बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 236, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| २३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| श्रूयते। इतिपरश्चात्मशब्दः 'आत्मेत्येवोपासीत' इति। अतो नात्मोपास्य आत्मगुणश्चान्य इति त्ववगम्यते। | नहीं सुनी जाती और 'आत्मेत्येवोपासीत' इसमें 'आत्मा' शब्दके आगे 'इति' भी है। अतः यही ज्ञात होता है कि यहाँ 'आत्मा' उपास्य नहीं है, अपितु आत्माके समान गुणवाला उससे भिन्न—अनात्मा ही उपास्य है। | | न; वाक्यशेष आत्मन उपास्यत्वेनावगमात्। अस्यैव वाक्यस्य शेषे आत्मैवोपास्यत्वेनावगम्यते—"तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्मा", (बृ० उ० १।४।७) "अन्तरतरं यदयमात्मा" (बृ०उ० १।४।८) "आत्मानमेवावेत्" (१।४।१०) इति। | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वाक्यशेषमें आत्मा ही उपास्यरूपसे जाना गया है। इसी वाक्यके अन्तमें उपास्यरूपसे आत्मा ही जाना जाता है, यथा—"यह जो आत्मा है वही इस सम्पूर्ण जगत्का प्राप्तव्य है", "यह जो आत्मा है अन्तरतर है", "आत्माहीको जाना" इत्यादि। | | प्रविष्टस्य दर्शनप्रतिषेधादनुपास्यत्वमिति चेत्। यस्यात्मनः प्रवेश उक्तः तस्यैव दर्शनं वार्यते "तं न पश्यन्ति" (४।३।२३) इति प्रकृतोपादानात्। तस्मादात्मनोऽनुपास्यत्वमेवेति चेत्! | पूर्व०- किंतु [शरीरके भीतर] प्रविष्ट आत्माके दर्शनका प्रतिषेध होनेसे तो उसका अनुपास्यत्व सिद्ध होता है। जिस आत्माका प्रवेश बतलाया गया है उसीके दर्शनका "तं¹ न पश्यन्ति" इस वाक्यके 'तम्' पदसे ग्रहण करके निषेध करते हैं। अतः आत्माका अनुपास्यत्व ही सिद्ध होता है। | | न, अकृत्स्नत्वदोषात्। दर्शन- | सिद्धान्ती—यह बात नहीं है, वह तो असम्पूर्णतारूपदोषके कारण |
१. उसे नहीं देखते।