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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

६२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६२०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| नमन्ते प्राणिनः। प्रभूतं हिरण्यं गोसहस्रदानं चेहोपलभ्यते; तस्मादन्यपरेणापि शास्त्रेण विद्याप्राप्त्युपायदानप्रदर्शनार्था आख्यायिका आरब्धा।<br><br>अपि च तद्विद्यसंयोगस्तैश्च सह वादकरणं विद्याप्राप्त्युपायो न्यायविद्यायां दृष्टः; तच्चास्मिन्नध्याये प्राबल्येन प्रदर्श्यते। प्रत्यक्षा च विद्वत्संयोगे प्रज्ञावृद्धिः। तस्माद् विद्याप्राप्त्युपायप्रदर्शनार्थैव आख्यायिका। | प्राणी अपने प्रति विनीत हो जाते हैं। यहाँ बहुत-से सुवर्ण और सहस्र गौओंका दान देखा जाता है; अतः यहाँ शास्त्रका प्रतिपाद्य विषय दूसरा होनेपर भी यह आख्यायिका विद्याप्राप्तिके उपायभूत दानको प्रदर्शित करनेके लिये आरम्भ की गयी है।<br><br>इसके सिवा किसी विद्यामें निष्णात पुरुषोंका संयोग और उनके साथ वाद करना भी न्यायविद्यामें विद्याप्राप्तिका उपाय देखा गया है; और वह वाद इस अध्यायमें बड़ी प्रौढ़िके साथ दिखाया जाता है। विद्वानोंके संयोगसे प्रज्ञाकी वृद्धि होती है—यह तो प्रत्यक्ष ही है। अतः यह आख्यायिका विद्याप्राप्तिका उपाय प्रदर्शित करनेके लिये ही है। |

राजा जनकका सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ताको सहस्र गौएँ दान करनेकी घोषणा करना

ॐ जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे तत्र ह कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता बभूवुस्तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कः स्विदेषां ब्राह्मणानामनूचानतम इति स ह गवाँ॒ सहस्रमवरुरोध दश दश पादा एकैकस्याः शृङ्गयोराबद्धा बभूवुः॥१॥

विदेहदेशमें रहनेवाले राजा जनकने एक बड़ी दक्षिणावाले यज्ञद्वारा यजन किया। उसमें कुरु और पाञ्चाल देशोंके ब्राह्मण एकत्रित हुए। उस

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६२१

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६२१

राजा जनकको यह जाननेकी इच्छा हुई कि इन ब्राह्मणोंमें अनुवचन (प्रवचन) करनेमें सबसे बढ़कर कौन है ? इसलिये उसने एक सहस्र गौएँ गोशालामें रोक लीं। उनमेंसे प्रत्येकके सींगोंमें दश-दश पाद सुवर्ण बँधे हुए थे ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
जनको नाम ह किल सम्राड्राजा बभूव विदेहानाम्; तत्र भवो वैदेहः । स च बहुदक्षिणेन यज्ञेन, शाखान्तरप्रसिद्धो वा बहुदक्षिणो नाम यज्ञः, अश्वमेधो वा दक्षिणाबाहुल्याद्बहुदक्षिण इहोच्यते, तेनेजेऽयजत् ।जनक नामका सम्राट् विदेह देशका राजा था, विदेह देशमें उत्पन्न होने और रहनेके कारण उसे वैदेह कहते हैं। उसने एक बहुत दक्षिणावाले यज्ञसे, अथवा शाखान्तरमें प्रसिद्ध बहुदक्षिणनामक यज्ञसे, या अधिक दक्षिणावाला होनेसे यहाँ अश्वमेध ही बहुदक्षिण कहा गया है—उससे, यजन किया ।
तत्र तस्मिन्यज्ञे निमन्त्रिता दर्शनकामा वा कुरूणां देशानां पञ्चालानां च ब्राह्मणाः, तेषु हि विदुषां बाहुल्यं प्रसिद्धम् अभिसमेता अभिसङ्गता बभूवुः । तत्र महान्तं विद्वत्समुदायं दृष्ट्वा तस्य ह किल जनकस्य वैदेहस्य यजमानस्य, को नु खल्वत्र ब्रह्मिष्ठ इति विशेषेण ज्ञातुमिच्छा विजिज्ञासा बभूव । कथम् ? कः स्विद् को नु खल्वेषां ब्राह्मणानाम् अनूचानतमः ? सर्वे इमेऽनूचानाः, कः स्विदेषामतिशयेनानूचान इति ।वहाँ उस यज्ञमें निमन्त्रित होकर अथवा उसे देखनेकी इच्छासे कुरु और पाञ्चाल देशोंके ब्राह्मण एकत्रित हुए, क्योंकि इन्हीं देशोंमें विद्वानोंकी बहुलता प्रसिद्ध है। वहाँ महान् विद्वत्समुदाय देखकर उस विदेहराज यजमान जनककी विशेषरूपसे यह जाननेकी इच्छा हुई कि इनमें कौन ब्रह्मिष्ठ है। कैसी इच्छा हुई ?—यह कि इन ब्राह्मणोंमें अनुवचन करनेमें सबसे अधिक समर्थ कौन है ? अनुवचन करनेवाले तो ये सभी हैं, किंतु इनमें अतिशय अनूचान ( प्रवचन करनेवाला ) कौन है ? यह उसने जानना चाहा ।

