बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 240, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| २३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| नमेव, तस्माज्ज्ञानमेवात्मनो लाभः, नानात्मलाभवदप्राप्तप्राप्तिलक्षण आत्मलाभः, लब्धृलब्धव्ययोर्भेदाभावात् । यत्र ह्यात्मनोऽनात्मा लब्धा, लब्धव्योऽनात्मा । स चाप्राप्त उत्पाद्यादिक्रियाव्यवहितः कारकविशेषोपादानेन क्रियाविशेषमुत्पाद्य लब्धव्यः । | आत्माका लाभ है, अनात्मलाभके समान आत्मलाभ अप्राप्तकी प्राप्ति होना नहीं है, क्योंकि यहाँ लाभ करनेवाले और लब्ध होनेवाली वस्तुमें कोई भेद नहीं है। जहाँ अनात्मा आत्माका लब्धव्य होता है वहाँ ही आत्मा उपलब्ध करनेवाला और अनात्मा उपलब्ध होने योग्य होता है। वह अप्राप्त अर्थात् उत्पाद्यादि क्रियाओंसे व्यवहित होता है तथा कारकविशेषके उपादानसे क्रियाविशेषको उत्पन्न करके उसे प्राप्त करना होता है। | | स त्वप्राप्तप्राप्तिलक्षणोऽनित्यः, मिथ्याज्ञानजनितकामकियाप्रभवत्वात्, स्वप्ने पुत्रादिलाभवत् । | वह अनात्मलाभ तो मिथ्या ज्ञानजनित काम और क्रियासे उत्पन्न होनेवाला होनेके कारण स्वप्नमें पुत्रादिलाभके समान अप्राप्तप्राप्तिरूप और अनित्य होता है; किंतु यह आत्मा तो उससे विपरीत स्वभाववाला है। आत्मा ही होनेके कारण यह उत्पाद्यादि क्रियासे व्यवहित नहीं है। नित्यप्राप्तस्वरूप होनेपर भी अविद्या ही उसका व्यवधान है। जिस प्रकार विपरीत ज्ञानवश रजतरूपसे भासनेवाली गृह्यमाण शुक्तिका ( सीप ) का अग्रहण विपरीत ज्ञानरूप व्यवधानवाला ही है तथा ज्ञान ही उसका ग्रहण है, क्योंकि वह ज्ञान विपरीत ज्ञानरूप | | अयं तु तद्विपरीत आत्मा । आत्मत्वादेव नोत्पाद्यादिक्रियाव्यवहितः । नित्यलब्धस्वरूपत्वेऽपि सत्यविद्यामात्रं व्यवधानम् । यथा गृह्यमाणाया अपि शुक्तिकाय विपर्ययेण रजताभासाया अग्रहणं विपरीतज्ञानव्यवधानमात्रम्, तथा ग्रहणं ज्ञानमात्रमेव, विपरीतज्ञा- | |