बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1010, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४] | | :--- | :--- |
| तत्र दृष्ट्यादिधर्मभेदकल्पना विवक्षितार्थानभिज्ञतया ।<br><br>सैन्धवघनवत् प्रज्ञानैकरसघनश्रुतिविरोधाच्च; “विज्ञानमानन्दम्” (बृ०उ० ३।९।२८) “सत्यं ज्ञानम्” (तै०उ० २।१।१) “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ०उ० ३।१।३) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । | दृष्ट्यादि धर्मभेदकी कल्पना विवक्षित अर्थको न जाननेके कारण ही है।<br><br>‘आत्मा लवणखण्डके समान प्रज्ञानैकरसघनस्वरूप है’ ऐसा प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिसे विरोध होनेके कारण भी यह कल्पना उचित नहीं है। तथा “ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है” “ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनन्त है” एवं “प्रज्ञान ब्रह्म है” इत्यादि श्रुतियोंसे विरोध होनेके कारण भी यह ठीक नहीं है। | | शब्दप्रवृत्तेश्च; लौकिकी च शब्दप्रवृत्तिश्चक्षुषा रूपं विजानाति, श्रोत्रेण शब्दं विजानाति, रसनेनान्नस्य रसं विजानाति, इति च सर्वत्रैव च दृष्ट्यादिशब्दाभिधेयानां विज्ञानशब्दवाच्यतामेव दर्शयति; शब्दप्रवृत्तिश्च प्रमाणम् । | शब्दकी प्रवृत्तिसे भी [चैतन्यके भेदकी कल्पना ठीक नहीं है]; ‘नेत्रसे रूपको जानता है, श्रोत्रसे शब्दको जानता है, रसनासे अन्नके रसको जानता है’ ऐसी शब्दकी लौकिकी प्रवृत्ति भी सर्वत्र ही दृष्टि आदि शब्दोंके वाच्योंको विज्ञान शब्दकी वाच्यता दिखलाती है और शब्दकी प्रवृत्ति भी प्रमाण ही है। | | दृष्टान्तोपपत्तेश्च, यथा हि लोके स्वच्छस्वाभाव्ययुक्तः स्फटिकस्तन्निमित्तमेव केवलं हरितनीललोहिताद्युपाधिभेदसंयोगात् तदाकारत्वं भजते; न च स्वच्छस्वाभाव्यव्यतिरेकेण हरित- | इस विषयमें दृष्टान्त भी बन सकता है; जिस प्रकार लोकमें स्वच्छस्वभावयुक्त स्फटिक मणि हरित, नील एवं लोहितादि उपाधियोंके संसर्गसे केवल उन्हींके कारण उनके आकारकी हो जाती है; स्वतः स्फटिकके तो स्वच्छस्वरूपत्वके सिवा हरित, |