किंतु यदि ऐसी प्रसिद्धि होती तो यह | | तस्मादुज्झित्वान्यत्प्रियमत्मान- | अर्थ हो सकता था। अतः अन्य प्रिय पदार्थोंको छोड़कर आत्मा-रूप प्रिय- | | मेव प्रियमुपासीत । | की ही उपासना करनी चाहिये। |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते,<br><br>आत्मैव प्रियो नान्योऽस्तीति प्रतिपद्यतेऽन्यल्लौकिकं प्रियमप्यप्रियमेवेति निश्चित्य उपास्ते चिन्तयति, न हास्यैवंविदः प्रियं प्रमायुकं प्रमरणशीलं भवति ।<br><br>नित्यानुवादमात्रमेतत्, आत्मविदोऽन्यस्य प्रियस्याप्रियस्य चाभावात् । आत्मप्रियग्रहणस्तुत्यर्थं वा प्रियगुणफलविधानार्थं वा मन्दात्मदर्शिनः । ताच्छील्यप्रत्ययोपादानात् ॥ ८ ॥ | जो पुरुष आत्मा-रूप प्रियकी ही उपासना करता है अर्थात् आत्मा ही प्रिय है, और कोई पदार्थ नहीं—ऐसा जानता है, दूसरे लौकिक पदार्थ प्रिय होनेपर भी अप्रिय ही हैं—ऐसा निश्चय करके उपासना यानी चिन्तन करता है उस इस प्रकार उपासना करनेवालेका प्रिय प्रमायुक—प्रकृष्टतया मरणशील नहीं होता ।<br><br>आत्मवेत्ताकी दृष्टिमें तो किसी अन्य प्रिय या अप्रियकी सत्ता ही नहीं है, इसलिये यह नित्य वस्तुका अनुवादमात्र है । अथवा यह कथन आत्मप्रियग्रहणकी स्तुतिके लिये है । या जो अदृढ़ आत्मज्ञानी है उसके लिये प्रियगुणविशिष्ट आत्माकी उपासनाका फल बतलानेके लिये है, क्योंकि 'प्रमायुक' इस पदमें 'उक' यह ताच्छील्य¹प्रत्यय ग्रहण किया गया है ॥ ८ ॥ |
ब्रह्मके सर्वरूप होनेके विषयमें प्रश्न
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| सूत्रिता ब्रह्मविद्या 'आत्मेत्ये- | जिसके लिये यह सारी उपनिषद् है उस ब्रह्मविद्याका श्रुतिने 'आत्मेत्ये- |
१. यह उसका शील यानी स्वभाव है--इस अर्थमें व्याकरणशास्त्रमें 'उकञ्' प्रत्ययका विधान किया है । पदार्थ अपने स्वभावको सर्वथा नहीं त्याग सकता । इसलिये 'प्रमायुक' नहीं होता । इस कथनसे प्राणादिका आत्यन्तिक अमरण विवक्षित नहीं है; केवल यही समझना चाहिये कि वे दीर्घजीवी होते हैं ।
२४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| वोपासीत' इति यदर्थोपनिषत्कृत्स्नापि। तस्यैतस्य सूत्रस्य व्याचिख्यासुः प्रयोजनाभिधित्सयोपोद्दिघांसति— | वोपासीत' इस वाक्यसे सूत्ररूपसे वर्णन किया है। उस इस सूत्रकी व्याख्या करनेकी इच्छावाली श्रुति अब उसका प्रयोजन बतलानेकी इच्छासे उपोद्घात करना चाहती है |
तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते। किमु तद्ब्रह्मावेद्यस्मात्तत्सर्वमभवदिति ॥ ९ ॥
[ ब्राह्मणोंने ] यह कहा कि ब्रह्मविद्याके द्वारा मनुष्य 'हम सर्व हो जायँगे' ऐसा मानते हैं; [ सो ] उस ब्रह्मने क्या जाना जिससे वह सर्व हो गया ? ॥ ९ ॥
