भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 244
२३८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| पादानप्राप्तौ आत्मप्रियोपादानेनै- | त्याग करनेपर ही दूसरे प्रिय पदा- | | वेतरहानं क्रियते न विपर्ययः ? | र्थकी प्राप्ति होती हो तो आत्मा-रूप प्रियको ग्रहण करके अनात्माका | | इत्युच्यते—स यः कश्चिदन्यमना- | ही त्याग किया जाता है, इसके विपरीत नहीं किया जाता ? ऐसा | | त्मविशेषं पुत्रादिकं प्रियतर- | प्रश्न होनेपर कहते हैं—वह जो | | मात्मनः सकाशाद् ब्रुवाणं ब्रूया- | आत्मप्रियवादी है यदि किसी दूसरे यानी पुत्रादि अनात्मविशेषको | | दात्मप्रियवादी । किम् ? प्रियं | आत्माकी अपेक्षा प्रियतर बतलाने- | | तवाभिमतं पुत्रादिलक्षणं रोत्स्य- | वालेसे कहे—क्या कहे ? यही कि ‘तेरा प्रिय यानी पुत्रादिरूप अभि- | | त्यावरणं प्राणसंरोधं प्राप्स्यति । | मत पदार्थ ‘रोत्स्यति’—आवरण | | विनङ्क्ष्यतीति । स कस्मादेवं | यानी प्राणसंरोधको प्राप्त हो जायगा अर्थात् नष्ट हो जायगा।’ ऐसा वह | | ब्रवीति ? यस्मादीश्वरः समर्थः | क्यों कहेगा ? क्योंकि वह ऐसा | | पर्याप्तोऽसावेवं वक्तुं ह यस्मात्त- | कहनेमें ईश्वर अर्थात् समर्थ— | | स्मात्तथैव स्याद्यत्तेनोक्तं प्राण- | पर्याप्त है; क्योंकि ऐसा है, इसलिये वैसा ही होगा । यानी उसने जैसा | | संरोधं प्राप्स्यति । यथाभूतवादी | कहा है वह प्राणसंरोधको प्राप्त हो जायगा। क्योंकि वह यथार्थवादी | | हि सः, तस्मात्स ईश्वरो वक्तुम् । | है, इसलिये ऐसा कहनेमें समर्थ है। | | ईश्वरशब्दः क्षिप्रवाचीति | किन्हींका मत है कि ‘ईश्वर’ | | केचित् । भवेद्यदि प्रसिद्धिः स्यात्। | शब्द क्षिप्र (शीघ्र) इस अर्थमें है। किंतु यदि ऐसी प्रसिद्धि होती तो यह | | तस्मादुज्झित्वान्यत्प्रियमत्मान- | अर्थ हो सकता था। अतः अन्य प्रिय पदार्थोंको छोड़कर आत्मा-रूप प्रिय- | | मेव प्रियमुपासीत । | की ही उपासना करनी चाहिये। |