बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
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| ९९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| समानमन्यत्, यद्वै तन्न जिघ्रति । यद्वै तन्न रसयते । यद्वै तन्न वदति । यद्वै तन्न शृणोति । यद्वै तन्न मनुते । यद्वै तन्न स्पृशति । यद्वै तन्न विजानातीति । मननविज्ञानयोः दृष्ट्यादिसहकारित्वेऽपि सति चक्षुरादिनिरपेक्षो भूतभविष्यद्वर्तमानविषयव्यापारो विद्यत इति पृथग्ग्रहणम् । | 'यद्वै तन्न जिघ्रति' 'यद्वै तन्न रसयते' 'यद्वै तन्न वदति' 'यद्वै तन्न शृणोति' 'यद्वै तन्न मनुते' 'यद्वै तन्न स्पृशति' और 'यद्वै तन्न विजानाति' इत्यादि अन्य मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है । मनन और विज्ञान यद्यपि दृष्टि आदिके सहकारी हैं, तथापि इनका चक्षु आदि इन्द्रियोंसे निरपेक्ष रहकर भूत, भविष्यत् और वर्तमान विषयसम्बन्धी व्यापार रहता ही है, इसलिये इनका पृथक् ग्रहण किया गया है । |
| किं पुनर्हष्ट्यादीनामग्नेरौष्ण्यप्रकाशनज्वलनादिवद्धर्मभेदः, आहोस्विदभिन्नस्यैव धर्मस्य परोपाधिनिमित्तं धर्मान्यत्वमिति ? | प्रश्न—क्या अग्निके धर्म उष्णता, प्रकाशन और ज्वलनादिके समान दृष्ट्यादि धर्मोंका भेद है, अथवा एक [ धर्मीसे ] अभिन्न धर्मका ही अन्य उपाधिके कारण विभिन्नधर्मत्व है ? |
| अत्र केचिद् व्याचक्षते—<br>आत्मवस्तुनः स्वत एवैकत्वं नानात्वं च; यथा गोगोद्रव्यतयैकत्वम्, सास्नादीनां धर्माणां परस्परतो भेदः । यथा स्थूलेष्वेकत्वं नानात्वं च, तथा निरवयवेष्वमूर्तवस्तुष्वेकत्वं नानात्वं चानुमेयम् । सर्वत्राव्यभि- | **उत्तर—**इस विषयमें कोई-कोई ऐसी व्याख्या करते हैं—आत्मवस्तुका एकत्व और नानात्व स्वतः ही है; जिस प्रकार गौका गोद्रव्यरूपसे एकत्व है और उसके सास्नादि धर्मोंका परस्पर भेद है । जिस प्रकार स्थूल पदार्थोंमें एकत्व और नानात्व हैं, उसी प्रकार निरवयव और सूक्ष्म वस्तुओंमें भी एकत्व और नानात्वका अनुमान करना चाहिये । इस नियमका सर्वत्र |
१. गौके गलेकी लटकती हुई खालको सास्ना कहते हैं । गौके सास्ना, सींग, खुर आदि धर्मोंका परस्पर भेद है ।