भारतकोश
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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

९७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

९७८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| ब्राह्मणसुवर्णहर्ता, भ्रूणघ्ना सह पाठादवगम्यते—स तेन घोरेण कर्मणैतस्मिन् काले विनिर्मुक्तो भवति, येनायं कर्मणा महापातकी स्तेन उच्यते । | ब्राह्मणका सुवर्ण चुरानेवाला, यह, बात स्तेन शब्दका भ्रूणहाके साथ पाठ होनेसे जानी जाती है,¹ वह इस कालमें उस घोर कर्मसे मुक्त हो जाता है, जिस कर्मके कारण कि यह महापापी स्तेन ( चोर ) कहा जाता है । | | तथा भ्रूणहाऽभ्रूणहा; तथा चाण्डालो न केवलं प्रत्युत्पन्नेनैव कर्मणा विनिर्मुक्तः, किं तर्हि ? सहजेनाप्यत्यन्त निकृष्टजातिप्रापकेणापि विनिर्मुक्त एवायम्, चाण्डालो नाम शूद्रेण ब्राह्मण्यामुत्पन्नश्चण्डाल एव चाण्डालः, स जातिनिमित्तेन कर्मणाऽसम्बद्धत्वादचाण्डालो भवति । पौल्कसः, पुल्कस एव पौल्कसः, शूद्रेणैव क्षत्रियायामुत्पन्नः, सोऽप्यपौल्कसो भवति । | इसी प्रकार भ्रूणहत्या ( श्रेष्ठ ब्राह्मणकी हत्या ) करनेवाला अभ्रूणहा हो जाता है; तथा चाण्डाल केवल आगन्तुक कर्मसे ही मुक्त नहीं होता, तो फिर क्या-क्या होता है ? वह अत्यन्त निकृष्ट जातिकी प्राप्ति करानेवाले अपने स्वाभाविक कर्मसे भी मुक्त हो जाता है; चाण्डाल--शूद्रसे ब्राह्मणीमें उत्पन्न हुए चण्डालको कहते हैं, वह चण्डाल ही चाण्डाल है । वह अपने जाति सम्बन्धी कर्मसे असम्बद्ध होनेके कारण अचाण्डाल हो जाता है । पौल्कस – शूद्रसे क्षत्राणीमें उत्पन्न हुआ पुल्कस ही पौल्कस कहलाता है; वह भी अपौल्कस हो जाता है । | | तथा आश्रमलक्षणैश्च कर्मभिरसम्बद्धो भवतीत्युच्यते, श्रमणः | इसी प्रकार पुरुष आश्रमसम्बन्धी कर्मोंसे भी असम्बद्ध हो जाता है, सो बतलाते हैं-श्रमण अर्थात् जिस |


१. 'भ्रूणहा' श्रेष्ठ ब्राह्मणकी हत्या करनेवालेको कहते हैं, इसलिये 'स्तेन' शब्दसे भी साधारण चोर न समझकर ब्राह्मणका सुवर्ण चुरानेवाला समझना चाहिये ।

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्याथ | ९७९ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्याथ९७९

| परिव्राट्—यत्कर्मनिमित्तो भवति, स तेन विनिर्मुक्तत्वादश्रमणः; तथा तापसो वानप्रस्थोऽतापसः। सर्वेषां वर्णाश्रमादीनाम् उपलक्षणार्थमुभयोर्ग्रहणम् । | कर्मके कारण पुरुष परिव्राट् होता है, उससे मुक्त होनेके कारण वह अश्रमण हो जाता है तथा तापस यानी वानप्रस्थ अतापस हो जाता है। इन दोनोंका ग्रहण सम्पूर्ण वर्ण और आश्रमोंके उपलक्षके लिये है। | | किं बहुना ? अनन्वागतम्—नान्वागतमनन्वगतम् असम्बद्धमित्येतत्, पुण्येन शास्त्रविहितेन कर्मणा, तथा पापेन विहिताकरणप्रतिषिद्धक्रियालक्षणेन; रूपपरत्वान्नपुंसकलिङ्गम्; 'अभयं रूपम्' इति ह्यनुवर्तते । | अधिक क्या, वह पुण्य अर्थात् शास्त्रविहित कर्मसे अनन्वागत—असम्बद्ध रहता है तथा विहितका न करना और अविहितका - करनारूप पापसे भी असम्बद्ध रहता है; रूपपरक होनेके कारण अनन्वागतम् ऐसा नपुंसकलिंग प्रयोग किया गया है; क्योंकि 'अभयं रूपम्' इसकी यहां अनुवृत्ति की जाती है। | | किं पुनरसम्बद्धत्वे कारणम् ? इति तद्धेतुरुच्यते—तीर्णोऽतिक्रान्तः, हि यस्मात् एवंरूपः, तदा तस्मिन् काले सर्वाञ्छोकान्—शोकाः कामाः, इष्टविषयप्रार्थना हि तद्विषयवियोगे शोकत्वमापद्यते। इष्टं हि विषयमप्राप्तं वियुक्तं चोद्दिश्य चिन्तयानस्तद्गुणान् संतप्यते पुरुषः, अतः शोकोऽरतिः काम इति पर्यायाः । | किंतु उसको असम्बद्धतामें कारण क्या है ? सो उसका हेतु बतलाया जाता है—चूँकि उस समय इस प्रकारका यह पुरुष सम्पूर्ण शोकोंको पार कर जाता है; शोक अर्थात् काम, क्योंकि इष्ट विषयकी प्रार्थना ही उस विषयका वियोग होनेपर शोकरूप हो जाती है। अप्राप्त अथवा वियुक्त हुए इष्टविषयके उद्देश्यसे उसके गुणोंका चिन्तन करनेवाला पुरुष संतप्त होता है, इसलिये शोक, अरति, काम-ये पर्याय शब्द हैं। |

