भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 246
२४०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| वोपासीत' इति यदर्थोपनिषत्कृत्स्नापि। तस्यैतस्य सूत्रस्य व्याचिख्यासुः प्रयोजनाभिधित्सयोपोद्दिघांसति— | वोपासीत' इस वाक्यसे सूत्ररूपसे वर्णन किया है। उस इस सूत्रकी व्याख्या करनेकी इच्छावाली श्रुति अब उसका प्रयोजन बतलानेकी इच्छासे उपोद्घात करना चाहती है |

तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते। किमु तद्ब्रह्मावेद्यस्मात्तत्सर्वमभवदिति ॥ ९ ॥

[ ब्राह्मणोंने ] यह कहा कि ब्रह्मविद्याके द्वारा मनुष्य 'हम सर्व हो जायँगे' ऐसा मानते हैं; [ सो ] उस ब्रह्मने क्या जाना जिससे वह सर्व हो गया ? ॥ ९ ॥

| तदिति वक्ष्यमाणमनन्तरवाक्येऽवद्योत्यं वस्त्वाह। ब्राह्मणा | 'तत्' इस पदसे आगे कही जानेवाली तथा बिना किसी व्यवधानके ही अग्रिम वाक्यसे प्रकाशनीय वस्तुका ग्रहण होता है उसके विषयमें ब्राह्मणोंने कहा। ब्राह्मण— | | ब्रह्म विविदिषवो जन्मजरामरणप्रबन्धचक्रभ्रमणकृतायासदुःखोदकापारमहोदधिप्लवभूतं गुरुमासाद्य तत्तीरमुत्तितीर्षवो धर्माधर्मसाधनतत्फललक्षणात् साध्य- | ब्रह्मको जाननेकी इच्छावाले अर्थात् जन्म, जरा और मरण इनके प्रवाहमें चक्रके समान निरन्तर भ्रमणसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख ही जिसमें जल है उस अपार संसार-महोदधिको पार करनेके लिये नौकारूप जो गुरु हैं उनके पास आकर उसके तीर ( ब्रह्म ) पर उतरनेकी इच्छावाले यानी धर्म और अधर्म ही जिसके साधन और फल हैं उस साध्य-साधनरूप संसारसे |