बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २४५
| ब्रह्मविद्यया कर्मसहितया अपरब्रह्मभावमुपसम्पन्नो भोज्यादपावृत्तः सर्वप्राप्त्योच्छिन्नकाम-कर्मबन्धनः परब्रह्मभावी ब्रह्मविद्याहेतोर्ब्रह्मेत्यभिधीयते । | अपर ब्रह्मविद्याके द्वारा अपरब्रह्मभावको प्राप्त हुआ, हिरण्यगर्भसम्बन्धी भोगोंसे विरक्त एवं सब प्रकारके कर्मफल प्राप्त होनेके कारण जिसका काम और कर्मरूप बन्धन नष्ट हो गया है वह परब्रह्मभावको प्राप्त होनेवाला पुरुष ब्रह्मविद्याके कारण 'ब्रह्म'—इस शब्दसे कहा गया है। | | दृष्टश्च लोके भाविनीं वृत्तिमाश्रित्य शब्दप्रयोगः—यथा 'ओदनं पचति' इति, शास्त्रे च—'परिव्राजकः सर्वभूताभयदक्षिणाम्' इत्यादि, तथेहेति केचित्—ब्रह्म ब्रह्मभावी पुरुषो ब्राह्मणः—इति व्याचक्षते । | लोकमें भी भाविनी वृत्तिको आश्रित करके शब्दका प्रयोग होता देखा गया है; जैसे 'भात पकाता है', इस वाक्यमें। तथा शास्त्रमें भी—'संन्यासी समस्त भूतोंको अभयरूप दक्षिणा [ देकर संन्यास करे ]' इत्यादि वाक्यमें ऐसा ही प्रयोग है। उसी प्रकार यहाँ भी 'ब्रह्मभावको प्राप्त होनेवाला ब्राह्मण ही 'ब्रह्म' है' ऐसी व्याख्या कुछ लोग करते हैं। | | तन्न, सर्वभावापत्तेरनित्यत्वदोषात् । न हि सोऽस्ति लोके परमार्थतो यो निमित्तवशाद्भावा- | किन्तु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इससे सर्वभावप्राप्तिको अनित्यत्वका दोष प्राप्त होगा। लोकमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो वास्तवमें किसी निमित्तवश भावान्तरको प्राप्त होती |
१. चावलोंके पकनेपर उनकी ओदन ( भात ) संज्ञा होती है, किंतु इस वाक्यमें पकाये जाते हुए चावलोंको भात कहा है।
२. संन्यासाश्रमकी दीक्षा लेनेके पीछे पुरुषको संन्यासी कहा जाता है, परंतु यहाँ दीक्षा लेनेवालेको भी संन्यासी कहा है।