| तदिति वक्ष्यमाणमनन्तरवाक्येऽवद्योत्यं वस्त्वाह। ब्राह्मणा | 'तत्' इस पदसे आगे कही जानेवाली तथा बिना किसी व्यवधानके ही अग्रिम वाक्यसे प्रकाशनीय वस्तुका ग्रहण होता है उसके विषयमें ब्राह्मणोंने कहा। ब्राह्मण— | | ब्रह्म विविदिषवो जन्मजरामरणप्रबन्धचक्रभ्रमणकृतायासदुःखोदकापारमहोदधिप्लवभूतं गुरुमासाद्य तत्तीरमुत्तितीर्षवो धर्माधर्मसाधनतत्फललक्षणात् साध्य- | ब्रह्मको जाननेकी इच्छावाले अर्थात् जन्म, जरा और मरण इनके प्रवाहमें चक्रके समान निरन्तर भ्रमणसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख ही जिसमें जल है उस अपार संसार-महोदधिको पार करनेके लिये नौकारूप जो गुरु हैं उनके पास आकर उसके तीर ( ब्रह्म ) पर उतरनेकी इच्छावाले यानी धर्म और अधर्म ही जिसके साधन और फल हैं उस साध्य-साधनरूप संसारसे |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २४१
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २४१
| साधनरूपान्निर्विण्णाः तद्विलक्षणनित्यनिरतिशयश्रेयः प्रतिपित्सवः ।<br><br>किमाहुरित्याह—यद्ब्रह्मविद्यया, ब्रह्म परमात्मा तद्यया वेद्यते सा ब्रह्मविद्या तया ब्रह्मविद्यया, सर्वं निरवशेषं भविष्यन्तो भविष्याम इत्येवं मनुष्या यन्मन्यन्ते। मनुष्यग्रहणं विशेषतोऽधिकारज्ञापनार्थम्। मनुष्या एव हि विशेषतोऽभ्युदयनिःश्रेयससाधनेऽधिकृता इत्यभिप्रायः ।<br><br>यथा कर्मविषये फलप्राप्तिं ध्रुवां कर्मभ्यो मन्यन्ते, तथा ब्रह्मविद्याया सर्वात्मभावफलप्राप्तिं ध्रुवामेव मन्यन्ते। वेदप्रामाण्यस्योभयत्राविशेषात्। तत्र विप्रतिषिद्धं वस्तु लक्ष्यतेऽतः पृच्छामः—किमु तद्ब्रह्म यस्य | विरक्त और उससे विलक्षण स्वभाववाले नित्य-निरतिशय श्रेयको जाननेकी इच्छावाले उन ब्राह्मणोंने कहा।<br><br>क्या कहा ? सो श्रुति बतलाती है—'यद्ब्रह्मविद्यया'—ब्रह्म परमात्माको कहते हैं, वह जिससे जाना जाता है वह ब्रह्मविद्या है; उस ब्रह्मविद्यासे जो मनुष्य 'हम सर्व यानी अशेष हो जायँगे' ऐसा मानते हैं [उसके विषयमें पूछा]। यहाँ 'मनुष्य' पदका ग्रहण उनका विशेषरूपसे ब्रह्मविद्यामें अधिकार सूचित करनेके लिये है। तात्पर्य यह है कि अभ्युदय और निःश्रेयसके साधनमें विशेषतः मनुष्योंका ही अधिकार है।<br><br>लोग जिस प्रकार कर्मविषयमें कर्मोंसे होनेवाली जो फलप्राप्ति है उसे निश्चित मानते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यासे सर्वात्मभावरूप फलकी प्राप्ति भी निश्चित ही मानते हैं, क्योंकि वेदकी प्रमाणता दोनोंहीके विषयमें समान है। किंतु [ब्रह्मज्ञानसे मोक्ष होता है] यह बात विपरीत-सी जान पड़ती है, इसलिये हम पूछते हैं कि वह ब्रह्म क्या है ? जिसके |
बृ० उ० १६—
