बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें२३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
| कीर्तिशब्दितमैक्यज्ञानं तत्फलं<br><br>श्लोकशब्दितां मुक्तिमाप्नोतीति<br><br>मुख्यमेव फलम् ॥७॥ | 'कीर्ति' शब्दसे कहे जानेवाले ऐक्य-ज्ञान और उसके फल 'श्लोक' शब्दसे कही जानेवाली मुक्तिको प्राप्त करता है। अर्थात् उसे आत्म-ज्ञानका मुख्य फल ही प्राप्त हो जाता है ॥७॥ |
निरतिशय प्रियरूपसे आत्माकी उपासना
| कुतश्चात्मतत्त्वमेव ज्ञेयमना-<br>दृत्यान्यदित्याह— | किंतु और सबकी उपेक्षा करके आत्मतत्त्व ही क्यों जाननेयोग्य है? इसपर श्रुति कहती है— |
तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्प्रेयोऽन्यस्मात्सर्वस्मा-
दन्तरतरं यदयमात्मा। स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं
ब्रूयात्प्रियं रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव
प्रियमुपासीत। स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य
प्रियं प्रमायुकं भवति ॥ ८ ॥
वह यह आत्मतत्त्व पुत्रसे अधिक प्रिय है, धनसे अधिक प्रिय है और अन्य सबसे भी अधिक प्रिय है; क्योंकि यह आत्मा उनकी अपेक्षा अन्तरतर है। वह जो आत्मप्रियदर्शी है यदि आत्मासे भिन्न (अनात्मा) को प्रिय कहनेवाले पुरुषसे कहे कि 'तेरा प्रिय नष्ट हो जायगा' तो वैसा ही हो जायगा, क्योंकि वह समर्थ होता है। अतः आत्मा-रूप प्रियकी ही उपासना करे। जो आत्मा-रूप प्रियकी ही उपासना करता है उसका प्रिय अत्यन्त मरणशील नहीं होता ॥ ८ ॥
| तदेतदात्मतत्त्वं प्रेयः प्रियतरं पुत्रात्। पुत्रो हि लोके प्रियः | वह यह आत्मतत्त्व पुत्रसे प्रेय—प्रियतर है। लोकमें पुत्र प्रियरूपसे |