भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 245

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते,<br><br>आत्मैव प्रियो नान्योऽस्तीति प्रतिपद्यतेऽन्यल्लौकिकं प्रियमप्यप्रियमेवेति निश्चित्य उपास्ते चिन्तयति, न हास्यैवंविदः प्रियं प्रमायुकं प्रमरणशीलं भवति ।<br><br>नित्यानुवादमात्रमेतत्, आत्मविदोऽन्यस्य प्रियस्याप्रियस्य चाभावात् । आत्मप्रियग्रहणस्तुत्यर्थं वा प्रियगुणफलविधानार्थं वा मन्दात्मदर्शिनः । ताच्छील्यप्रत्ययोपादानात् ॥ ८ ॥जो पुरुष आत्मा-रूप प्रियकी ही उपासना करता है अर्थात् आत्मा ही प्रिय है, और कोई पदार्थ नहीं—ऐसा जानता है, दूसरे लौकिक पदार्थ प्रिय होनेपर भी अप्रिय ही हैं—ऐसा निश्चय करके उपासना यानी चिन्तन करता है उस इस प्रकार उपासना करनेवालेका प्रिय प्रमायुक—प्रकृष्टतया मरणशील नहीं होता ।<br><br>आत्मवेत्ताकी दृष्टिमें तो किसी अन्य प्रिय या अप्रियकी सत्ता ही नहीं है, इसलिये यह नित्य वस्तुका अनुवादमात्र है । अथवा यह कथन आत्मप्रियग्रहणकी स्तुतिके लिये है । या जो अदृढ़ आत्मज्ञानी है उसके लिये प्रियगुणविशिष्ट आत्माकी उपासनाका फल बतलानेके लिये है, क्योंकि 'प्रमायुक' इस पदमें 'उक' यह ताच्छील्य¹प्रत्यय ग्रहण किया गया है ॥ ८ ॥

ब्रह्मके सर्वरूप होनेके विषयमें प्रश्न

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
सूत्रिता ब्रह्मविद्या 'आत्मेत्ये-जिसके लिये यह सारी उपनिषद् है उस ब्रह्मविद्याका श्रुतिने 'आत्मेत्ये-

१. यह उसका शील यानी स्वभाव है--इस अर्थमें व्याकरणशास्त्रमें 'उकञ्' प्रत्ययका विधान किया है । पदार्थ अपने स्वभावको सर्वथा नहीं त्याग सकता । इसलिये 'प्रमायुक' नहीं होता । इस कथनसे प्राणादिका आत्यन्तिक अमरण विवक्षित नहीं है; केवल यही समझना चाहिये कि वे दीर्घजीवी होते हैं ।