९८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

९८०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
यस्मात् सर्वकामातीतो ह्यत्रायं भवति, 'न कञ्चन कामं कामयते' 'अतिच्छन्दा' इति ह्युक्तम्, तत्प्रक्रियापतितोऽयं शोकशब्दः कामवचन एव भवितुमर्हति । कामश्च कर्महेतुः, वक्ष्यति हि— स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते' इति । अतः सर्वकामातितीर्णत्वाद् युक्तमुक्तम्—'अनन्वागतं पुण्‍येन' इत्यादि ।क्योंकि इस अवस्थामें पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंसे पार हो जाता है, कारण, 'वह किसी कामको कामना नहीं करता', अतिच्छन्दा है' ऐसा उसके विषयमें कहा गया है, इसलिये उस प्रकरणमें आया हुआ यह 'शोक' शब्द कामका ही वाचक होना चाहिये । काम ही कर्मका कारण है; श्रुति ऐसा कहेगी भी कि 'वह जैसी कामनावाला होता है, वैसे संकल्पवाला होता है, और जैसे संकल्पवाला होता है वैसा कर्म करता है।' अतः समस्त कर्मोंसे अतिक्रान्त होनेके कारण 'वह पुण्यसे असम्बद्ध है' इत्यादि कथन ठीक ही है ।
हृदयस्य-हृदयमिति पुण्डरीकाकारो मांसपिण्डः, तत्स्थमन्तःकरणं बुद्धिर्हृदयमित्युच्यते; तात्स्थ्यात्, मञ्चक्रोशनवत् । हृदयस्य बुद्धेर्ये शोकाः बुद्धिसंश्रया हि ते, "कामः संकल्पो विचिकित्‍सेत्यादि सर्वं मन एव" (१ । ५ । ३)'हृदयस्य'—हृदय कमलके आकारवाले मांसपिण्डको कहते हैं, उसमें स्थित अन्तःकरण अर्थात् बुद्धि हृदयस्थ होनेके कारण मञ्चके चिल्लानेके^१ समान 'हृदय' कही जाती है । हृदयके अर्थात् बुद्धिके जो शोक हैं; वे बुद्धिके ही आश्रित होते हैं; क्योंकि "काम, संकल्प, विचिकित्सा—ये सब

१. जिस प्रकार 'मञ्चाः क्रोशन्ति' ( मञ्च चिल्लाते हैं ) इस वाक्यके 'मञ्च' शब्दसे मञ्चस्थ पुरुष ग्रहण किये जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ 'हृदय' शब्दसे हृदयस्थ बुद्धि ग्रहण करनी चाहिये ।

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९८१

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९८१


इत्युक्तत्वात् । वक्ष्यति च-- "कामा येऽस्य हृदि श्रिताः" (४।४।७) इति ।मन ही है" ऐसा कहा गया है। तथा "जो काम इसके हृदयमें आश्रित हैं" ऐसा श्रुति कहेगी भी।
आत्मसंश्रयभ्रान्त्यपनोदाय हीदं वचनम्, हृदि श्रिता हृदयस्य शोका इति च हृदयकरणसम्बन्धातीतश्चायमस्मिन् काले "अतिक्रामति मृत्यो रूपाणि" (४।३।७) इति ह्युक्तम् । हृदयकरणसम्बन्धातीतत्वात्, तत्संश्रयकामसम्बन्धातीतो भवतीति युक्ततरं वचनम् ।'हृदि श्रिताः' 'हृदयस्य शोकाः' ये वचन शोकादिके आत्माश्रयत्वकी भ्रान्तिका निराकरण करनेके लिये हैं। इस सुषुप्तावस्थामें यह पुरुष हृदयरूप इन्द्रियके सम्बन्धसे परे हो जाता है, जैसा कि "यह मृत्युके रूपोंको पार कर जाता है" इस वाक्यद्वारा कहा गया है, अतः हृदयेन्द्रियके सम्बन्धसे अतीत होनेके कारण यह हृदयाश्रित कामके सम्बन्धसे परे हो जाता है—यह कथन उचित ही है।
(सविशेषात्मवाद-निराकरणम्)<br>ये तु वादिनो हृदि श्रिताः कामा वासनाश्च हृदयसम्बन्धिनमात्मानमुपसृप्योपश्लिष्यन्ति, हृदयवियोगेऽपि च आत्मन्यवतिष्ठन्ते पुटतैलस्थ इव पुष्पादि गन्ध इत्याचक्षते, तेषां "कामः संकल्पः" (१।५।३) "हृदये ह्येव रूपाणि" (३।९।२०) "हृदयस्य शोकाः" इत्यादीनां वचनानामानर्थक्यमेव ।किंतु जो [भर्तृप्रपञ्चादि] मतवादी ऐसा कहते हैं कि हृदयमें स्थित काम और वासनाएँ हृदयसम्बन्धी आत्माके पास जाकर उसका आलिङ्गन करती हैं तथा हृदयका वियोग हो जानेपर भी पुटतैलमें स्थित पुष्पादिके गन्धके समान वे आत्मामें विद्यमान रहती हैं, उनके लिये तो "कामः संकल्पः" "हृदये ह्येव रूपाणि" "हृदयस्य शोकाः" इत्यादि वाक्योंकी व्यर्थता ही है।
हृदयकरणोत्पाद्यत्वादिति चेद्, न, 'हृदि श्रिताः' इतियदि कहो कि कामादि हृदयरूप करणसे उत्पाद्य होनेके कारण [हृदयसे सम्बद्ध हैं] तो यह ठीक नहीं, क्योंकि 'हृदि श्रिताः' (हृदयमें स्थित)

९८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

९८२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
विशेषणात् । न हि हृदयस्य करणमात्रत्वे ‘हृदि श्रिताः’ इति वचनं समञ्जसम्, ‘हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि’ इति च । आत्मविशुद्धेश्च विवक्षितत्वाद्धृच्छ्रयणवचनं यथार्थमेव युक्तम्; ‘ध्यायतीव लेलायतीव’ इति च श्रुतेरन्यथाऽसम्भवात् ।ऐसा विशेषण दिया गया है । यदि हृदय उनकी उत्पत्तिका करणमात्र ही हो तो ‘हृदि श्रिताः’ तथा ‘हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि’ ये वचन यथार्थ नहीं हो सकते; किंतु यहाँ आत्माकी विशुद्धि विवक्षित होनेके कारण उनका हृदयाश्रयत्व बतलाना यथार्थ एवं उचित ही है, क्योंकि ‘ध्यायतीव लेलायतीव’ इस श्रुतिका कोई दूसरा अर्थ होना सम्भव नहीं है ।
‘कामा येऽस्य हृदि श्रिताः’ इति विशेषणादात्माश्रया अपि सन्तीति चेन्न, अनाश्रितापेक्षत्वात् — नात्र आश्रयान्तरमपेक्ष्य ये हृदीति विशेषणम्, किं तर्हि ? ये हृद्यनाश्रिताः कामास्तानपेक्ष्य विशेषणम् । ये त्वप्ररूढा भविष्या भूताश्च प्रतिपक्षतो निवृत्तास्ते नैव हृदि श्रिताः । सम्भाव्यन्तेयदि कहो ‘जो काम इसके हृदयमें स्थित हैं’ ऐसा विशेषण देनेसे ज्ञात होता है कि कुछ काम आत्माके आश्रित भी हैं, तो यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि यह हृदयमें अनाश्रित कामोंकी अपेक्षासे है— यहाँ ‘ये हृदि’ ऐसा विशेषण कामोंके किसी अन्य आश्रयकी अपेक्षासे नहीं है, तो किस कारणसे है ? जो काम हृदयके आश्रित नहीं हैं, उनकी अपेक्षासे यह विशेषण है। भविष्यमें होनेवाले जो काम हृदयमें आरूढ नहीं हैं, तथा जो भूतकालमें होकर विरोधके कारण निवृत्त हो गये हैं, वे हृदयमें स्थित नहीं हैं । उनकी भी सम्भावना