६२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६२२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| स ह अनूचानतमविषयोत्पन्नजिज्ञासः संस्तद्विज्ञानोपायर्थं गवां सहस्रं प्रथमवयसामवरुरोध, गोष्ठेऽवरोधं कारयामास। किंविशिष्टास्ता गावोऽवरुद्धाः ! इत्युच्यते— पलचतुर्थभागः पादः सुवर्णस्य, दश दश पादा एकैकस्या गोः शृङ्गयोराबद्धा बभूवुः । पञ्च पञ्च पादा एकैकस्मिन् शृङ्गे ॥ १ ॥ | इस प्रकार अनूचानतमविषयक जिज्ञासा उत्पन्न होनेपर उसे जाननेका उपाय करनेके लिये उसने नयी अवस्थावाली एक सहस्र गौएँ रोक लीं अर्थात् गोशालामें रोकवा दीं। वे किस विशेषणवाली गौएँ रोकी गयी थीं, सो बतलाया जाता है—पलका चतुर्थ भाग पाद होता है; ऐसे सुवर्णके दश-दश पाद एक-एक गौके सींगोंमें बाँधे हुए थे, अर्थात् एक-एक सींगमें पाँच-पाँच पाद थे ॥ १ ॥ |


याज्ञवल्क्यका गौएँ ले जानेके लिये अपने शिष्यको आज्ञा देना, ब्राह्मणोंका कोप, अश्वलका प्रश्न

तान् होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वो ब्रह्मिष्ठः स एता गा उदजतामिति । ते ह ब्राह्मणा न दधृषुरथ ह याज्ञवल्क्यः स्वमेव ब्रह्मचारिणमुवाचैताः सोम्योदज सामश्रवा३ इतिता होदाचकार ते ह ब्राह्मणाश्चुक्रुधुः कथं नो ब्रह्मिष्ठो ब्रुवीतेत्यथ ह जनकस्य वैदेहस्य होताऽश्वलो बभूव स हैनं पप्रच्छ त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी३ इति स होवाच नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयं ँ स्म इति त ँ ह तत एव प्रष्टुं दध्रे होताऽश्वलः ॥ २ ॥

उसने उनसे कहा—'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपमें जो ब्रह्मिष्ठ हो वह इन गौओंको ले जाय।' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ। तब

ब्रह्मचारियोंका...

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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२३

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२३


याज्ञवल्क्यने अपने ही ब्रह्मचारीसे कहा, 'हे सोम्य सामश्रवा ! तू इन्हें ले जा।' तब वह उन्हें ले चला। इससे वे ब्राह्मण 'यह हम सबमें अपनेको ब्रह्मिष्ठ कैसे कहता है' इस प्रकार कहते हुए क्रुद्ध हो गये। विदेहराज जनकका होता अश्वल था, उसने इससे पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! हम सबमें क्या तुम ही ब्रह्मिष्ठ हो ?' उसने कहा, ब्रह्मिष्ठको तो हम नमस्कार करते हैं, हम तो गौओंकी ही इच्छावाले हैं।' इसीसे होता अश्वलने उससे प्रश्न करनेका निश्चय किया ॥ २ ॥

गा एवमवरुध्य ब्राह्मणांस्तान् होवाच हे ब्राह्मणा भगवन्त इत्यामन्त्र्य । यो वो युष्माकं ब्रह्मिष्ठः, सर्वे यूयं ब्रह्माणोऽतिशयेन युष्माकं ब्रह्मा यः स एता गा उदजतामुत्कालयतु स्वगृहं प्रति ।इस प्रकार गौओंको रोककर उसने उन ब्राह्मणोंसे 'हे पूज्य ब्राह्मणो !' इस प्रकार सम्बोधित करके कहा, 'आपमें जो ब्रह्मिष्ठ हो—ब्रह्मा (ब्रह्मवेत्ता) तो आप सभी हैं, किंतु जो आपमें अतिशयरूपसे ब्रह्मा हो—वह इन गौओंको अपने घरके प्रति हाँक ले जाय।'
ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः । ह किलैवमुक्ता ब्राह्मणा ब्रह्मिष्ठतामात्मनः प्रतिज्ञातुं न दधृषुर्न प्रगल्भाः संवृत्ताः । अप्रगल्भभूतेषु ब्राह्मणेष्वथ ह याज्ञवल्क्यः स्वमात्मीयमेव ब्रह्मचारिणमन्तेवासिनमुवाच—उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ। इस प्रकार कहे जानेपर उन ब्राह्मणोंका अपनी ब्रह्मिष्ठताके विषयमें प्रतिज्ञा करनेका साहस न हुआ—वे ऐसा प्रकट करनेकी धृष्टता न कर सके। ब्राह्मणोंके साहसहीन हो जानेपर याज्ञवल्क्यने अपने ही ब्रह्मचारी अनुगत शिष्यसे कहा,
एता गा हे सोम्योदजोद्गमयास्मद्गृहान् प्रति, हे सामश्रवः—'हे सोम्य ! हे सामश्रवा ! इन गौओंको हमारे घर ले जा;
सामविधिं हि शृणोत्यतोऽर्थाच्चतुर्वेदो याज्ञवल्क्यः ।सामविधिको श्रवण करनेके कारण उसे सामश्रवा कहा है, इससे स्वतः ही याज्ञवल्क्य चारों वेदोंका

