बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 239, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 239
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३३
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी (भाष्यार्थ) |
|---|---|
| ज्ञातेन हि यस्मादेतत्सर्वमनात्मजातम् अन्यद्यत्तत्सर्वं समस्तं वेद जानाति। | क्योंकि इस आत्माके जान लेनेपर ही अन्य जो कुछ अनात्मजात है उस सभीको पुरुष जान लेता है। |
| नन्वन्यज्ञानेनान्यन्न ज्ञायत इति। | पूर्व०—किंतु अन्य पदार्थके ज्ञानसे दूसरेका ज्ञान तो हुआ नहीं करता। |
| अस्य परिहारं दुन्दुभ्यादिग्रन्थेन वक्ष्यामः। कथं पुनरेतत् पदनीयमित्युच्यते—यथा ह वै लोके पदेन, गवादिखुराङ्कितो देशः पदमित्युच्यते तेन पदेन, नष्टं विवित्सितं पशुं पदेनान्वेषमाणोऽनुविन्देल्लभेत्। एवमात्मनि लब्धे सर्वमनुलभत इत्यर्थः। | सिद्धान्ती—इसका निराकरण हम दुन्दुभ्यादि ग्रन्थसे करेंगे। किंतु यह आत्मा पदनीय (गमनीय) किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है—जिस प्रकार लोकमें पदसे—गौ आदिके खुरसे अङ्कित देश 'पद' कहा जाता है, उस पदसे—उस पदके द्वारा खोजनेवाला पुरुष जिसको पाना अभीष्ट है ऐसे खोये हुए पशुको पा लेता है उसी प्रकार आत्माके प्राप्त हो जानेपर पुरुष सभी पा लेता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। |
| नन्वात्मनि ज्ञाते सर्वमन्यज्ज्ञायत इति ज्ञाने प्रकृते, कथं लाभोऽप्रकृत उच्यत इति ? | पूर्व०—किंतु 'आत्माको जाननेपर अन्य सबको जान लेता है' इस प्रकार यहाँ ज्ञानका प्रसंग होनेपर [ 'अनुविन्देत्' इस पदसे ] जिसका कोई प्रसंग नहीं है उस लाभकी बात क्यों कही जाती है ? |
| न; ज्ञानलाभयोरेकार्थत्वस्य विवक्षितत्वात्। आत्मनो ह्यलाभोऽज्ञा- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि ज्ञान और लाभ इनकी एकार्थता ही विवक्षित है। अज्ञान ही आत्माका अलाभ है, अतः ज्ञान ही |