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९८३

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९८३


| च ते, अतो युक्तं तानपेक्ष्य विशेषणम्—ये प्ररूढा वर्तमाना विषये ते सर्वे प्रमुच्यन्त इति । | हो सकती थी, इसलिये उनकी अपेक्षासे ऐसा विशेषण देना कि 'जो आरूढ अर्थात् विषयमें विद्यमान हैं वे सब ही मुक्त हो जाते हैं,' उचित हो है । | | तथापि विशेषणानर्थक्यमिति चेन्न, तेषु यत्नाधिक्याद् हेयार्थत्वात् । इतरथा अश्रुतमनिष्टं च कल्पितं स्यादात्माश्रयत्वं कामानाम् । | यदि कहो ऐसा माननेपर भी यह विशेषण निरर्थक है तो ठीक नहीं, क्योंकि हृदयारूढ़ काम ही हेय हैं, कारण कि उन्हींकी निवृत्तिके लिये अधिक यत्नकी आवश्यकता होती है। यदि यह विशेषण न दिया गया होता तो 'कामनाएँ आत्माके आश्रित हैं' ऐसी कल्पना होती, जिसका न तो श्रुतिमें ही प्रतिपादन हुआ है और न उसको मानना इष्ट ही है। | | 'न कञ्चन कामं कामयते' इति प्राप्तप्रतिषेधादात्माश्रयत्वं कामानां श्रुतमेवेति चेन्न, 'सधीः स्वप्नो भूत्वा' इति परनिमित्तत्वात् कामाश्नयत्वप्राप्तेः । असङ्गवचनाच्च; न हि कामाश्नयत्वेऽसङ्गवचनमुपपद्यते, सङ्गश्च काम इत्यवोचाम । | प्रतिषेध प्राप्त वस्तु का ही होता है, अतः 'किसी कामकी कामना नहीं करता' ऐसा प्रतिषेध होनेके कारण कामोंका आत्माश्रयत्व तो श्रुतिसम्मत ही है—ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं, क्योंकि 'बुद्धिके सहित स्वप्न होकर' इस वाक्यके अनुसार आत्माको कामाश्नयत्वकी प्राप्ति अन्य (बुद्धि) के कारण है। आत्माको असङ्ग बतलानेसे भी यही सिद्ध होता है; कामका आश्रयभूत होनेपर तो आत्माको असङ्ग कहना उचित नहीं हो सकता, सङ्ग ही काम है—ऐसा हम कह चुके हैं। |

९८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

९८४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| 'आत्मकामः' इति श्रुतेरात्मविषयोऽस्य कामो भवतीति चेन्न, व्यतिरिक्तकामाभावार्थत्वात्तस्याः। वैशेषिकादितन्त्रन्यायोपपन्नमात्मनः कामाद्याश्रयत्वमिति चेन्न, 'हृदि श्रिताः' इत्यादिविशेषश्रुतिविरोधादनपेक्ष्यास्ता वैशेषिकादितन्त्रोपपत्तयः; श्रुतिविरोधे न्यायाभासत्वोपगमात् । <br><br> स्वयंज्योतिष्ट्वबाधनाच्च; कामादीनां च स्वप्ने केवलदृशिमात्रविषयत्वात् स्वयंज्योतिष्ट्वं सिद्धं स्थितं च बाध्यते; आत्मसमवायित्वे दृश्यत्वानुपपत्तेः, चक्षुर्गतविशेषवत् । द्रष्टुर्हि दृश्यमर्थान्तरभूतमिति द्रष्टुः स्वयंज्योतिष्ट्वं | यदि कहो 'आत्मकामः' ऐसी श्रुति होनेके कारण इसे आत्म-सम्बन्धी कामना तो होती ही है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि यह श्रुति आत्मभिन्न कामका अभाव बतलानेके लिये है; यदि कहो कि आत्माका कामाद्याश्रयत्व वैशेषिकादि शास्त्रोंकी युक्तिसे सिद्ध होता है तो ऐसा कहना भी उचित नहीं है; क्योंकि 'हृदि श्रिताः' इत्यादि विशेष श्रुतियोंसे विरुद्ध होनेके कारण वे वैशेषिकादि शास्त्रोंकी उपपत्तियाँ उपेक्षाके योग्य हैं; कारण, श्रुतिसे विरुद्ध होनेपर उनको न्यायाभास माना गया है। <br><br> इसके सिवा ऐसा माननेसे आत्माका स्वयंज्योतिष्ट्व भी बाधित हो जाता है; स्वप्नमें कामादि केवल साक्षीमात्रके विषय हैं, इससे जो उसका सिद्ध एवं विद्यमान स्वयं-ज्योतिष्ट्व है वह बाधित हो जायगा; क्योंकि उनका आत्मासे समवाय-सम्बन्ध होनेपर वे आत्माका दृश्य नहीं हो सकेंगे, जैसे नेत्रगत शुक्लत्व-कृष्णत्व आदि विशेष नेत्रके दृश्य नहीं होते। द्रष्टा-का दृश्य उससे भिन्न पदार्थ होता है, इसीसे द्रष्टाका स्वयंप्रकाशत्व |

ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९८५

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९८५

| सिद्धम्। तद् बाधितं स्याद् यदि कामाद्याश्रयत्वं परिकल्प्येत । <br><br> सर्वशास्त्रार्थविप्रतिषेधाच्च । <br><br> परस्यैकदेशकल्पनायां कामाद्याश्रयत्वे च सर्वशास्त्रार्थजातं कुप्येत । एतच्च विस्तरेण चतुर्थेऽवोचाम । महता हि प्रयत्नेन कामाद्याश्रयत्वकल्पनाः प्रतिषेद्धव्याः, आत्मनः परेणैकत्वशास्त्रार्थसिद्धये। तत्कल्पनायां पुनः क्रियमाणायां शास्त्रार्थ एव बाधितः स्यात् । यथेच्छादीनामात्मधर्मत्वं कल्पयन्तो वैशेषिका नैयायिकाश्च उपनिषच्छास्त्रार्थेन न सङ्गच्छन्ते, तथेयमपि कल्पनोपनिषच्छास्त्रार्थबाधनान्नादरणीया ॥ २२ ॥ | सिद्ध होता है। अतः यदि आत्मामें कामादिके आश्रयत्वकी कल्पना की जायगी तो वह बाधित हो जायगा। <br><br> सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्पर्यसे विरोध होनेके कारण भी [ यह सिद्धान्त अग्राह्य है ]। जीव परमात्माका एक देश है तथा आत्मा कामादिका आश्रय है—ऐसा माननेसे तो सम्पूर्ण शास्त्रके तात्पर्याेंका व्याकोप हो जायगा। यह बात हमने ¹चतुर्थ अध्यायमें विस्तारसे कही है; अतः आत्माका परमात्मासे एकत्व है—इस शास्त्र-तात्पर्यकी सिद्धिके लिये 'आत्मा कामादिका आश्रय है' इस कल्पनाका पूरा प्रयत्न करके विरोध करना चाहिये। पुनः इस कल्पनाके करनेपर तो शास्त्रका तात्पर्य ही बाधित हो जायगा। जिस प्रकार इच्छादिको आत्माका धर्म कल्पना करनेवाले वैशेषिक और न्यायमतावलम्बियोंकी औपनिषद शास्त्रतात्पर्यसे सङ्गति नहीं होती, उसी प्रकार औपनिषद शास्त्रार्थकी बाधिका होनेके कारण यह कल्पना भी आदरणीय नहीं है ॥ २२ ॥ |


सुषुप्तिमें स्वयंज्योति आत्माकी दृष्टि आदिका अनुभव न होनेमें हेतु

स्त्रीपुंसयोरिवैकत्वान्न पश्यति-शङ्का—स्त्री और पुरुषके समान

१. उपनिषद्के द्वितीय अध्यायमें।

९८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

९८६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४
त्युक्तम्, स्वयंज्योतिरिति च । स्वयंज्योतिष्ट्वं नाम चैतन्यात्मस्वभावता । यदि ही अग्‍न्युष्णत्वादिवच्चैतन्यात्मस्वभाव आत्मा स कथमेकत्वेऽपि हि स्वभावं जह्यात्, न जानीयात् ? अथ न जहाति, कथमिह सुषुप्ते न पश्यति ? विप्रतिषिद्धमेतत्—चैतन्यमात्मस्वभावो न जानाति चेति ।सुषुप्तिमें जीव और परमात्माकी एकता हो जानेके कारण वह नहीं देखता तथा आत्मा स्वयंज्योति है—यह कहा गया; स्वयंज्योतिष्ट्वका अर्थ है चैतन्यात्मस्वरूपता । यदि अग्निके उष्णत्वादिके समान आत्मा चैतन्यस्वरूप है तो परमात्माके साथ एकत्व होनेपर भी वह अपने स्वभावको कैसे छोड़ देता है, जिससे कि वह नहीं जानता ? और यदि वह स्वभावको नहीं छोड़ता तो यहाँ सुषुप्तिमें देखता क्यों नहीं है ? वह चैतन्यस्वरूप है और दूसरेको नहीं जानता—यह कथन तो सर्वथा विरुद्ध है ।
न विप्रतिषिद्धम्, उभयमप्येतदुपपद्यत एव । कथम्—समाधान— यह विरुद्ध नहीं है, ये दोनों बातें भी सम्भव हो हैं । किस प्रकार—

यद् वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् । न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यत् पश्येत् ॥ २३ ॥

वह जो नहीं देखता सो देखता हुआ ही नहीं देखता; द्रष्टाकी दृष्टिका कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । उस समय उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे देखे ॥ २३ ॥

यद् वै सुषुप्ते तन्न पश्यति पश्यन् वै तत्, तत्र पश्यन्नेव न पश्यति । यत् तत्र सुषुप्ते नवह जो सुषुप्तिमें नहीं देखता सो निश्चय उस अवस्थामें देखता हुआ ही नहीं देखता । तुम जो ऐसा जानते हो कि वह सुषुप्तिमें नहीं

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९८७ |

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संस्कृतहिन्दी
पश्यतीति जानीषे तन्न तथा गृह्णीयाः; कस्मात् ? पश्यन् वै भवति तत्र ।देखता सो वैसा मत समझो; क्यों ? क्योंकि वहां भी वह देखता ही रहता है।
नन्वेवं न पश्यतीति सुषुप्ते जानीमो यतो न चक्षुर्वा मनो वा दर्शने करणं व्यापृतमस्ति । व्यापृतेषु हि दर्शनश्रवणादिषु पश्यतीति व्यवहारो भवति शृणोतीति वा । न च व्यापृतानि करणानि पश्यामः; तस्मान्न पश्यत्येवायम् ।शङ्का—किंतु वह सुषुप्तिमें इस प्रकार नहीं देखता—ऐसा हम जानते हैं; क्योंकि वहां चक्षु या मन कोई भी इन्द्रिय दर्शनमें व्यापार करनेवाली नहीं होती । दर्शन और श्रवणादि इन्द्रियोंके व्यापार करनेपर ही 'देखता है' अथवा 'सुनता है' ऐसा व्यवहार होता है। और वहाँ हम इन्द्रियोंको व्यापारयुक्त नहीं देखते; इसलिये यह नहीं ही देखता है।
न हि; किं तर्हि ? पश्यन्नेव भवति, कथम् ? न हि यस्माद् द्रष्टुर्दर्शनकर्तुर्या दृष्टिस्तस्या दृष्टेर्विपरिलोपो विनाशः, स न विद्यते । यथाग्नेरौष्ण्यं यावदग्निभावि, तथाऽयं चात्मा द्रष्टाऽविनाशी, अतोऽविनाशित्वादात्मनो दृष्टिरप्यविनाशिनी, यावद्द्रष्टृभाविनी हि सा ।समाधान--नहीं; तो फिर क्या बात है ?—यह देखता ही है, किस प्रकार ? क्योंकि द्रष्टा-दर्शनक्रियाके कर्ताकी जो दृष्टि है, उस दृष्टिका जो विपरिलोप-विनाश है, वह नहीं होता। जिस प्रकार अग्निकी उष्णता अग्निकी सत्तातक रहनेवाली है, उस प्रकार यह द्रष्टा आत्मा तो अविनाशी है, अतः आत्माके अविनाशी होनेके कारण आत्माकी दृष्टि भी अविनाशिनी है—वह द्रष्टाकी स्थितितक रहनेवाली ही है।