६२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६२४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| ता गा होदाचकारोत्कालितवानाचार्यगृहं प्रति । | ज्ञाता सिद्ध होता है।^१ तब वह उन गौओंको आचार्य याज्ञवल्क्यके घरकी ओर ले चला। | | याज्ञवल्क्येन ब्रह्मिष्ठपणस्वीकरणेन आत्मनो ब्रह्मिष्ठता प्रतिज्ञाता, इति ते ह चुक्रुधुः क्रुद्धवन्तो ब्राह्मणाः । तेषां क्रोधाभिप्रायमाचष्टे—कथं नोऽस्माकं एकैकप्रधानानां ब्रह्मिष्ठोऽस्मीति ब्रवीतेति । | याज्ञवल्क्यने ब्रह्मिष्ठसम्बन्धी पण स्वीकार करके अपनी ब्रह्मिष्ठताकी प्रतिज्ञा की है—इससे वे ब्राह्मण क्रुद्ध हो गये। श्रुति उनके क्रोधका अभिप्राय बतलाती है—हममेंसे एक-एक प्रधान ब्राह्मणके सामने वह 'मैं ब्रह्मिष्ठ हूँ' ऐसा कैसे कहता है—इससे वे क्रुद्ध हो गये। | | अथ हैवं क्रुद्धेषु ब्राह्मणेषु जनकस्य यजमानस्य होता ऋत्विगश्वलो नाम बभूव आसीत् । स एनं याज्ञवल्क्यम्, ब्रह्मिष्ठाभिमानी राजाश्रयत्वाच्च धृष्टः, याज्ञवल्क्यं पप्रच्छ पृष्टवान् । कथम् ? त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी३ इति । प्लुतिर्भर्त्सनार्था। | तब इस प्रकार क्रुद्ध हुए ब्राह्मणोंमें यजमान जनकका होता जो अश्वल था, वह इस याज्ञवल्क्यसे बोला—राजाश्रयके कारण अभिमानी और धृष्ट होनेसे उसने याज्ञवल्क्यसे पूछा। किस प्रकार पूछा—'याज्ञवल्क्य ! क्या निश्चय हम सबमें तुम्हीं ब्रह्मिष्ठ हो ?' यहाँ 'असि' पदमें प्लुत ईकारका प्रयोग भर्त्सना (धिक्कारने) के लिये है। | | स होवाच याज्ञवल्क्यः—नमस्कुर्मो वयं ब्रह्मिष्ठाय, इदानीं गोकामाः स्मो वयमिति । तं | उस याज्ञवल्क्यने कहा—'ब्रह्मिष्ठको हम नमस्कार करते हैं, इस समय तो हम गौओंकी इच्छा- |


१. याज्ञवल्क्य यजुर्वेदी है, उससे ब्रह्मचारी सामवेदका श्रवण ( अध्ययन ) करता है। साम ऋग्वेदमें आरूढ होकर ही गान किया जाता है, तथा अथर्ववेद इन तीन वेदोंके ही अन्तर्भूत है; इसलिये इस कथनसे याज्ञवल्क्य चारों वेदोंका ज्ञाता सिद्ध होता है।

ब्राह्मण १] \

ब्राह्मण १]
शाङ्करभाष्यार्थ
६२५


| ब्रह्मिष्ठप्रतिज्ञं सन्तं तत एव<br>ब्रह्मिष्ठपणस्वीकरणात् प्रष्टुं दध्रे<br>धृतवान् मनो होता अश्वलः॥२॥ | वाले हैं।' इस प्रकार ब्रह्मिष्ठकी<br>प्रतिज्ञावाला होनेपर और इसी<br>कारण ब्रह्मिष्ठपण स्वीकार करनेसे<br>होता अश्वलने मनमें उससे प्रश्न<br>करनेका निश्चय कर लिया ॥२॥ |


मृत्युग्रस्त कर्मसाधनोंकी आसक्तिसे पार पानेका उपाय

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदँ सर्वं मृत्युनाप्तँ सर्वं मृत्युनाभिपन्नं केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति होत्रर्त्विजाग्निना वाचा वाग्वै यज्ञस्य होता तद्येयं वाक्सोऽयमग्निः स होता स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥३॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह सब जो मृत्युसे व्याप्त है, मृत्युद्वारा स्वाधीन किया हुआ है, उस मृत्युकी व्याप्तिका यजमान किस साधनसे अतिक्रमण करता है?' [इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'वह यजमान होता ऋत्विकरूप अग्निसे और वाक्द्वारा उसका अतिक्रमण कर सकता है। वाक् ही यज्ञका होता है यह जो वाक् है, वही यह अग्नि है, वह होता है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है' ॥ ३ ॥

| याज्ञवल्क्येति होवाच । तत्र मधुकाण्डे पाङ्क्तेन कर्मणा दर्शनसमुच्चितेन यजमानस्य मृत्योरत्ययो व्याख्यात उद्गीथप्रकरणे सङ्क्षेपतः। तस्यैव परीक्षाविषयोऽयमिति तद्गतदर्शनविशेषार्थोऽयं विस्तर आरभ्यते । | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा। तहाँ गत मधुकाण्डमें जो उद्गीथप्रकरण है, उसमें दर्शनसहित पाङ्क्तकर्मसे यजमानके मृत्युसे पार होनेका संक्षेपसे वर्णन किया गया है। यह प्रकरण उसीकी परीक्षाका विषय [अर्थात् उसीका विचार करनेके लिये] है, अतः उसमें आये हुए दर्शनविशेषके लिये ही यह विस्तार आरम्भ किया जाता है। |

