भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 1402 में से

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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३७

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
प्रसिद्धस्तस्मादपि प्रियतरमिति निरतिशयप्रियत्वं दर्शयति। तथा वित्ताद्धिरण्यरत्नादेः, तथा अन्यस्माद्यद्यल्लोके प्रियत्वेन प्रसिद्धं तस्मात्सर्वस्मादित्यर्थः।प्रसिद्ध है, आत्मा उससे भी प्रियतर है, ऐसा कहकर श्रुति उसका निरतिशय प्रियत्व प्रदर्शित करती है। तथा वह धन यानी सुवर्ण-रत्नादिसे और लोकमें जो प्रियरूप-से प्रसिद्ध है उस और सबसे भी प्रियतर है।
तत्कस्मादात्मतत्त्वमेव प्रियतरं न प्राणादि? इत्युच्यते—अन्तरतरं बाह्यात्पुत्रवित्तादेः प्राणपिण्डसमुदायो ह्यन्तरोऽभ्यन्तरः सन्निकृष्ट आत्मनः। तस्मादप्यन्तरादन्तरतरं यदयमात्मा यदेतदात्मतत्त्वम्। यो हि लोके निरतिशयप्रियः स सर्वप्रयत्नेन लब्धव्यो भवति। तथाऽयमात्मा सर्वलौकिकप्रियेभ्यः प्रियतमः। तस्मात्तल्लाभे महान्यत्न आस्थेय इत्यर्थः, कर्त्तव्यताप्राप्तमप्यन्यप्रियलाभे यत्नमुज्झित्वा।किंतु यह क्या बात है कि आत्मतत्त्व ही प्रियतर है, प्राणादि नहीं हैं? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—यह अन्तरतर (अत्यन्त समीपवर्ती) है। पुत्र-धन आदि बाह्य पदार्थोंकी अपेक्षा प्राण और पिण्ड-समुदाय अन्तर—अभ्यन्तर अर्थात् आत्माका समीपवर्ती है और उस अन्तरसे भी अन्तरतर यह जो आत्मा अर्थात् आत्मतत्त्व है वह है। लोकमें जो सबसे बढ़कर प्रिय होता है वह सर्वप्रयत्नद्वारा प्राप्तव्य होता है, तथा यह आत्मा समस्त लौकिक प्रिय पदार्थोंसे प्रियतम है; अतः अभिप्राय यह है कि अन्य प्रिय पदार्थोंकी प्राप्तिके लिये यदि कोई यत्न अवश्यकर्तव्यतारूपसे प्राप्त हो तो भी उसे छोड़कर आत्माकी प्राप्तिके लिये ही महान् यत्न करना चाहिये।
कस्मात्पुनः आत्मानात्मप्रियोरन्यतरप्रियहानेन इतरप्रियो-इसका क्या कारण है कि यदि आत्मा और अनात्मा-इन दो प्रिय पदार्थोंमेंसे किसी एक प्रिय पदार्थका
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