९८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

९८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४

| ननु विप्रतिषिद्धमिदमभिधीयते द्रष्टुः सा दृष्टिर्न विपरिलुप्यत इति च। दृष्टिश्च द्रष्ट्रा क्रियते; दृष्टिकर्तृत्वाद्धि द्रष्टेत्युच्यते; क्रियमाणा च द्रष्ट्रा दृष्टिर्न विपरिलुप्यत इति चाशक्यं वक्तुम्। ननु न विपरिलुप्यत इति वचनादविनाशिनी स्यात्; न, वचनस्य ज्ञापकत्वात्। न हि न्यायप्राप्तो विनाशः कृतकस्य वचनशतेनापि वारयितुं शक्यते; वचनस्य यथाप्राप्तार्थज्ञापकत्वात्।<br><br>नैष दोषः; आदित्यादिप्रकाशकत्ववद् दर्शनोपपत्तेः; यथा आदित्यादयो नित्यप्रकाशस्वभावा एव सन्तः स्वाभाविके न नित्येनैव प्रकाशेन प्रकाशयन्ति, न ह्यप्रकाशात्मानः सन्तः प्रकाशं कुर्वन्तः प्रकाशयन्तीत्युच्यन्ते; किं | शङ्का- किंतु द्रष्टाकी वह दृष्टि है और उसका लोप नहीं होता—यह कथन तो परस्परविरुद्ध है। दृष्टि तो द्रष्टाद्वारा ही की जाती है; दृष्टिकर्ता होनेके कारण ही वह द्रष्टा कहा जाता है; द्रष्टाके द्वारा दृष्टि की जानेवाली है और उसका लोप नहीं होता--यह तो कहा ही नहीं जा सकता। यदि कहो कि 'न विपरिलुप्यते' इस वचनके अनुसार वह अविनाशिनी होनी ही चाहिये तो यह ठीक नहीं; क्योंकि वचन तो केवल ज्ञापक है कृतक वस्तुका विनाश न्यायप्राप्त है, अतः उसका सैकड़ों वचनोंसे भी निवारण नहीं किया जा सकता; क्योंकि वचन तो जो वस्तु जैसी प्राप्त हुई है, उसे वैसी ही सूचित कर देनेवाला है।<br><br>समाधान— यह दोष नहीं है; क्योंकि आदित्यादिके प्रकाशकत्वके समान इसका देखना भी उपपन्न ही है। जिस प्रकार आदित्यादि नित्यप्रकाशस्वभाव होते हुए ही अपने नित्यस्वाभाविक प्रकाशसे प्रकाश करते हैं, वे स्वयं अप्रकाशस्वरूप होकर उससे अपनेसे भिन्न प्रकाश उत्पन्न करके प्रकाशित करते हैं--ऐसा उनके विषयमें नहीं कहा जाता तो, |

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९८९ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९८९
संस्कृत मूल (भाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
तर्हि ? स्वभावेनैव नित्येन प्रकाशेन । तथायामप्यात्मा अविपरिलुप्तस्वभावया दृष्ट्या नित्यया द्रष्टेत्युच्यते ।फिर क्या बात है ? वे अपने स्वभावरूप नित्यप्रकाशसे प्रकाशित करते हैं । इसी प्रकार यह आत्मा भी अपनी अविनाशस्वरूपा नित्यदृष्टिके कारण 'द्रष्टा' ऐसा कहा जाता है ।
गौणं तर्हि द्रष्टृत्वम् ।**शङ्का—**तब तो इसका द्रष्टृत्व गौण है ।
न, एवमेव मुख्यत्वोपपत्तेः; यदि ह्यन्यथाप्यात्मनो द्रष्टृत्वं दृष्टम्, तदास्य द्रष्टृत्वस्य गौणत्वम्, न त्वात्मनोऽन्यो दर्शनप्रकारोऽस्ति; तदेवमेव मुख्यं द्रष्टृत्वमुपपद्यते नान्यथा—यथा आदित्यादीनां प्रकाशयितृत्वं नित्येनैव स्वाभाविकेनाक्रियमाणेन प्रकाशेन, तदेव च प्रकाशयितृत्वं मुख्यं प्रकाशयितृत्वान्तरानुपपत्तेः; तस्मान्न 'द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलुप्यते' इति न विप्रतिषेधगन्धोऽप्यस्ति ।**समाधान—**नहीं, इसी प्रकार तो इसका मुख्यत्व सिद्ध हो सकता है; यदि आत्माका द्रष्टृत्व किसी दूसरे भी प्रकारसे देखा गया होता तो इसके द्रष्टृत्वकी गौणता हो सकती थी, किंतु आत्माके दर्शनका कोई अन्य प्रकार तो है नहीं; अतः इसी प्रकार आत्माका मुख्य द्रष्टृत्व उपपन्न हो सकता है, किसी अन्य प्रकारसे नहीं; जिस प्रकार कि आदित्यादिका प्रकाशकत्व अपने स्वरूपभूत, नित्य एवं अकृत्रिम प्रकाशके कारण है, और यही प्रकाशकत्व मुख्य भी है; क्योंकि उसका कोई अन्य प्रकाशक होना सम्भव नहीं है, अतः 'द्रष्टाकी दृष्टिका सर्वथा लोप नहीं होता' इस उक्तिमें विरोधका लेश भी नहीं है ।
ननु—अनित्यक्रियाकर्तृविषय एव तृच्प्रत्ययान्तस्य शब्दस्य प्रयोगो दृष्टः, यथा छेत्ता भेत्ता**शङ्का—**किंतु तृच्प्रत्ययान्त शब्दका प्रयोग तो अनित्य क्रियाके कर्ताके विषयमें ही देखा गया है, जैसे छेत्ता, भेत्ता, गन्ता इत्यादि, उन्हींके