बृ० उ० ४०—

६२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३]

६२६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३]
संस्कृतहिन्दी
यद्यिदं साधनजातम् अस्य कर्मण ऋत्विगग्नयादि मृत्युना कर्मलक्षणेन स्वाभाविकासङ्गसहितेन आप्तं व्याप्तम्, न केवलं व्याप्तमभिपन्नं च मृत्युना वशीकृतं च। केन दर्शनलक्षणेन साधनेन यजमानो मृत्योराप्तिमति मृत्युगोचरत्वम् अतिक्रम्य मुच्यते स्वतन्त्रो मृत्योरवशो भवतीत्यर्थः।इस कर्मका जो यह ऋत्विक् और अग्नि आदि साधनसमूह है, वह स्वाभाविक आसक्तिसहित कर्मरूप मृत्युसे व्याप्त है। केवल व्याप्त ही नहीं है, अपितु अभिपन्न अर्थात् मृत्युद्वारा वशमें किया हुआ है। सो किस दर्शनरूप साधनसे यजमान मृत्युकी प्राप्तिको पार कर अर्थात् मृत्युकी विषयताका अतिक्रमण कर मुक्त यानी स्वतन्त्र हो जाता है अर्थात् मृत्युके वशीभूत नहीं रहता।
ननूद्गीथ एवाभिहितं येनातिमुच्यते मुख्यप्राणात्मदर्शनेनेति।आक्षेप—किंतु जिस मुख्य प्राणात्मदर्शनसे वह मुक्त होता है, उसका वर्णन तो उद्गीथप्रकरणमें ही कर दिया है।
बाढमुक्तम्, योऽनुक्तो विशेषस्तत्र, तदर्थोऽयमारम्भ इत्यदोषः।समाधान—ठीक है, वहाँ वर्णन तो किया है; किंतु वहाँ जिस विशेषका उल्लेख नहीं किया, उसके लिये यह ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है; इसलिये इसमें कोई दोष नहीं है।
होत्रर्त्विजाग्निना वाचेत्याह याज्ञवल्क्यः। एतस्यार्थं व्याचष्टे।याज्ञवल्क्यने कहा, 'होता ऋत्विक्-रूप अग्निसे और वाक्‌से उसका अतिक्रमण किया जा सकता है।' श्रुति इस वाक्यका अर्थ करती है।
कः पुनर्होता येन मृत्युमतिक्रामति? इत्युच्यते—वाग्वै यज्ञस्य यजमानस्य "यज्ञो वै यजमानः"भला, जिसके द्वारा यजमान मृत्युको पार करता है वह 'होता' कौन है? यह बताया जाता है—वाक् ही यज्ञका अर्थात् "यज्ञ ही यजमान है" इस श्रुतिके

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२७

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२७


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
इति श्रुतेः। यज्ञस्य यजमानस्य या वाक् सैव होताधियज्ञे। कथम् ? तत्तत्र येयं वाग् यज्ञस्य यजमानस्य सोऽयं प्रसिद्धोऽग्निरधिदैवतम्। तदेतत् त्र्यन्नप्रकरणे व्याख्यातम्। स चाग्निर्होता "अग्निर्वै होता" इति श्रुतेः।अनुसार यजमानका होता है। [ तात्पर्य यह है कि ] जो वाणी है, वही अधियज्ञमें यज्ञ यानी यजमानका होता है। किस प्रकार ? इस प्रकार कि यहाँ जो यह यज्ञ यानी यजमानकी वाणी है, वही प्रसिद्ध अधिदैव अग्नि है। उस इस अग्निकी त्र्यन्न प्रकरणमें व्याख्या की गयी है। तथा "अग्नि ही होता है" इस श्रुतिके अनुसार वह अग्नि ही होता है।
यदेतद् यज्ञस्य साधनद्वयम्—होता चर्त्विग् अधियज्ञम्, अध्यात्मं च वाक्, एतदुभयं साधनद्वयं परिच्छिन्नं मृत्युना आप्तं स्वाभाविकाज्ञानासङ्गप्रयुक्तेन कर्मणा मृत्युना प्रतिक्षणमन्यथात्वमापद्यमानं वशीकृतम्। तद् अनेनाधिदैवतरूपेणाग्निना दृश्यमानं यजमानस्य यज्ञस्य मृत्योरतिमुक्तये भवति। तदेतदाह—स मुक्तिः स होता अग्निर्मुक्तिः, अग्निस্বরূপदर्शनमेव मुक्तिः।इस प्रकार यज्ञके जो ये दो साधन अधियज्ञ होता ऋत्विक् और अध्यात्म वाक् हैं; ये दोनों साधन परिच्छिन्न और मृत्युसे व्याप्त हैं तथा स्वाभाविक अज्ञान और आसक्तिप्रयुक्त कर्मरूप मृत्युसे प्रतिक्षण अन्यथात्वको प्राप्त हो रहे हैं और उसके द्वारा वशमें किये गये हैं। वे इस अधिदैवतरूप अग्निके द्वारा देखे जानेपर यजमानके यज्ञके मृत्युके अतिक्रमणके लिये होते हैं। इसीसे यह कहा है—वह मुक्ति है, वह होतारूप अग्नि मुक्ति है अर्थात् होताको अग्निरूप देखना ही उसकी मुक्ति है।
यदैव साधनद्वयमग्निरूपेण पश्यति, तदानीमेव हि स्वाभावि-जिस समय भी यजमान इन दोनों साधनोंको अग्निरूपसे देखता है, उसी समय वह स्वाभाविक

