भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 237

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २३१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
प्रतिषेधोऽकृत्स्नत्वदोषाभिप्रायेण नात्मोपास्यत्वप्रतिषेधाय । प्राणनादिक्रियाविशिष्टत्वेन विशेषणात् । आत्मनश्चेदुपास्यत्वमनभिप्रेतं प्राणनाद्येकैकक्रियाविशिष्टस्यात्मनोऽकृत्स्नत्ववचनमनर्थकं स्यात् “अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवति” (१ । ४ । ७) इति । अतोऽनेकैकविशिष्टस्त्वात्मा कृत्स्नत्वादुपास्य एवेति सिद्धम् ।<br><br>यस्त्वात्मशब्दस्य इतिपरः प्रयोगः, आत्मशब्दप्रत्यययोः आत्मतत्त्वस्य परमार्थतोऽविषयत्वज्ञापनार्थम्, अन्यथा आत्मानमुपासीतेत्येवमवक्ष्यत् । तथा चार्थादात्मनि शब्दप्रत्ययावनुज्ञातौ स्याताम्; तच्चानिष्टम्, “नेति नेति” (२ । ३ । ६) “विज्ञातारमरे केन विजानीयात्”, (२ । ४ । १४) “अविज्ञातं विज्ञातृ” (३ । ८ । १२) “यतोहै । अर्थात् आत्माके दर्शनका प्रतिषेध तो उसमें असम्पूर्णतारूप दोषके अभिप्रायसे है, आत्माके उपास्यत्वका प्रतिषेध करनेके अभिप्रायसे नहीं है, क्योंकि प्राणनादि क्रियाविशिष्टत्वसे उसे विशेषित किया गया है । यदि आत्माका उपास्यत्व अभिप्रेत न होता तो “अकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन भवति”¹ इस वाक्यसे प्राणनादि एक-एक क्रियासे विशिष्ट आत्माको असम्पूर्ण बतलाना व्यर्थ होता । अतः यह सिद्ध होता है कि जो एक-एक क्रियासे विशिष्ट नहीं है, वह आत्मा तो पूर्ण होनेके कारण उपास्य ही है ।<br><br>तथा ‘आत्मा’ शब्दका जो उसके आगे ‘इति’ शब्द लगाकर प्रयोग किया गया है वह आत्मतत्त्वको परमार्थतः आत्मशब्द और आत्मप्रत्ययका अविषय सूचित करनेके लिये है । नहीं तो श्रुति ‘आत्मानमुपासीत’—आत्माकी उपासना करे—ऐसा ही कहती । ऐसा कहनेपर आत्मामें स्वतः ही आत्मशब्द और आत्मप्रत्ययकी विषयता अनुमोदित हो जाती और ऐसा होना “यह नहीं है, यह नहीं है”, “अरे मैत्रेयि ! विज्ञाताको किससे जाने”, “वह [स्वयं] अविज्ञात [किंतु दूसरोंका] विज्ञाता

१. अतः एक-एक क्रियासे विशिष्ट होनेके कारण यह असम्पूर्ण ही होता है ।

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