९९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

९९०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
गन्तेति, तथा द्रष्टेत्यत्रापीति चेत् ?समान द्रष्टा पदमें भी समझना चाहिये—ऐसा कहें तो ?
न, प्रकाशयितेति दृष्टत्वात् ।समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [ नित्यप्रकाशस्वरूप आदित्यादिके विषयमें ] 'प्रकाशयिता' ऐसा प्रयोग देखा जाता है।
भवतु प्रकाशकेष्वन्यथासम्भवात्, न स्वात्मनीति चेत् ?शङ्का—प्रकाशकोंमें कोई अन्य प्रकार न हो सकनेके कारण वहाँ भले ही ऐसा प्रयोग हो जाय, परंतु आत्माके विषयमें तो ऐसा नहीं हो सकता।
न, दृष्ट्यविपरिलोपश्रुतेः ।समाधान--नहीं, क्योंकि यहां भी आत्मदृष्टिके लोप न होनेका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति है।
पश्यामि न पश्यामीत्यनुभवदर्शनान्नेति चेत् ?शङ्का—मैं देखता हूँ, मैं नहीं देखता—ऐसा विपरीत अनुभव देखा जानेके कारण आत्माकी दृष्टि नित्य नहीं हो सकती—ऐसा कहें तो ?
न, करणव्यापारविशेषापेक्षत्वात्; उद्धृतचक्षुषां च स्वप्ने आत्मदृष्टेरविपरिलोपदर्शनात् ।समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह अनुभव तो [ चक्षु ] इन्द्रियके विशेष व्यापारकी अपेक्षासे है; इसके सिवा जिनकी आँखें नष्ट हो गयी हैं, उनकी भी स्वप्नमें आत्म-दृष्टिका अविपरिलोप ( सद्भाव ) देखा जाता है। अतः आत्माकी दृष्टि
तस्मादविपरिलुप्तस्वभावैवात्मनो दृष्टिः, अतस्तयाविपरिलुप्तयातो अविपरिलुप्तस्वभावा ही है, इसलिये यह पुरुष उस अविनाशिनी

१. कभी नष्ट न होनेवाली ।

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९९१ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९९१
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
दृष्ट्या स्वयंज्योतिःस्वभावया पश्यन्नेव भवति सुषुप्ते ।<br>कथं तर्हि न पश्यतीति ?स्वयंज्योतिःस्वरूपा दृष्टिसे स्वप्नमें देखता ही रहता है ।<br>शङ्का—तो फिर 'नहीं देखता' ऐसा क्यों कहा जाता है ?
उच्यते—न तु तदस्ति । किं तत् ? द्वितीयं विषयभूतम् । किं विशिष्टम् ? ततो द्रष्टुरन्यदन्यत्वेन विभक्तं यत् पश्येद् यदुपलभेत । यद्धि तद्विशेषदर्शनकारणमन्तःकरणं चक्षूरूपं च, तदविद्ययान्यत्वेन प्रत्युपस्थापितमासीत् । तदेतस्मिन् काल एकीभूतम्, आत्मनः परेण परिष्वङ्गात् । द्रष्टुर्हि परिच्छिन्नस्य विशेषदर्शनाय करणमन्यत्वेन व्यवतिष्ठते । अयं तु स्वेन सर्वात्मना सम्परिष्वक्तः स्वेन परेण प्राज्ञेनात्मना प्रिययेव पुरुषः; तेन न पृथक्त्वेन व्यवस्थितानि करणानि विषयाश्च । तदभावाद् विशेषदर्शनं नास्ति, करणादिकृतं हि तन्नात्मकृतम्;समाधान—बतलाते हैं—यहां तो वह वस्तु ही नहीं है । वह कौन ? दूसरी विषयभूत वस्तु । किस विशेषणसे युक्त ? उस द्रष्टासे अन्य अर्थात् अन्यरूपसे विभक्त, जिसे कि वह देखे-उपलब्ध करे। क्योंकि जो उस विशेष दर्शनका कारण चक्षुरूप अन्तःकरण था, वह अविद्याके द्वारा अन्यरूपसे प्रस्तुत किया हुआ था । इस समय प्रत्यगात्माका परमात्माके साथ आलिङ्गन होनेके कारण वह एकरूप हो गया है । परिच्छिन्न द्रष्टाके विशेष दर्शनके लिये ही इन्द्रियाँ अन्य रूपसे स्थित होती हैं । किंतु इस समय, जैसे पुरुष अपनी प्रियासे आलिङ्गित हाता है, उसी प्रकार यह स्वयं सर्वात्मभावसे अपने परमरूप प्राज्ञात्मासे आलिङ्गित रहता है; इसलिये उस अवस्थामें इन्द्रिय और विषय पृथक्रूपसे विद्यमान नहीं रहते और उनका अभाव होनेके कारण विशेषदर्शन भी नहीं होता, क्योंकि वह तो इन्द्रियादिका किया हुआ ही होता है, आत्माका किया

९९२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

९९२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४


| आत्मकृतामिव प्रत्यवभासते; <br><br> तस्मात् तत्कृतेयं भ्रान्तिरात्मनो <br><br> दृष्टिः परिलुप्यत इति ॥२३॥ | हुआ नहीं होता; आत्माका किया हुआ-सा तो भासता ही है, अतः उसीके कारण ऐसी भ्रान्ति होती है कि आत्माकी दृष्टिका लोप होता है ॥ २३ ॥ |


यद् वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन् वै तन्न जिघ्रति न हि घ्रातुर्घ्रातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यज्जिघ्रेत् ॥ २४ ॥

यद् वै तन्न रसयते रसयन् वै तन्न रसयते न हि रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यद् रसयेत् ॥२५॥

यद् वै तन्न वदति वदन् वै तन्न वदति न हि वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यद् वदेत् ॥ २६॥

यद् वै तन्न शृणोति शृण्वन् वै तन्न शृणोति न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यच्छृणुयात् ॥ २७ ॥

यद् वै तन्न मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते न हि मन्तुर्मतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यन्मन्वीत ॥२८॥

यद् वै तन्न स्पृशति स्पृशन् वै तन्न स्पृशति न हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यत् स्पृशेत् ॥ २६ ॥ यद् वै तन्न

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९३

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९३

विजानाति विजानन् वै तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तं यद् विजानीयात् ॥३०॥