६२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६२८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| कादासङ्गान्मृत्योर्विमुच्यते आध्यात्मिकात् परिच्छिन्नरूपादाधिभौतिकाच्च। तस्मात् स होता अग्निरूपेण दृष्टो मुक्तिर्मुक्तिसाधनं यजमानस्य। सा अतिमुक्तिः—यैव च मुक्तिः साऽतिमुक्तिः, अतिमुक्तिसाधनमित्यर्थः। साधनद्वयस्य परिच्छिन्नस्य या अधिदेवतारूपेणापरिच्छिन्नेनाग्निरूपेण दृष्टिः, सा मुक्तिः। यासौ मुक्तिरधिदेवतादृष्टिः सैव, अध्यात्माधिभूतपरिच्छेदविषयासङ्गास्पदं मृत्युमतिक्रम्य अधिदेवतात्वस्याग्निभावस्य प्राप्तिर्या फलभूता, सा अतिमुक्तिरित्युच्यते। तस्या अतिमुक्तेर्मुक्तिरेव साधनमिति कृत्वा सा अतिमुक्तिरित्याह। <br><br> यजमानस्य ह्यतिमुक्तिर्वागादीनामग्न्यादिभाव इत्युद्गीथप्रकरणे व्याख्यातम्। तत्र सामान्येन मुख्यप्राणदर्शनमात्रं मुक्तिसाधनमुक्तम्, न तद्विशेषः। वागादीनाम् अग्न्यादिदर्शनमिह | आसक्तिरूप मृत्युसे अर्थात् आध्यात्मिक और आधिभौतिक परिच्छिन्नरूपसे मुक्त हो जाता है। अतः अग्निरूपसे देखा गया वह होता मुक्ति यानी यजमानकी मुक्तिका साधन है। वह अतिमुक्ति है—जो ही मुक्ति है, वही अतिमुक्ति अर्थात् अतिमुक्तिका साधन है। इन दोनों परिच्छिन्न साधनोंकी जो अधिदैवरूप अपरिच्छिन्न अग्निरूपसे दृष्टि है, वही मुक्ति है। यह जो अधिदेवता-दृष्टिरूप मुक्ति है, वही अर्थात् अध्यात्म और अधिभूत परिच्छेदविषयक आसक्तिके स्थानभूत मृत्युको पार करके जो फलभूता अधिदैवत्व यानी अग्निभावकी प्राप्ति है, वही अतिमुक्ति कही जाती है। उस अतिमुक्तिका साधन मुक्ति ही है, इसलिये वह अतिमुक्ति है—ऐसा कहा गया है। <br><br> वागादिका अग्न्यादिभाव यजमानकी अतिमुक्ति है—इसकी व्याख्या उद्गीथप्रकरणमें की जा चुकी है। वहाँ मुख्य प्राणदर्शनमात्रको ही सामान्यरूपसे मुक्तिका साधन बतलाया है, उसका विशेष वर्णन नहीं किया। यहाँ वागादिमें अग्न्यादिदृष्टि करना यह विशेष बतलाया |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२९

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२९


| विशेषो वर्ण्यते । मृत्युप्राप्त्यतिमुक्तिस्तु सैव फलभूता, योद्गीथब्राह्मणेन व्याख्याता — 'मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते' ( १ । ३ । १२ ) इत्याद्या ॥ ३ ॥ | गया है। किंतु उसकी फलभूता जो मृत्युप्राप्तिसे अतिमुक्ति है, वह तो वही है, जिसकी उद्गीथब्राह्मणद्वारा 'मृत्युको पार करके दीप्त होता है' इस प्रकारसे व्याख्या की गयी है ॥ ३ ॥ |


अहोरात्रादिरूप कालसे अतिमुक्तिका साधन

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदꣳ सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तꣳ सर्वमहोरात्राभ्यामभिपन्नं केन यजमानोऽहोरात्रयोराप्तिमतिमुच्यत इत्यध्वर्युणर्त्विजा चक्षुषादित्येन चक्षुर्वै यज्ञस्याध्वर्युस्तद्यदिदं चक्षुः सोऽसावादित्यः सोऽध्वर्युः स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥ ४ ॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो कुछ है, सब दिन और रात्रिसे व्याप्त है, सब दिन और रात्रिके अधीन है। तब किस साधनके द्वारा यजमान दिन और रात्रिकी व्याप्तिका अतिक्रमण कर सकता है? [ इसपर याज्ञवल्क्य बोला— ] 'अध्वर्यु-ऋत्विक और चक्षुरूप आदित्यके द्वारा। अध्वर्यु यज्ञका चक्षु ही है। अतः यह जो चक्षु है, वह यह आदित्य है और वह अध्वर्यु है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है ॥ ४ ॥


| याज्ञवल्क्येति होवाच । स्वाभाविकादज्ञानासङ्गप्रयुक्तात् कर्मलक्षणान्मृत्योरतिमुक्तिर्व्याख्याता। तस्य कर्मणः सासङ्गस्य मृत्योराश्रयभूतानां दर्शपूर्णमासादिकर्मसाधनानां यो विपरिणामहेतुः | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा। स्वाभाविक अज्ञानजनित आसक्तिसे होनेवाले कर्मरूप मृत्युसे अतिमुक्तिकी व्याख्या कर दी गयी जो उस आसक्तियुक्त कर्मरूप मृत्युके आश्रयभूत दर्श और पूर्णमासादि कर्मके साधनोंके विपरिणामका हेतुभूतकाल |

