भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 247

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २४१


| साधनरूपान्निर्विण्णाः तद्विलक्षणनित्यनिरतिशयश्रेयः प्रतिपित्सवः ।<br><br>किमाहुरित्याह—यद्ब्रह्मविद्यया, ब्रह्म परमात्मा तद्यया वेद्यते सा ब्रह्मविद्या तया ब्रह्मविद्यया, सर्वं निरवशेषं भविष्यन्तो भविष्याम इत्येवं मनुष्या यन्मन्यन्ते। मनुष्यग्रहणं विशेषतोऽधिकारज्ञापनार्थम्। मनुष्या एव हि विशेषतोऽभ्युदयनिःश्रेयससाधनेऽधिकृता इत्यभिप्रायः ।<br><br>यथा कर्मविषये फलप्राप्तिं ध्रुवां कर्मभ्यो मन्यन्ते, तथा ब्रह्मविद्याया सर्वात्मभावफलप्राप्तिं ध्रुवामेव मन्यन्ते। वेदप्रामाण्यस्योभयत्राविशेषात्। तत्र विप्रतिषिद्धं वस्तु लक्ष्यतेऽतः पृच्छामः—किमु तद्ब्रह्म यस्य | विरक्त और उससे विलक्षण स्वभाववाले नित्य-निरतिशय श्रेयको जाननेकी इच्छावाले उन ब्राह्मणोंने कहा।<br><br>क्या कहा ? सो श्रुति बतलाती है—'यद्ब्रह्मविद्यया'—ब्रह्म परमात्माको कहते हैं, वह जिससे जाना जाता है वह ब्रह्मविद्या है; उस ब्रह्मविद्यासे जो मनुष्य 'हम सर्व यानी अशेष हो जायँगे' ऐसा मानते हैं [उसके विषयमें पूछा]। यहाँ 'मनुष्य' पदका ग्रहण उनका विशेषरूपसे ब्रह्मविद्यामें अधिकार सूचित करनेके लिये है। तात्पर्य यह है कि अभ्युदय और निःश्रेयसके साधनमें विशेषतः मनुष्योंका ही अधिकार है।<br><br>लोग जिस प्रकार कर्मविषयमें कर्मोंसे होनेवाली जो फलप्राप्ति है उसे निश्चित मानते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यासे सर्वात्मभावरूप फलकी प्राप्ति भी निश्चित ही मानते हैं, क्योंकि वेदकी प्रमाणता दोनोंहीके विषयमें समान है। किंतु [ब्रह्मज्ञानसे मोक्ष होता है] यह बात विपरीत-सी जान पड़ती है, इसलिये हम पूछते हैं कि वह ब्रह्म क्या है ? जिसके |


बृ० उ० १६—