२४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| विज्ञानात्सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते ? तत्किमवेद्यस्माद्विज्ञानात्तद्ब्रह्म सर्वमभवत् ? | विज्ञानसे मनुष्य 'सर्वरूप हो जायेंगे' ऐसा मानते हैं और उसने क्या जाना, जिस विज्ञानसे वह ब्रह्म सर्वरूप हो गया । | | ब्रह्म च सर्वमिति श्रूयते । | ब्रह्म सर्वरूप है—यह तो सुना ही जाता है । | | तद्यद्यविज्ञाय किञ्चित्सर्वमभवत्तथान्येषामप्यस्तु, किं ब्रह्मविद्यया? | वह यदि कुछ भी न जानकर ही सर्वरूप हुआ है तो दूसरोंके लिये भी ऐसी ही बात होनी चाहिये, फिर ब्रह्मविद्यासे क्या लाभ है ? | | अथ विज्ञाय सर्वमभवत्, विज्ञानसाध्यत्वात्कर्मफलेन तुल्यमेवेत्यनित्यत्वप्रसङ्गः सर्वभावस्य ब्रह्मविद्याफलस्य । | और यदि वह जानकर सर्वरूप हुआ है तो विज्ञानसाध्य होनेके कारण उसकी सर्वात्मता कर्मफलके समान ही है—इससे ब्रह्मविद्याके फलभूत सर्वात्मत्वकी अनित्यताका प्रसंग आता है | | अनवस्थादोषश्च—तदप्यन्यद्विज्ञाय सर्वमभवत्ततः पूर्वमप्यन्यद्विज्ञायेति । | तथा वह अपनेसे भिन्न पदार्थको जानकर सर्व हुआ और इससे पहले भी किसी अन्यको जानकर सर्व हुआ था—इस प्रकार अनवस्था दोष प्राप्त होता है । | | न तावदविज्ञाय सर्वमभवत्, शास्त्रार्थवैरूप्यदोषात् । | किंतु वह न जानकर तो सर्व हुआ नहीं, क्योंकि इससे शास्त्रकी व्यर्थताका दोष आता है । | | फलानित्यत्वदोषस्तर्हि ? नैकोऽपि दोषोऽर्थवशोषपत्तेः ॥ ९ ॥ | तो फिर फलकी अनित्यताका दोष रहा ? नहीं, इससे विशेष प्रयोजन सम्भव होनेके कारण एक भी दोष नहीं होगा ॥ ६ । |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३
ब्रह्मने क्या जाना ?—इसका उत्तर और उस प्रकार जाननेका फल—
| यदि किमपि विज्ञायैव तद्ब्रह्म सर्वमभवत्पृच्छामः—किमु तद्ब्रह्मावेत् ? यस्मात्तत्सर्वमभवदिति। एवं चोदिते सर्वदोषानागन्धितं प्रतिवचनमाह— | यदि वह ब्रह्म कुछ जानकर ही सर्व हुआ तो हम पूछते हैं—'उस ब्रह्मने क्या जाना ? जिससे वह सर्व हुआ।' ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति, जिसमें किसी भी प्रकारके दोषकी गन्ध नहीं है, ऐसा उत्तर देती है— |
ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेत् । अहं ब्रह्मास्मीति । तस्मात्तत्सर्वमभवत्तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदे ऽहं मनुरभव ँ सूर्य्यश्चेति । तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इद ँ सर्वं भवति तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशते । आत्मा ह्येषा ँ स भवति । अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेव ँ स देवानाम् । यथा ह वै बहवः पशवो मनुष्यं भुञ्जुरेवमेकैकः पुरुषो देवान्भुनक्त्येकस्मिन्नेव पशावादीयमानेऽप्रियं भवति किमु बहुषु तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः ॥ १० ॥
पहले यह ब्रह्म ही था; उसने अपनेको ही जाना कि "मैं ब्रह्म हूँ"। अतः वह सर्व हो गया। उसे देवोंमेंसे जिस-जिसने जाना वही तद्रूप हो गया। इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्योंमेंसे भी [ जिसने उसे जाना वह तद्रूप हो गया ]। उसे आत्मारूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना—'मैं मनु हुआ और सूर्य भी' उस इस ब्रह्मको इस समय भी जो इस प्रकार जानता है कि 'मैं ब्रह्म हूँ', वह यह सर्व हो जाता है। उसके पराभवमें
