बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1011, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९७
| नीललोहितादिलक्षणा धर्मभेदाः स्फटिकस्य कल्पयितुं शक्यन्ते; तथा चक्षुराद्युपाधिभेदसंयोगात् प्रज्ञानघनस्वभावस्यैव आत्मज्योतिषो दृष्ट्यादिशक्तिभेद उपलक्ष्यते; प्रज्ञानघनस्य स्वच्छस्वाभाव्यात् स्फटिकस्वच्छस्वाभाव्यवत् । | नील एवं लोहितादि धर्मभेदकी कल्पना की ही नहीं जा सकती, उसी प्रकार चक्षु आदि उपाधिभेदके संयोगसे ही प्रज्ञानघनस्वरूप आत्मज्योतिके दृष्टि आदि शक्तिभेद उपलक्षित होते हैं; क्योंकि स्फटिककी स्वच्छस्वभावताके समान प्रज्ञानघन भी स्वच्छस्वभाव है । | | स्वयं ज्योतिष्ट्वाच्च; यथा च आदित्यज्योतिरवभास्यभेदैः संयुज्यमानं हरितनीलपीतलोहितादिभेदैरविभाज्यं तदाकाराभासं भवति, तथा च कृत्स्नं जगदवभासयच्चक्षुरादीनि च तदाकारं भवति । तथा चोक्तम्—<br>“आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते” (४।३।६) इत्यादि । | स्वयंज्योति होनेके कारण भी आत्मभेद अनुपपन्न है, जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकाश्यभेदोंसे संयुक्त होनेपर हरित, नील, पीत एवं लोहितादि भेदोंसे अभिन्न और उन्हींके आकारका भासता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् और चक्षु आदिको प्रकाशित करनेवाली चैतन्यात्मज्योति तदाकार हो जाती है । ऐसा ही कहा भी है—“सुषुप्तिमें यह आत्मज्योतिके द्वारा ही बैठता है” इत्यादि । | | न च निरवयवेष्वनेकात्मकता शक्यते कल्पयितुम्, दृष्टान्ताभावात् । यदप्याकाशस्य सर्वगतत्वादिधर्मभेदः परिकल्प्यते, परमाण्वादीनां च गन्धरसाद्यनेकगुणत्वम्, तदपि निरूप्यमाणं परोपाधिनिमित्तमेव भवति । | इसके सिवा निरवयव पदार्थोंमें अनेकरूपताकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, क्योंकि ऐसा कोई दृष्टान्त नहीं है । आकाशके जो सर्वगतत्वादि धर्मभेद और परमाणु आदिके जो गन्ध-रस आदि अनेक गुणयुक्त होनेकी कल्पना की जाती है, वह भी विचार करनेपर अन्य उपाधिके कारण ही है । |