भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 235

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २२९


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
इत्यवोचाम। तस्मात् प्राप्तविज्ञान-स्मृतिसन्ताननियमविध्यर्थानि “विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत” इत्यादि-वाक्यानि, अन्यार्थासम्भवात्।हम कह चुके हैं कि आत्मज्ञान होनेपर वह प्राप्त है ही। अतः “विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत” इत्यादि वाक्य प्राप्त विज्ञानकी स्मृतिके प्रवाहकी नियम-विधिके लिये ही हैं, क्योंकि उनका अन्य अर्थ होना असम्भव है।
नन्वनात्मोपासनमिदम्, इति-शब्दप्रयोगात्; यथा 'प्रियमित्‍येतदुपासीत' इत्यादौ न प्रियादि-गुणा एवोपास्याः, किं तर्हि ? प्रियादिगुणवत्प्राणाद्येवोपास्यम्; तथेहापि इतिपरात्मशब्दप्रयोगाद् आत्मगुणवदनात्मवस्तूपास्यमिति गम्यते।पूर्व०—किंतु 'आत्मा' शब्दके आगे 'इति' शब्दका प्रयोग होनेसे यह अनात्मोपासना जान पड़ती है। जिस प्रकार 'प्रियमित्‍येतदुपासीत' इत्यादि वाक्योंमें प्रियादि गुण ही उपास्य नहीं हैं; तो फिर कौन उपास्य है ? प्रियादि गुणवान् प्राणादि ही उपास्य हैं, उसी प्रकार यहाँ भी 'इति' जिसके आगे है ऐसे 'आत्मा' शब्दका प्रयोग होनेसे यही जान पड़ता है कि आत्माके समान गुणोंवाली अनात्मवस्तु ही उपास्य है।
आत्मोपास्यत्ववाक्यवैलक्षण्याच्च, परेण च वक्ष्यति—“आत्मानमेव लोकमुपासीत” (१।४।१५) इति। तत्र च वाक्ये आत्मैवो-पास्यत्वेनाभिप्रेतो द्वितीयाश्रवणा-दात्मानमेवेति। इह तु न द्वितीयाइसके सिवा आत्माका उपास्यत्व बतलानेवाले वाक्यसे इसकी विलक्ष-णता होनेके कारण भी यह वाक्य अनात्मोपासनसम्बन्धी ही है। आगे श्रुति कहेगी “आत्मानमेवं लोक-मुपासीत ।” वहाँ इस वाक्यमें उपास्यरूपसे आत्मा ही अभिप्रेत है, क्योंकि 'आत्मानमेव' इस प्रकार 'आत्मानम्' पदमें वहाँ द्वितीया सुनी जाती है; किंतु यहाँ द्वितीया

१. यह प्रिय है—इस प्रकार उपासना करे।
२. 'आत्मा' रूप ही लोककी उपासना करे।

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