बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 249, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३
ब्रह्मने क्या जाना ?—इसका उत्तर और उस प्रकार जाननेका फल—
| यदि किमपि विज्ञायैव तद्ब्रह्म सर्वमभवत्पृच्छामः—किमु तद्ब्रह्मावेत् ? यस्मात्तत्सर्वमभवदिति। एवं चोदिते सर्वदोषानागन्धितं प्रतिवचनमाह— | यदि वह ब्रह्म कुछ जानकर ही सर्व हुआ तो हम पूछते हैं—'उस ब्रह्मने क्या जाना ? जिससे वह सर्व हुआ।' ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति, जिसमें किसी भी प्रकारके दोषकी गन्ध नहीं है, ऐसा उत्तर देती है— |
ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेत् । अहं ब्रह्मास्मीति । तस्मात्तत्सर्वमभवत्तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदे ऽहं मनुरभव ँ सूर्य्यश्चेति । तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इद ँ सर्वं भवति तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशते । आत्मा ह्येषा ँ स भवति । अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेव ँ स देवानाम् । यथा ह वै बहवः पशवो मनुष्यं भुञ्जुरेवमेकैकः पुरुषो देवान्भुनक्त्येकस्मिन्नेव पशावादीयमानेऽप्रियं भवति किमु बहुषु तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः ॥ १० ॥
पहले यह ब्रह्म ही था; उसने अपनेको ही जाना कि "मैं ब्रह्म हूँ"। अतः वह सर्व हो गया। उसे देवोंमेंसे जिस-जिसने जाना वही तद्रूप हो गया। इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्योंमेंसे भी [ जिसने उसे जाना वह तद्रूप हो गया ]। उसे आत्मारूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना—'मैं मनु हुआ और सूर्य भी' उस इस ब्रह्मको इस समय भी जो इस प्रकार जानता है कि 'मैं ब्रह्म हूँ', वह यह सर्व हो जाता है। उसके पराभवमें