भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 999, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 999
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९८५

| सिद्धम्। तद् बाधितं स्याद् यदि कामाद्याश्रयत्वं परिकल्प्येत । <br><br> सर्वशास्त्रार्थविप्रतिषेधाच्च । <br><br> परस्यैकदेशकल्पनायां कामाद्याश्रयत्वे च सर्वशास्त्रार्थजातं कुप्येत । एतच्च विस्तरेण चतुर्थेऽवोचाम । महता हि प्रयत्नेन कामाद्याश्रयत्वकल्पनाः प्रतिषेद्धव्याः, आत्मनः परेणैकत्वशास्त्रार्थसिद्धये। तत्कल्पनायां पुनः क्रियमाणायां शास्त्रार्थ एव बाधितः स्यात् । यथेच्छादीनामात्मधर्मत्वं कल्पयन्तो वैशेषिका नैयायिकाश्च उपनिषच्छास्त्रार्थेन न सङ्गच्छन्ते, तथेयमपि कल्पनोपनिषच्छास्त्रार्थबाधनान्नादरणीया ॥ २२ ॥ | सिद्ध होता है। अतः यदि आत्मामें कामादिके आश्रयत्वकी कल्पना की जायगी तो वह बाधित हो जायगा। <br><br> सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्पर्यसे विरोध होनेके कारण भी [ यह सिद्धान्त अग्राह्य है ]। जीव परमात्माका एक देश है तथा आत्मा कामादिका आश्रय है—ऐसा माननेसे तो सम्पूर्ण शास्त्रके तात्पर्याेंका व्याकोप हो जायगा। यह बात हमने ¹चतुर्थ अध्यायमें विस्तारसे कही है; अतः आत्माका परमात्मासे एकत्व है—इस शास्त्र-तात्पर्यकी सिद्धिके लिये 'आत्मा कामादिका आश्रय है' इस कल्पनाका पूरा प्रयत्न करके विरोध करना चाहिये। पुनः इस कल्पनाके करनेपर तो शास्त्रका तात्पर्य ही बाधित हो जायगा। जिस प्रकार इच्छादिको आत्माका धर्म कल्पना करनेवाले वैशेषिक और न्यायमतावलम्बियोंकी औपनिषद शास्त्रतात्पर्यसे सङ्गति नहीं होती, उसी प्रकार औपनिषद शास्त्रार्थकी बाधिका होनेके कारण यह कल्पना भी आदरणीय नहीं है ॥ २२ ॥ |


सुषुप्तिमें स्वयंज्योति आत्माकी दृष्टि आदिका अनुभव न होनेमें हेतु

स्त्रीपुंसयोरिवैकत्वान्न पश्यति-शङ्का—स्त्री और पुरुषके समान

१. उपनिषद्के द्वितीय अध्यायमें।