भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 248
२४२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| विज्ञानात्सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते ? तत्किमवेद्यस्माद्विज्ञानात्तद्ब्रह्म सर्वमभवत् ? | विज्ञानसे मनुष्य 'सर्वरूप हो जायेंगे' ऐसा मानते हैं और उसने क्या जाना, जिस विज्ञानसे वह ब्रह्म सर्वरूप हो गया । | | ब्रह्म च सर्वमिति श्रूयते । | ब्रह्म सर्वरूप है—यह तो सुना ही जाता है । | | तद्यद्यविज्ञाय किञ्चित्सर्वमभवत्तथान्येषामप्यस्तु, किं ब्रह्मविद्यया? | वह यदि कुछ भी न जानकर ही सर्वरूप हुआ है तो दूसरोंके लिये भी ऐसी ही बात होनी चाहिये, फिर ब्रह्मविद्यासे क्या लाभ है ? | | अथ विज्ञाय सर्वमभवत्, विज्ञानसाध्यत्वात्कर्मफलेन तुल्यमेवेत्यनित्यत्वप्रसङ्गः सर्वभावस्य ब्रह्मविद्याफलस्य । | और यदि वह जानकर सर्वरूप हुआ है तो विज्ञानसाध्य होनेके कारण उसकी सर्वात्मता कर्मफलके समान ही है—इससे ब्रह्मविद्याके फलभूत सर्वात्मत्वकी अनित्यताका प्रसंग आता है | | अनवस्थादोषश्च—तदप्यन्यद्विज्ञाय सर्वमभवत्ततः पूर्वमप्यन्यद्विज्ञायेति । | तथा वह अपनेसे भिन्न पदार्थको जानकर सर्व हुआ और इससे पहले भी किसी अन्यको जानकर सर्व हुआ था—इस प्रकार अनवस्था दोष प्राप्त होता है । | | न तावदविज्ञाय सर्वमभवत्, शास्त्रार्थवैरूप्यदोषात् । | किंतु वह न जानकर तो सर्व हुआ नहीं, क्योंकि इससे शास्त्रकी व्यर्थताका दोष आता है । | | फलानित्यत्वदोषस्तर्हि ? नैकोऽपि दोषोऽर्थवशोषपत्तेः ॥ ९ ॥ | तो फिर फलकी अनित्यताका दोष रहा ? नहीं, इससे विशेष प्रयोजन सम्भव होनेके कारण एक भी दोष नहीं होगा ॥ ६ । |