वह जो नहीं सूँघता सो सूँघता हुआ ही नहीं सूँघता। सूँघनेवालेकी गन्धग्रहणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे सूँघे ॥ २४ ॥ वह जो रसास्वाद नहीं करता सो रसास्वाद करता हुआ ही नहीं करता। रसास्वाद करनेवालेकी रसग्रहणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं, जिसका रस ग्रहण करे ॥ २५ ॥ वह जो नहीं बोलता सो बोलता हुआ ही नहीं बोलता। वक्ताकी वचन-शक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न दूसरा कुछ है ही नहीं, जिसके विषयमें वह बोले ॥ २६ ॥ वह जो नहीं सुनता सो सुनता हुआ ही नहीं सुनता। श्रोताकी श्रवणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं, जिसके विषयमें वह सुने ॥ २७ ॥ वह जो मनन नहीं करता सो मनन करता हुआ ही मनन नहीं करता। मनन करनेवालेकी मननशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसके विषयमें वह मनन करे ॥ २८ ॥ वह जो स्पर्श नहीं करता सो स्पर्श करता हुआ ही स्पर्श नहीं करता। स्पर्श करनेवालेकी स्पर्शशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं, जिसे वह स्पर्श करे ॥ २६ ॥ वह जो नहीं जानता सो नहीं जानता हुआ ही नहीं जानता। विज्ञाताकी विज्ञाति (विज्ञानशक्ति) का सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ ही नहीं होता, जिसे वह विशेषरूपसे जाने ॥ ३० ॥

बृ० उ० ६३—

९९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

९९४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
समानमन्यत्, यद्वै तन्न जिघ्रति । यद्वै तन्न रसयते । यद्वै तन्न वदति । यद्वै तन्न शृणोति । यद्वै तन्न मनुते । यद्वै तन्न स्पृशति । यद्वै तन्न विजानातीति । मननविज्ञानयोः दृष्ट्यादिसहकारित्वेऽपि सति चक्षुरादिनिरपेक्षो भूतभविष्यद्वर्तमानविषयव्यापारो विद्यत इति पृथग्ग्रहणम् ।'यद्वै तन्न जिघ्रति' 'यद्वै तन्न रसयते' 'यद्वै तन्न वदति' 'यद्वै तन्न शृणोति' 'यद्वै तन्न मनुते' 'यद्वै तन्न स्पृशति' और 'यद्वै तन्न विजानाति' इत्यादि अन्य मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है । मनन और विज्ञान यद्यपि दृष्टि आदिके सहकारी हैं, तथापि इनका चक्षु आदि इन्द्रियोंसे निरपेक्ष रहकर भूत, भविष्यत् और वर्तमान विषयसम्बन्धी व्यापार रहता ही है, इसलिये इनका पृथक् ग्रहण किया गया है ।
किं पुनर्हष्ट्यादीनामग्नेरौष्ण्यप्रकाशनज्वलनादिवद्धर्मभेदः, आहोस्विदभिन्नस्यैव धर्मस्य परोपाधिनिमित्तं धर्मान्यत्वमिति ?प्रश्न—क्या अग्निके धर्म उष्णता, प्रकाशन और ज्वलनादिके समान दृष्ट्यादि धर्मोंका भेद है, अथवा एक [ धर्मीसे ] अभिन्न धर्मका ही अन्य उपाधिके कारण विभिन्नधर्मत्व है ?
अत्र केचिद् व्याचक्षते—<br>आत्मवस्तुनः स्वत एवैकत्वं नानात्वं च; यथा गोगोद्रव्यतयैकत्वम्, सास्नादीनां धर्माणां परस्परतो भेदः । यथा स्थूलेष्वेकत्वं नानात्वं च, तथा निरवयवेष्वमूर्तवस्तुष्वेकत्वं नानात्वं चानुमेयम् । सर्वत्राव्यभि-**उत्तर—**इस विषयमें कोई-कोई ऐसी व्याख्या करते हैं—आत्मवस्तुका एकत्व और नानात्व स्वतः ही है; जिस प्रकार गौका गोद्रव्यरूपसे एकत्व है और उसके सास्नादि धर्मोंका परस्पर भेद है । जिस प्रकार स्थूल पदार्थोंमें एकत्व और नानात्व हैं, उसी प्रकार निरवयव और सूक्ष्म वस्तुओंमें भी एकत्व और नानात्वका अनुमान करना चाहिये । इस नियमका सर्वत्र

१. गौके गलेकी लटकती हुई खालको सास्ना कहते हैं । गौके सास्ना, सींग, खुर आदि धर्मोंका परस्पर भेद है ।

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९९५

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९९५

शाङ्करभाष्यम्शाङ्करभाष्यार्थ
चारदर्शनादात्मनोऽपि तद्वदेव दृष्ट्यादीनां परस्परं नानात्वम्, आत्मना चैकत्वमिति ।अव्यभिचार देखा जाता है; अतः इसी न्यायसे आत्माकी भी दृष्टि आदिका तो परस्पर नानात्व है और आत्मदृष्टिसे एकत्व है ।
न, अन्यपरत्वात् । न हि [आत्मनि दृष्ट्यादिशक्तिभेदकल्पना-निरसनम्] दृष्ट्यादिधर्मभेदप्रदर्शनपरमिदं वाक्यं यद्वै तदित्यादि । किं तर्हि ? यदि चैतन्यात्मज्योतिः, कथं न जानाति सुषुप्ते ? नूनमतो न चैतन्यात्मज्योतिः, इत्येवमाशङ्काप्राप्तौ, तन्निराकरणायैतदारब्धं यद् वै तदित्यादि । यदस्य जाग्रत्स्वप्नयोश्चक्षुराद्यनेकोपाधिद्वारं चैतन्यात्मज्योतिःस्वाभाव्यमुपलक्षितं दृष्ट्याद्यभिधेयव्यवहारापन्नम्, सुषुप्ते उपाधिभेदव्यापारनिवृत्तावनुद्भास्यमानत्वादनुपलक्ष्यमाणस्वभावमप्युपाधिभेदेन भिन्नमिव यथाप्राप्तानुवादेनैव विद्यमानत्वमुच्यते ।किंतु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इन वाक्योंका तात्पर्य और ही है। ये 'यद् वै तत्' इत्यादि वाक्य दृष्ट्यादि धर्मोंका भेद प्रदर्शित करनेके लिये नहीं हैं। तो फिर किस लिये है ?-[ बताते हैं, सुनो— ] यदि चैतन्यात्मज्योति है तो वह सुषुप्तमें क्यों नहीं जानती ? अतः निश्चय ही चैतन्यात्मज्योति है नहीं; ऐसी आशङ्का प्राप्त होनेपर, उसका निराकरण करनेके लिये ही 'यद् वै तत्' इत्यादि वाक्यका आरम्भ किया गया है । जागरित और स्वप्नावस्थाओंमें जो इसकी चैतन्यात्मज्योतिःस्वभावता चक्षु आदि अनेकों उपाधियोंके द्वारा दृष्टि आदि नामके व्यवहारको प्राप्त हुई देखी गयी है, सुषुप्तिमें उपाधिभेद-रूप व्यापारकी निवृत्ति हो जानेपर वह अभिव्यक्त नहीं होती और इसलिये उसका स्वभाव भी उपलक्षित नहीं होता, तो भी यथाप्राप्त भेदका अनुवाद करते हुए उपाधिभेदसे भिन्न हुएके समान ही उसकी विद्यमानता बतलायी गयी है; अतः उस अवस्थामें

