बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| २४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| न्तरमापद्यते नित्यश्चेति । तथा<br><br>ब्रह्मविज्ञाननिमित्तकृता चेत्सर्व-<br><br>भावापत्तिः, नित्या चेति विरुद्धम्।<br><br>अनित्यत्वे च कर्मफलतुल्यते-<br><br>त्युक्तो दोषः ।<br><br>अविद्याकृतासर्वत्वनिवृत्तिं चे-<br><br>त्सर्वभावापत्तिं ब्रह्मविद्याफलं मन्य-<br><br>से, ब्रह्मभाविपुरुषकल्पना व्यर्था<br><br>स्यात्; प्राग्ब्रह्मविज्ञानादपि सर्वो<br><br>जन्तुर्ब्रह्मत्वान्नित्यमेव सर्वभावा-<br><br>पन्नः परमार्थतः, अविद्यया त्व-<br><br>ब्रह्मत्वमसर्वत्वं चाध्यारोपितम्<br><br>यथा शुक्तिकायां रजतम्, व्योम्नि<br><br>वा तलमलवत्त्वादि, तथेह ब्रह्मण्य-<br><br>ध्यारोपितमविद्यया अब्रह्मत्वम-<br><br>सर्वत्वं च ब्रह्मविद्यया निवर्त्यत<br><br>इति मन्यसे यदि, तदा युक्तम्<br><br>'यत्परमार्थत आसीत्परं ब्रह्म, ब्रह्म-<br><br>शब्दस्य मुख्यार्थभूतम् 'ब्रह्म वा<br><br>इदमग्र आसीत्' इत्यस्मिन्वाक्ये | हो और नित्य भी हो । इसी प्रकार यदि सर्वभावकी प्राप्ति भी ब्रह्म-विज्ञानरूप निमित्तसे होनेवाली हो तो वह नित्य भी है—ऐसा कहना विरुद्ध होगा । और यदि उसे अनित्य माना जाय तो वह भी कर्मफलके ही समान हुई [ उसमें कोई विशेषता न रही ]—यह दोष बतलाया जा चुका है।<br><br>यदि तुम अविद्याकृत असर्व-त्वकी निवृत्तिको ही ब्रह्मविद्याका सर्वभावप्राप्तिरूप फल मानते हो तो [ 'ब्रह्म' शब्दके अर्थमें ] ब्रह्म होने-वाले पुरुषकी कल्पना करना व्यर्थ है, क्योंकि ब्रह्मज्ञान होनेसे पूर्व भी सब जीव ब्रह्मरूप ही होनेके कारण सदा ही परमार्थतः सर्वभावको प्राप्त हैं । अब्रह्मत्व और असर्वत्व तो अवि-द्यासे ही आरोपित हैं । जैसे शुक्तिमें चाँदी और आकाशमें तलमलिन्यादि आरोपित हैं, उसी प्रकार यहाँ ब्रह्ममें अविद्यासे आरोपित अब्रह्मत्व और असर्वत्वकी ब्रह्मविद्यासे निवृत्ति हो जाती है—ऐसा यदि तुम मानते हो तब यही कहना उचित है कि 'जो परमार्थतः ब्रह्म-शब्दका मुख्यार्थभूत परब्रह्म है वही 'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्' इस वाक्यमें कहा |