२४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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देवता भी समर्थ नहीं होते; क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है। और जो अन्य देवताकी 'यह अन्य है और मैं अन्य हूँ' इस प्रकार उपासना करता है वह नहीं जानता। जैसे पशु होता है वैसे ही वह देवताओंका पशु है। जैसे लोकमें बहुत-से पशु मनुष्यका पालन करते हैं, उसी प्रकार एक-एक मनुष्य देवताओंका पालन करता है। एक पशुका ही हरण किये जानेपर अच्छा नहीं लगता, फिर बहुतोंका हरण होनेपर तो कहना ही क्या है? इसलिये देवताओंको यह प्रिय नहीं है कि मनुष्य [ ब्रह्मात्मतत्त्वको ] जानें ॥ १० ॥
| (ब्रह्मशब्देन किमभिप्रेतमिति विचार्यते)<br><br>ब्रह्मापरम्, सर्वभावस्य साध्यत्वोपपत्तेः। न हि परस्य ब्रह्मणः सर्वभावापत्तिर्विज्ञानसाध्या। विज्ञानसाध्यां च सर्वभावापत्तिमाह—'तस्मात्तत्सर्वमभवत्' इति। तस्माद्ब्रह्म वा इदमग्र आसीदित्यपरं ब्रह्मैव भवितुमर्हति।<br><br>मनुष्याधिकाराद्वा तद्भावी ब्राह्मणः स्यात्। 'सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते' इति हि मनुष्याः प्रकृताः, तेषां चाभ्युदयनिःश्रेयससाधने विशेषतोऽधिकार इत्युक्तम्, न परस्य ब्रह्मणो नाप्यपरस्य प्रजापतेः। अतो द्वैतैकत्वापर- | यहाँ 'ब्रह्म' शब्दसे अपरब्रह्म समझना चाहिये; क्योंकि उसीका सर्वरूप होना विज्ञान-साध्य हो सकता है। परब्रह्मका सर्वभावको प्राप्त होना विज्ञानसाध्य नहीं है; और 'इसीसे वह सर्वरूप हो गया' इस वाक्यसे श्रुति सर्वभावप्राप्तिको विज्ञानसाध्य बतलाती है। अतः 'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्' इस वाक्यमें 'ब्रह्म' पद अपर ब्रह्मका वाचक होना चाहिये।<br><br>अथवा यहाँ मनुष्यका अधिकरण होनेसे 'ब्रह्म' शब्दसे ब्रह्मरूपताको प्राप्त होनेवाला ब्राह्मण समझा जा सकता है। 'सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते' इस वाक्यसे यहाँ मनुष्योंका प्रसंग है, क्योंकि उन्हींका अभ्युदय और निःश्रेयसके साधनमें विशेषरूपसे अधिकार है—ऐसा ऊपर कहा गया है; परब्रह्म या अपरब्रह्म प्रजापतिका नहीं। अतः कर्मसहित द्वैतैकत्वरूप |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २४५
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २४५
