भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 238

| २३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह'' (तै० उ० २।४।१) इत्यादिश्रुतिभ्यः। यत्तु ''आत्मानमेव लोकमुपासीत'' (१।४।१५) इति तदनात्मोपासनप्रसङ्गनिवृत्तिपरत्वान्न वाक्यान्तरम्।है'' "जहाँसे वाणी उसे न पाकर मनके सहित लौट आती है" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार इष्ट नहीं है। और "आत्मारूप ही लोककी उपासना करे" ऐसी जो श्रुति है वह अनात्मोपासनके प्रसंगकी निवृत्ति करनेवाली होनेसे कोई भिन्न प्रकारका वाक्य नहीं है।
कथमात्मैवोपास्यः<br>अविज्ञातत्वसामान्यादात्मा ज्ञातव्योऽनात्मा च। तत्र कस्मादात्मोपासने एव यत्न आस्थीयते “आत्मत्येवोपासीत” इति नेतरविज्ञान इति ?पूर्व०-किंतु पूर्णतया ज्ञात न होनेमें समान होनेके कारण तो आत्मा और अनात्मा दोनों ही ज्ञातव्य हैं। फिर इनमेंसे "आत्मत्येवोपासीत" इस वाक्यके अनुसार आत्मोपासनामें ही यत्न करनेकी आस्था क्यों की जाय, अनात्मोपासनामें क्यों नहीं ?
अत्रोच्यते—तदेतदेव प्रकृतं पदनीयं गमनीयं नान्यत्। अस्य सर्वस्येति निर्धारणार्था षष्ठी। अस्मिन्सर्वस्मिन्नित्यर्थः। यदयमात्मा यदेतदात्मतत्त्वम्।सिद्धान्ती—इसपर हमारा कथन है कि इन सबमें यह प्रकृत आत्मा ही पदनीय—गन्तव्य है, अन्य (अनात्मा) नहीं। 'अस्य सर्वस्य' इन पदोंमें निश्चयार्थिका षष्ठी है; इसका तात्पर्य 'अस्मिन् सर्वस्मिन्' (इस सबमें) ऐसा है। 'यदयमात्मा' अर्थात् यह जो आत्मतत्त्व है [वह सबमें गन्तव्य—ज्ञातव्य है]।
किं न विज्ञातव्यमेवान्यत् ? न; किं तर्हि ? ज्ञातव्यत्वेऽपि न पृथग्ज्ञानान्तरमपेक्षत आत्मज्ञानात्। कस्मात् ? अनेनात्मनातो क्या अन्य ज्ञातव्य ही नहीं है ? ऐसी बात नहीं है। तो क्या है ?—ज्ञातव्य होनेपर भी उसे आत्मज्ञानसे भिन्न किस ज्ञानान्तरकी अपेक्षा नहीं है। क्यों नहीं है ?