भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 250
२४४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

देवता भी समर्थ नहीं होते; क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है। और जो अन्य देवताकी 'यह अन्य है और मैं अन्य हूँ' इस प्रकार उपासना करता है वह नहीं जानता। जैसे पशु होता है वैसे ही वह देवताओंका पशु है। जैसे लोकमें बहुत-से पशु मनुष्यका पालन करते हैं, उसी प्रकार एक-एक मनुष्य देवताओंका पालन करता है। एक पशुका ही हरण किये जानेपर अच्छा नहीं लगता, फिर बहुतोंका हरण होनेपर तो कहना ही क्या है? इसलिये देवताओंको यह प्रिय नहीं है कि मनुष्य [ ब्रह्मात्मतत्त्वको ] जानें ॥ १० ॥

| (ब्रह्मशब्देन किमभिप्रेतमिति विचार्यते)<br><br>ब्रह्मापरम्, सर्वभावस्य साध्यत्वोपपत्तेः। न हि परस्य ब्रह्मणः सर्वभावापत्तिर्विज्ञानसाध्या। विज्ञानसाध्यां च सर्वभावापत्तिमाह—'तस्मात्तत्सर्वमभवत्' इति। तस्माद्ब्रह्म वा इदमग्र आसीदित्यपरं ब्रह्मैव भवितुमर्हति।<br><br>मनुष्याधिकाराद्वा तद्भावी ब्राह्मणः स्यात्। 'सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते' इति हि मनुष्याः प्रकृताः, तेषां चाभ्युदयनिःश्रेयससाधने विशेषतोऽधिकार इत्युक्तम्, न परस्य ब्रह्मणो नाप्यपरस्य प्रजापतेः। अतो द्वैतैकत्वापर- | यहाँ 'ब्रह्म' शब्दसे अपरब्रह्म समझना चाहिये; क्योंकि उसीका सर्वरूप होना विज्ञान-साध्य हो सकता है। परब्रह्मका सर्वभावको प्राप्त होना विज्ञानसाध्य नहीं है; और 'इसीसे वह सर्वरूप हो गया' इस वाक्यसे श्रुति सर्वभावप्राप्तिको विज्ञानसाध्य बतलाती है। अतः 'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्' इस वाक्यमें 'ब्रह्म' पद अपर ब्रह्मका वाचक होना चाहिये।<br><br>अथवा यहाँ मनुष्यका अधिकरण होनेसे 'ब्रह्म' शब्दसे ब्रह्मरूपताको प्राप्त होनेवाला ब्राह्मण समझा जा सकता है। 'सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते' इस वाक्यसे यहाँ मनुष्योंका प्रसंग है, क्योंकि उन्हींका अभ्युदय और निःश्रेयसके साधनमें विशेषरूपसे अधिकार है—ऐसा ऊपर कहा गया है; परब्रह्म या अपरब्रह्म प्रजापतिका नहीं। अतः कर्मसहित द्वैतैकत्वरूप |