| ब्रह्मविद्यया कर्मसहितया अपरब्रह्मभावमुपसम्पन्नो भोज्यादपावृत्तः सर्वप्राप्त्योच्छिन्नकाम-कर्मबन्धनः परब्रह्मभावी ब्रह्मविद्याहेतोर्ब्रह्मेत्यभिधीयते । | अपर ब्रह्मविद्याके द्वारा अपरब्रह्मभावको प्राप्त हुआ, हिरण्यगर्भसम्बन्धी भोगोंसे विरक्त एवं सब प्रकारके कर्मफल प्राप्त होनेके कारण जिसका काम और कर्मरूप बन्धन नष्ट हो गया है वह परब्रह्मभावको प्राप्त होनेवाला पुरुष ब्रह्मविद्याके कारण 'ब्रह्म'—इस शब्दसे कहा गया है। | | दृष्टश्च लोके भाविनीं वृत्तिमाश्रित्य शब्दप्रयोगः—यथा 'ओदनं पचति' इति, शास्त्रे च—'परिव्राजकः सर्वभूताभयदक्षिणाम्' इत्यादि, तथेहेति केचित्—ब्रह्म ब्रह्मभावी पुरुषो ब्राह्मणः—इति व्याचक्षते । | लोकमें भी भाविनी वृत्तिको आश्रित करके शब्दका प्रयोग होता देखा गया है; जैसे 'भात पकाता है', इस वाक्यमें। तथा शास्त्रमें भी—'संन्यासी समस्त भूतोंको अभयरूप दक्षिणा [ देकर संन्यास करे ]' इत्यादि वाक्यमें ऐसा ही प्रयोग है। उसी प्रकार यहाँ भी 'ब्रह्मभावको प्राप्त होनेवाला ब्राह्मण ही 'ब्रह्म' है' ऐसी व्याख्या कुछ लोग करते हैं। | | तन्न, सर्वभावापत्तेरनित्यत्वदोषात् । न हि सोऽस्ति लोके परमार्थतो यो निमित्तवशाद्भावा- | किन्तु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इससे सर्वभावप्राप्तिको अनित्यत्वका दोष प्राप्त होगा। लोकमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो वास्तवमें किसी निमित्तवश भावान्तरको प्राप्त होती |
१. चावलोंके पकनेपर उनकी ओदन ( भात ) संज्ञा होती है, किंतु इस वाक्यमें पकाये जाते हुए चावलोंको भात कहा है।
२. संन्यासाश्रमकी दीक्षा लेनेके पीछे पुरुषको संन्यासी कहा जाता है, परंतु यहाँ दीक्षा लेनेवालेको भी संन्यासी कहा है।
२४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| न्तरमापद्यते नित्यश्चेति । तथा<br><br>ब्रह्मविज्ञाननिमित्तकृता चेत्सर्व-<br><br>भावापत्तिः, नित्या चेति विरुद्धम्।<br><br>अनित्यत्वे च कर्मफलतुल्यते-<br><br>त्युक्तो दोषः ।<br><br>अविद्याकृतासर्वत्वनिवृत्तिं चे-<br><br>त्सर्वभावापत्तिं ब्रह्मविद्याफलं मन्य-<br><br>से, ब्रह्मभाविपुरुषकल्पना व्यर्था<br><br>स्यात्; प्राग्ब्रह्मविज्ञानादपि सर्वो<br><br>जन्तुर्ब्रह्मत्वान्नित्यमेव सर्वभावा-<br><br>पन्नः परमार्थतः, अविद्यया त्व-<br><br>ब्रह्मत्वमसर्वत्वं चाध्यारोपितम्<br><br>यथा शुक्तिकायां रजतम्, व्योम्नि<br><br>वा तलमलवत्त्वादि, तथेह ब्रह्मण्य-<br><br>ध्यारोपितमविद्यया अब्रह्मत्वम-<br><br>सर्वत्वं च ब्रह्मविद्यया निवर्त्यत<br><br>इति मन्यसे यदि, तदा युक्तम्<br><br>'यत्परमार्थत आसीत्परं ब्रह्म, ब्रह्म-<br><br>शब्दस्य मुख्यार्थभूतम् 'ब्रह्म वा<br><br>इदमग्र आसीत्' इत्यस्मिन्वाक्ये | हो और नित्य भी हो । इसी प्रकार यदि सर्वभावकी प्राप्ति भी ब्रह्म-विज्ञानरूप निमित्तसे होनेवाली हो तो वह नित्य भी है—ऐसा कहना विरुद्ध होगा । और यदि उसे अनित्य माना जाय तो वह भी कर्मफलके ही समान हुई [ उसमें कोई विशेषता न रही ]—यह दोष बतलाया जा चुका है।