बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1009, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1009
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९९५
| शाङ्करभाष्यम् | शाङ्करभाष्यार्थ |
|---|---|
| चारदर्शनादात्मनोऽपि तद्वदेव दृष्ट्यादीनां परस्परं नानात्वम्, आत्मना चैकत्वमिति । | अव्यभिचार देखा जाता है; अतः इसी न्यायसे आत्माकी भी दृष्टि आदिका तो परस्पर नानात्व है और आत्मदृष्टिसे एकत्व है । |
| न, अन्यपरत्वात् । न हि [आत्मनि दृष्ट्यादिशक्तिभेदकल्पना-निरसनम्] दृष्ट्यादिधर्मभेदप्रदर्शनपरमिदं वाक्यं यद्वै तदित्यादि । किं तर्हि ? यदि चैतन्यात्मज्योतिः, कथं न जानाति सुषुप्ते ? नूनमतो न चैतन्यात्मज्योतिः, इत्येवमाशङ्काप्राप्तौ, तन्निराकरणायैतदारब्धं यद् वै तदित्यादि । यदस्य जाग्रत्स्वप्नयोश्चक्षुराद्यनेकोपाधिद्वारं चैतन्यात्मज्योतिःस्वाभाव्यमुपलक्षितं दृष्ट्याद्यभिधेयव्यवहारापन्नम्, सुषुप्ते उपाधिभेदव्यापारनिवृत्तावनुद्भास्यमानत्वादनुपलक्ष्यमाणस्वभावमप्युपाधिभेदेन भिन्नमिव यथाप्राप्तानुवादेनैव विद्यमानत्वमुच्यते । | किंतु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इन वाक्योंका तात्पर्य और ही है। ये 'यद् वै तत्' इत्यादि वाक्य दृष्ट्यादि धर्मोंका भेद प्रदर्शित करनेके लिये नहीं हैं। तो फिर किस लिये है ?-[ बताते हैं, सुनो— ] यदि चैतन्यात्मज्योति है तो वह सुषुप्तमें क्यों नहीं जानती ? अतः निश्चय ही चैतन्यात्मज्योति है नहीं; ऐसी आशङ्का प्राप्त होनेपर, उसका निराकरण करनेके लिये ही 'यद् वै तत्' इत्यादि वाक्यका आरम्भ किया गया है । जागरित और स्वप्नावस्थाओंमें जो इसकी चैतन्यात्मज्योतिःस्वभावता चक्षु आदि अनेकों उपाधियोंके द्वारा दृष्टि आदि नामके व्यवहारको प्राप्त हुई देखी गयी है, सुषुप्तिमें उपाधिभेद-रूप व्यापारकी निवृत्ति हो जानेपर वह अभिव्यक्त नहीं होती और इसलिये उसका स्वभाव भी उपलक्षित नहीं होता, तो भी यथाप्राप्त भेदका अनुवाद करते हुए उपाधिभेदसे भिन्न हुएके समान ही उसकी विद्यमानता बतलायी गयी है; अतः उस अवस्थामें |