| ९९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४] |

| ९९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४] | | :--- | :--- |

| तत्र दृष्ट्यादिधर्मभेदकल्पना विवक्षितार्थानभिज्ञतया ।<br><br>सैन्धवघनवत् प्रज्ञानैकरसघनश्रुतिविरोधाच्च; “विज्ञानमानन्दम्” (बृ०उ० ३।९।२८) “सत्यं ज्ञानम्” (तै०उ० २।१।१) “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ०उ० ३।१।३) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । | दृष्ट्यादि धर्मभेदकी कल्पना विवक्षित अर्थको न जाननेके कारण ही है।<br><br>‘आत्मा लवणखण्डके समान प्रज्ञानैकरसघनस्वरूप है’ ऐसा प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिसे विरोध होनेके कारण भी यह कल्पना उचित नहीं है। तथा “ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है” “ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनन्त है” एवं “प्रज्ञान ब्रह्म है” इत्यादि श्रुतियोंसे विरोध होनेके कारण भी यह ठीक नहीं है। | | शब्दप्रवृत्तेश्च; लौकिकी च शब्दप्रवृत्तिश्चक्षुषा रूपं विजानाति, श्रोत्रेण शब्दं विजानाति, रसनेनान्नस्य रसं विजानाति, इति च सर्वत्रैव च दृष्ट्यादिशब्दाभिधेयानां विज्ञानशब्दवाच्यतामेव दर्शयति; शब्दप्रवृत्तिश्च प्रमाणम् । | शब्दकी प्रवृत्तिसे भी [चैतन्यके भेदकी कल्पना ठीक नहीं है]; ‘नेत्रसे रूपको जानता है, श्रोत्रसे शब्दको जानता है, रसनासे अन्नके रसको जानता है’ ऐसी शब्दकी लौकिकी प्रवृत्ति भी सर्वत्र ही दृष्टि आदि शब्दोंके वाच्योंको विज्ञान शब्दकी वाच्यता दिखलाती है और शब्दकी प्रवृत्ति भी प्रमाण ही है। | | दृष्टान्तोपपत्तेश्च, यथा हि लोके स्वच्छस्वाभाव्ययुक्तः स्फटिकस्तन्निमित्तमेव केवलं हरितनीललोहिताद्युपाधिभेदसंयोगात् तदाकारत्वं भजते; न च स्वच्छस्वाभाव्यव्यतिरेकेण हरित- | इस विषयमें दृष्टान्त भी बन सकता है; जिस प्रकार लोकमें स्वच्छस्वभावयुक्त स्फटिक मणि हरित, नील एवं लोहितादि उपाधियोंके संसर्गसे केवल उन्हींके कारण उनके आकारकी हो जाती है; स्वतः स्फटिकके तो स्वच्छस्वरूपत्वके सिवा हरित, |

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९७

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९७


| नीललोहितादिलक्षणा धर्मभेदाः स्फटिकस्य कल्पयितुं शक्यन्ते; तथा चक्षुराद्युपाधिभेदसंयोगात् प्रज्ञानघनस्वभावस्यैव आत्मज्योतिषो दृष्ट्यादिशक्तिभेद उपलक्ष्यते; प्रज्ञानघनस्य स्वच्छस्वाभाव्यात् स्फटिकस्वच्छस्वाभाव्यवत् । | नील एवं लोहितादि धर्मभेदकी कल्पना की ही नहीं जा सकती, उसी प्रकार चक्षु आदि उपाधिभेदके संयोगसे ही प्रज्ञानघनस्वरूप आत्मज्योतिके दृष्टि आदि शक्तिभेद उपलक्षित होते हैं; क्योंकि स्फटिककी स्वच्छस्वभावताके समान प्रज्ञानघन भी स्वच्छस्वभाव है । | | स्वयं ज्योतिष्ट्वाच्च; यथा च आदित्यज्योतिरवभास्यभेदैः संयुज्यमानं हरितनीलपीतलोहितादिभेदैरविभाज्यं तदाकाराभासं भवति, तथा च कृत्स्नं जगदवभासयच्चक्षुरादीनि च तदाकारं भवति । तथा चोक्तम्—<br>“आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते” (४।३।६) इत्यादि । | स्वयंज्योति होनेके कारण भी आत्मभेद अनुपपन्न है, जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकाश्यभेदोंसे संयुक्त होनेपर हरित, नील, पीत एवं लोहितादि भेदोंसे अभिन्न और उन्हींके आकारका भासता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् और चक्षु आदिको प्रकाशित करनेवाली चैतन्यात्मज्योति तदाकार हो जाती है । ऐसा ही कहा भी है—“सुषुप्तिमें यह आत्मज्योतिके द्वारा ही बैठता है” इत्यादि । | | न च निरवयवेष्वनेकात्मकता शक्यते कल्पयितुम्, दृष्टान्ताभावात् । यदप्याकाशस्य सर्वगतत्वादिधर्मभेदः परिकल्प्यते, परमाण्वादीनां च गन्धरसाद्यनेकगुणत्वम्, तदपि निरूप्यमाणं परोपाधिनिमित्तमेव भवति । | इसके सिवा निरवयव पदार्थोंमें अनेकरूपताकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, क्योंकि ऐसा कोई दृष्टान्त नहीं है । आकाशके जो सर्वगतत्वादि धर्मभेद और परमाणु आदिके जो गन्ध-रस आदि अनेक गुणयुक्त होनेकी कल्पना की जाती है, वह भी विचार करनेपर अन्य उपाधिके कारण ही है । |