<br><br>यदि तुम अविद्याकृत असर्व-त्वकी निवृत्तिको ही ब्रह्मविद्याका सर्वभावप्राप्तिरूप फल मानते हो तो [ 'ब्रह्म' शब्दके अर्थमें ] ब्रह्म होने-वाले पुरुषकी कल्पना करना व्यर्थ है, क्योंकि ब्रह्मज्ञान होनेसे पूर्व भी सब जीव ब्रह्मरूप ही होनेके कारण सदा ही परमार्थतः सर्वभावको प्राप्त हैं । अब्रह्मत्व और असर्वत्व तो अवि-द्यासे ही आरोपित हैं । जैसे शुक्तिमें चाँदी और आकाशमें तलमलिन्यादि आरोपित हैं, उसी प्रकार यहाँ ब्रह्ममें अविद्यासे आरोपित अब्रह्मत्व और असर्वत्वकी ब्रह्मविद्यासे निवृत्ति हो जाती है—ऐसा यदि तुम मानते हो तब यही कहना उचित है कि 'जो परमार्थतः ब्रह्म-शब्दका मुख्यार्थभूत परब्रह्म है वही 'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्' इस वाक्यमें कहा |
| ब्राह्मण ४] | शाङ्करभाष्यार्थ | २४७ |
| ब्राह्मण ४] | शाङ्करभाष्यार्थ | २४७ |
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| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| उच्यते' इति वक्तुम्; यथाभूतार्थवादित्वाद्देवस्य । न त्वियं कल्पना युक्ता, ब्रह्मशब्दार्थविपरीतो ब्रह्मभावी पुरुषो ब्रह्मेत्युच्यत इति श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाया अन्याय्यत्वान्महत्तरे प्रयोजनान्तरेऽसति । | गया है', क्योंकि वेद यथार्थवादी है। अतः 'ब्रह्म' शब्दसे ब्रह्म शब्दके अर्थसे विपरीत ब्रह्म होनेवाला पुरुष कहा गया है—ऐसी कल्पना करनी उचित नहीं है, क्योंकि जबतक कोई दूसरा बहुत बड़ा प्रयोजन न हो, श्रुत अर्थको छोड़ना और अश्रुतकी कल्पना करना अन्याय्य है। |
| [पारमार्थिकाब्रह्मत्वासर्वत्वयोर्निषेधः]<br>अविद्याकृतव्यतिरेकेणाब्रह्मत्वमसर्वत्वं च विद्यत एवेति चेन्न, तस्य ब्रह्मविद्यायापोहानुपपत्तेः । न हि क्वचित्साक्षाद्वस्तुधर्मस्यापोढ्री दृष्टा कर्त्री वा ब्रह्मविद्या। अविद्यायास्तु सर्वत्रैव निवर्तिका दृश्यते। तथेहाप्यब्रह्मत्वमसर्वत्वं चाविद्याकृतमेव निवर्त्यतां ब्रह्मविद्यया । न तु पारमार्थिकं वस्तु कर्तुं निवर्तयितुं वार्हति ब्रह्मविद्या । तस्माद्व्यर्थैव श्रुतहान्यश्रुतकल्पना । | यदि कहो कि अविद्याकृत नहीं, वस्तुतः अब्रह्मत्व और असर्वत्व है ही, तो ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि उसकी ब्रह्मविद्याद्वारा निवृत्ति होनी असम्भव होगी । ब्रह्मविद्या साक्षाद्रूपसे किसी वस्तुके धर्मोंका लोप या प्रादुर्भाव करनेवाली कभी नहीं देखी गयी । किंतु वह अविद्याकी सर्वत्र ही निवृत्ति करनेवाली देखी जाती है । इसी प्रकार यहाँ भी जो अविद्याकृत अब्रह्मत्व और असर्वत्व है, उसकी ही ब्रह्मविद्यासे निवृत्ति होनी चाहिये । ब्रह्मविद्या पारमार्थिक वस्तुको पैदा करने या निवृत्त करनेमें तो समर्थ है नहीं । इसलिये श्रुत अर्थको छोड़ना और अश्रुतकी कल्पना करना व्यर्थ ही है । |
| ब्रह्मण्यविद्यानुपपत्तिरिति चेत्? | पूर्व०--किंतु ब्रह्ममें अविद्या होना तो असंगत है ? |