बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 998, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| 'आत्मकामः' इति श्रुतेरात्मविषयोऽस्य कामो भवतीति चेन्न, व्यतिरिक्तकामाभावार्थत्वात्तस्याः। वैशेषिकादितन्त्रन्यायोपपन्नमात्मनः कामाद्याश्रयत्वमिति चेन्न, 'हृदि श्रिताः' इत्यादिविशेषश्रुतिविरोधादनपेक्ष्यास्ता वैशेषिकादितन्त्रोपपत्तयः; श्रुतिविरोधे न्यायाभासत्वोपगमात् । <br><br> स्वयंज्योतिष्ट्वबाधनाच्च; कामादीनां च स्वप्ने केवलदृशिमात्रविषयत्वात् स्वयंज्योतिष्ट्वं सिद्धं स्थितं च बाध्यते; आत्मसमवायित्वे दृश्यत्वानुपपत्तेः, चक्षुर्गतविशेषवत् । द्रष्टुर्हि दृश्यमर्थान्तरभूतमिति द्रष्टुः स्वयंज्योतिष्ट्वं | यदि कहो 'आत्मकामः' ऐसी श्रुति होनेके कारण इसे आत्म-सम्बन्धी कामना तो होती ही है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि यह श्रुति आत्मभिन्न कामका अभाव बतलानेके लिये है; यदि कहो कि आत्माका कामाद्याश्रयत्व वैशेषिकादि शास्त्रोंकी युक्तिसे सिद्ध होता है तो ऐसा कहना भी उचित नहीं है; क्योंकि 'हृदि श्रिताः' इत्यादि विशेष श्रुतियोंसे विरुद्ध होनेके कारण वे वैशेषिकादि शास्त्रोंकी उपपत्तियाँ उपेक्षाके योग्य हैं; कारण, श्रुतिसे विरुद्ध होनेपर उनको न्यायाभास माना गया है। <br><br> इसके सिवा ऐसा माननेसे आत्माका स्वयंज्योतिष्ट्व भी बाधित हो जाता है; स्वप्नमें कामादि केवल साक्षीमात्रके विषय हैं, इससे जो उसका सिद्ध एवं विद्यमान स्वयं-ज्योतिष्ट्व है वह बाधित हो जायगा; क्योंकि उनका आत्मासे समवाय-सम्बन्ध होनेपर वे आत्माका दृश्य नहीं हो सकेंगे, जैसे नेत्रगत शुक्लत्व-कृष्णत्व आदि विशेष नेत्रके दृश्य नहीं होते। द्रष्टा-का दृश्य उससे भिन्न पदार्थ होता है, इसीसे द्रष्टाका स्वयंप्रकाशत्व |