बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 241, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| नव्यवधानापोहार्थत्वाज्ज्ञानस्य । एवमिहाप्यात्मनोऽलाभोऽविद्यामात्रव्यवधानम् । तस्माद्विद्यया तदपोहनमात्रमेव लाभो नान्यः कदाचिदप्युपपद्यते । तस्मादात्मलाभे ज्ञानादर्थान्तरसाधनस्यानर्थक्यं वक्ष्यामः । तस्मान्निराशङ्कमेव ज्ञानलाभयोरेकार्थत्वं विवक्षन्नाह—ज्ञानं प्रकृत्य, अनुविन्देदिति । विन्दतेर्लाभार्थत्वात् । | व्यवधानकी निवृत्ति करनेवाला है । इसी प्रकार यहाँ भी आत्माका अलाभ अविद्यामात्र व्यवधानवाला ही है । अतः विद्यासे उसे दूर कर देना ही आत्माका लाभ करना है, इसके सिवा और किसी प्रकारका आत्मलाभ होना कभी सम्भव नहीं है । इसीसे आत्मलाभमें हमने ज्ञानसे भिन्न किसी अन्य साधनकी व्यर्थता बतलायी है । अतः 'ज्ञान' और 'लाभ' इन दोनोंकी एकार्थतामें कुछ भी शङ्का नहीं है—यह बतलानेकी इच्छासे ही श्रुतिने ज्ञानका प्रकरण उठाकर 'अनुविन्देत्' (लाभ करता है) ऐसा कहा है, क्योंकि [तुदादिगणपठित लृकारानुबन्धी] 'विद्' धातुका अर्थ लाभ है । |
| गुणविज्ञानफलमिदमुच्यते—<br><br>(उपासनफलम्)<br>यथायमात्मा नामरूपानुप्रवेशेन ख्यातिं गत आत्मत्यादिनामरूपाभ्यां प्राणादिसंहतिं च श्लोकं प्राप्तवानित्येवं यो वेद, स कीर्त्तिं ख्यातिं श्लोकं च सङ्गतमिष्टैः सह विन्दते लभते । यद्वा यथोक्तं वस्तु यो वेद मुमुक्षूणामपेक्षितं | इस गुणविज्ञानका यह फल बतलाया जाता है—जिस प्रकार यह आत्मा नाम-रूपके अनुप्रवेशसे ख्यातिको तथा आत्मा इत्यादि नाम-रूपोंके कारण प्राणादिसंघातरूप श्लोक (इष्टजनोंके समागम) को प्राप्त हुआ है उसी प्रकार जो ऐसा जानता है वह ख्याति—कीर्ति और श्लोक—इष्टजनोंके साथ समागम लाभ करता है । अथवा जो उपर्युक्त वस्तुको जानता है वह मुमुक्षुओंके अपेक्षित |