६३० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ३]

६३० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ३]


| कालः, तस्मात् कालात् पृथगतिमुक्तिर्वक्तव्येतीदमारभ्यते, क्रियानुष्ठानव्यतिरेकेणापि प्रागूर्ध्वं च क्रियायाः साधनविपरिणामहेतुत्वेन व्यापारदर्शनात् कालस्य । तस्मात् पृथक्कालादतिमुक्तिर्वक्तव्येत्यत आह—<br><br>यदिदं सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तम्, स च कालो द्विरूपः—अहोरात्रादिलक्षणः, तिथ्यादिलक्षणश्च । तत्राऽहोरात्रादिलक्षणात्तावदतिमुक्तिमाह—अहोरात्राभ्यां हि सर्वं जायते वर्धते विनश्यति च, तथा यज्ञसाधनं च ।<br><br>यज्ञस्य यजमानस्य चक्षुरध्वर्युश्च । शिष्टान्यक्षराणि पूर्ववन्नेयानि । यजमानस्य चक्षुरध्वर्युश्च साधनद्वयमध्यात्मधिभूतपरिच्छेदं हित्वाऽधिदैवतात्मना दृष्टं यत् स | है, उस कालसे पृथक् जो अतिमुक्ति है [ अर्थात् जो उस कालसे मुक्त होनेका साधन है ] उसका वर्णन करना है, इसलिये यह आरम्भ किया जाता है, क्योंकि क्रियाके अनुष्ठानके बिना भी क्रियाके पूर्व और पश्चात् उसके साधनोंके विपरिणामके हेतुरूपसे कालका व्यापार देखा जाता है। अतः कालसे पृथक् अतिमुक्तिका वर्णन करना आवश्यक है, इसलिये श्रुति कहती है—<br><br>यह जो कुछ है सब दिन और रात्रिसे व्याप्त है, वह काल दो प्रकारका है—दिन-रात्रिरूप और तिथ्यादिरूप । उनमेंसे पहले अहोरात्रादिरूप कालसे अतिमुक्ति बतलायी जाती है—दिन-रातसे ही सब उत्पन्न होता, बढ़ता और नाशको प्राप्त होता है। इसी प्रकार यज्ञके साधन भी उन्हींसे उत्पन्न होते, बढ़ते और नष्ट होते हैं ।<br><br>यज्ञ यानी यजमानके नेत्र और अध्वर्यु—शेष अक्षरोंको पूर्ववत् लगाना चाहिये। अर्थात् यजमानके नेत्र और अध्वर्यु ये दोनों साधन अपने अध्यात्म और अधिभूत परिच्छेदको त्यागकर जब अधिदैवरूपसे देखे जाते हैं तो वही इनकी मुक्ति |

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३१

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३१


| मुक्तिः सोऽध्वर्युरादित्यभावेन दृष्टो मुक्तिः। सैव मुक्तिरेवातिमुक्तिरिति। पूर्ववत् आदित्यात्मभावमापन्नस्य हि नाहोरात्रे सम्भवतः ॥ ४ ॥ | है। आदित्यभावसे देखा हुआ वह अध्वर्यु मुक्ति ही है। पूर्ववत् वह मुक्ति ही अतिमुक्ति है, क्योंकि आदित्यभावको प्राप्त हुए पुरुषके लिये दिन-रात होने सम्भव नहीं हैं ॥ ४ ॥ |


तिथ्यादिरूप कालसे अतिमुक्तिका साधन

| इदानीं तिथ्यादिलक्षणादतिमुक्तिरुच्यते— | अब तिथ्यादिरूप कालसे अतिमुक्ति बतलायी जाती है— |

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदꣳ सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामाप्तꣳ सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामभिपन्नं केन यजमानः पूर्वपक्षापरपक्षयोराप्तिमतिमुच्यत इत्युद्गात्रर्त्विजा वायुना प्राणेन प्राणो वै यज्ञस्योद्गाता तद्योऽयं प्राणः स वायुः स उद्गाता स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥५॥

'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो कुछ है, सब पूर्वपक्ष और अपरपक्षसे व्याप्त है; सब पूर्वपक्ष और अपरपक्षद्वारा वशमें किया हुआ है। किस उपायसे यजमान पूर्वपक्ष और अपरपक्षकी व्याप्तिसे पार होकर मुक्त होता है?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा— ] 'उद्गाता ऋत्विक्से और वायुरूप प्राणसे; क्योंकि उद्गाता यज्ञका प्राण ही है। तथा यह जो प्राण है, वही वायु है, वही उद्गाता है, वही मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है ॥ ५ ॥

| यदिदं सर्वम्—अहोरात्रयोरविशिष्टयोरादित्यः कर्ता, न प्रतिपदादीनां तिथीनाम्; तासां तु वृद्धिक्षयोपगमनेन प्रतिपत्प्रभृतीनां | यदिदं सर्वम्—ये जो अविशिष्ट (वृद्धिक्षयशून्य) दिन-रात हैं, इन सबका कर्ता आदित्य है किंतु वह प्रतिपदादि तिथियोंका कर्ता नहीं है; उन प्रतिपदादिके तो वृद्धि और क्षय देखे जाते हैं, अतः उनका कर्ता तो |

६३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६३२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| चन्द्रमाः कर्ता। अतस्तदापत्त्या पूर्वपक्षापरपक्षात्ययः, आदित्यापत्त्या अहोरात्रात्ययवत्। | चन्द्रमा है। अतः आदित्यभावकी प्राप्तिसे जैसे अहोरात्रका अतिक्रमण होता है, उसी प्रकार चन्द्रभावकी प्राप्तिसे पूर्वपक्ष और अपरपक्षका अतिक्रमण किया जा सकता है। | | तत्र यजमानस्य प्राणो वायुः, स एवोद्गाता—इत्युद्गीथब्राह्मणेऽवगतम् 'वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायत्' इति च निर्धारितम्। 'अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतीरूपमसौ चन्द्रः' इति च। | वहाँ (काण्वशाखाकी श्रुतिमें) यजमानका प्राण वायु है। वही उद्गाता है—यह बात उद्गीथब्राह्मणमें जानी गयी थी और यह निश्चय किया गया था कि उसने वाक्से और प्राणसे उद्गान किया इस प्राणका जल शरीर है और यह चन्द्र ज्योतीरूप है। | | प्राणवायुचन्द्रमसामेकत्वाच्चन्द्रमसा वायुना चोपसंहारे न कश्चिद्विशेषः। एवं मन्यमाना श्रुतिर्वायुनाऽधिदैवतरूपेणोपसंहरति। | वायु, प्राण और चन्द्रमाकी एकता होनेके कारण यदि [ उद्गीथब्राह्मणोक्त और उपर्युक्त श्रुतियोंका ] चन्द्रमा और वायुरूपसे [ अलग-अलग ] उपसंहार किया गया है तो उसमें कोई अन्तर नहीं है। ऐसा मानकर ही श्रुति इस मन्त्रका अधिदैव वायुरूपसे उपसंहार करती है। | | अपि च वायुनिमित्तौ हि वृद्धिक्षयौ चन्द्रमसः। तेन तिथ्यादिलक्षणस्य कालस्य कर्तुरपि कारयिता वायुः। अतो वायुरूपापन्नस्तिथ्यादिकालादतीतो भवतीत्युपपन्नतरं भवति। तेन | इसके सिवा चन्द्रमाके वृद्धि और क्षय भी वायुके ही कारण हैं। अतः वायु तिथ्यादिरूप कालके कर्ता ( चन्द्रमा ) का भी करानेवाला है। इसलिये वायुरूपको प्राप्त हुआ पुरुष तिथ्यादिरूप कालसे पार हो जाता है—यह कथन और भी युक्तियुक्त है। अतः अन्य श्रुति (माध्यन्दिनीय |

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३३

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३३

| श्रुत्यन्तरे चन्द्ररूपेण दृष्टिर्मुक्ति-<br>रतिमुक्तिश्च। इह तु काण्वानां<br>साधनद्वयस्य तत्कारणरूपेण<br>वाय्वात्मना दृष्टिर्मुक्तिरतिमुक्ति-<br>श्चेति न श्रुत्योर्विरोधः ॥ ५ ॥ | शाखा ) में जो चन्द्ररूपसे दृष्टि है,<br>वह मुक्ति और अतिमुक्ति है। परंतु<br>यहाँ काण्वशाखावालोंके मतमें<br>अहोरात्र और तिथि आदि दोनों<br>ही साधनोंके कारणभूत वायुभावसे<br>जो दृष्टि है, वह मुक्ति और अति-<br>मुक्ति है-इसलिये इन श्रुतियोंमें<br>विरोध नहीं है ॥ ५ ॥ |


परिच्छेदके विषयभूत मृत्युको पार करनेके आश्रयका वर्णन

| मृत्योः कालादातिमुक्तिर्व्या-<br>ख्याता यजमानस्य। सोऽति-<br>मुच्यमानः केनावष्टम्भेन परिच्छेद-<br>विषयं मृत्युमतीत्य फलं प्राप्नोति-<br>अतिमुच्यत इत्युच्यते— | यजमानकी मृत्युरूप कालसे<br>अतिमुक्ति होनेकी व्याख्या की<br>गयी। वह अतिमुक्त होता हुआ<br>किस आश्रयसे परिच्छेदके विषय-<br>भूत मृत्युको पार करके फल प्राप्त<br>करता—अतिमुक्त होता है-सो<br>बतलाया जाता है- |

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदमन्तरिक्षमनारम्ब-<br>णमिव केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति<br>ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चन्द्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा<br>तद्यदिदं मनः सोऽसौ चन्द्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः<br>सातिमुक्तिरित्यतिमोक्षा अथ सम्पदः ॥ ६ ॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो अन्तरिक्ष है, वह निरालम्ब-सा है। अतः यजमान किस आलम्बनसे स्वर्गलोकमें चढ़ता है।' [इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'ब्रह्मा ऋत्विजके द्वारा और मनरूप चन्द्रमासे

६३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

६३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

ब्रह्मा यज्ञका मन ही है। और यह जो मन है, वही यह चन्द्रमा है, वह ब्रह्मा है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है।' इस प्रकार अतिमोक्षोंका वर्णन हुआ, अब सम्पदोंका निरूपण किया जाता है ॥ ६ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
यदिदं प्रसिद्धमन्तरिक्षमाकाशः अनारम्बणम् अनालम्बनम् इव-शब्दादस्त्येव तत्रालम्बनम्, तत्तु न ज्ञायत इत्यभिप्रायः। यत्तु तदज्ञायमानमालम्बनम्, तत् सर्वनाम्ना केनेति पृच्छ्यते; अन्यथा फलप्राप्तेरसम्भवात्। येनावष्टम्भेनाक्रमेण यजमानः कर्मफलं प्रतिपद्यमानः अतिमुच्यते, किं तदिति प्रश्नविषयः। केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति, स्वर्गं लोकं फलं प्राप्नोत्यतिमुच्यत इत्यर्थः।यह जो प्रसिद्ध अन्तरिक्ष अर्थात् आकाश है, वह अनारम्बन-अनालम्बन-सा है। 'इव' शब्दसे यह अभिप्राय है कि इसमें आलम्बन तो है किंतु वह जाना नहीं जाता। यहाँ जो ज्ञात न होनेवाला आलम्बन है, वही 'केन' इस सर्वनामद्वारा पूछा जाता है। नहीं तो [ यदि आलम्बनका अभाव माना जायगा तो ] फलप्राप्ति ही सम्भव न होगी। यहाँ प्रश्नका विषय यह है कि जिस आश्रयके द्वारा यजमान कर्मफलको प्राप्त होता हुआ अतिमुक्त होता है, वह क्या है ? तात्पर्य यह है कि यजमान किस आश्रयसे स्वर्गलोकपर आरूढ़ होता है, यानी स्वर्गलोकरूप फलको प्राप्त करता अर्थात् अतिमुक्त हो जाता है।
ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चन्द्रेणेत्यक्षरन्यासः पूर्ववत्। तत्राध्यात्मं यज्ञस्य यजमानस्य यदिदं प्रसिद्धं मनः, सोऽसौ चन्द्रोऽधिदैवम्। मनोऽध्यात्मं चन्द्रमा अधिदैवत-ब्रह्मरूप ऋत्विक्से और मन-रूप चन्द्रमासे-इन अक्षरोंकी योजना पूर्ववत् करनी चाहिये। यहाँ यज्ञ यानी यजमानका जो यह प्रसिद्ध अध्यात्म मन है, वही यह अधिदैव चन्द्रमा है। मन अध्यात्म है और

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३५

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३५


संस्कृत शाङ्करभाष्यहिन्दी भाष्यार्थ
मिति हि प्रसिद्धम् । स एव चन्द्रमा ब्रह्मर्त्विक् । तेनाधिभूतं ब्रह्मणः परिच्छिन्नं रूपमध्यात्मं च मनस एतद्द्वयमपरिच्छिन्नेन चन्द्रमसो रूपेण पश्यति । तेन चन्द्रमसा मनसावलम्बनेन कर्मफलं स्वर्गं लोकं प्राप्नोत्यतिमुच्यते इत्यभिप्रायः । इतीत्युपसंहारार्थं वचनम् । इत्येवम्प्रकारा मृत्योरतिमोक्षाः । सर्वाणि हि दर्शनप्रकाराणि यज्ञाङ्गविषयाण्यस्मिन्नवसर उक्तानीति कृत्वोपसंहारः । इत्यतिमोक्षाः, एवम्प्रकारा अतिमोक्षा इत्यर्थः ।चन्द्रमा अधिदैवत है—यह प्रसिद्ध ही है। वही चन्द्रमा ब्रह्मा ऋत्विक् है। इसीसे अधिभूत ब्रह्माके और अध्यात्म मनके जो परिच्छिन्नरूप हैं—इन दोनोंको चन्द्रमाके अपरिच्छिन्नरूपसे देखता है। उस चन्द्रमारूप मनको आश्रय मानकर उससे अपने कर्मफलभूत स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है अर्थात् अतिमुक्त हो जाता है—ऐसा इसका अभिप्राय है। 'इत्यतिमोक्षाः' इस वाक्यमें 'इति' पद उपसंहारके लिये कहा गया है। अर्थात् इतने प्रकारके मृत्युसे अतिमोक्ष हैं। इस बीचमें यज्ञाङ्गविषयक सभी दर्शन-प्रकारोंका वर्णन कर दिया गया है—इसलिये यह उपसंहार किया है। 'इत्यतिमोक्षाः' अर्थात् इतने प्रकारके अतिमोक्ष हैं।
अथ सम्पदः—अथाधुना सम्पद उच्यन्ते। सम्पन्नाम केनचित्सामान्येनाग्निहोत्रादीनां कर्मणां फलवतां तत्फलाय सम्पादनं सम्पत्फलस्यैव वा। सर्वोत्साहेन फलसाधनानुष्ठाने प्रयतमानानां'अथ सम्पदः'—अब सम्पदोंका वर्णन किया जाता है। 'सम्पद्' का तात्पर्य यह है कि किसी भी समानतासे अग्निहोत्रादि फलयुक्त कर्मोंका उस फलके लिये सम्पादन (आरोप) किया जाय, अथवा सम्पद्के फल (देवलोकादि) का ही [उज्ज्वलत्वादि सामान्यके कारण आज्यादि आहुतियोंमें सम्पादन किया जाय]। जो लोग पूर्ण उत्साहसे किसी फलके साधनका अनुष्ठान करनेके

६३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

६३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३


केनचिद्वैगुण्येनारसम्भवः । तदिदानीमाहिताग्निः सन् यत् किञ्चित् कर्माग्निहोत्रादीनां यथासम्भवमादाय आलम्बनीकृत्य कर्मफलविद्वत्तायां सत्यां यत्कर्मफलकामो भवति, तदेव सम्पादयति । अन्यथा राजसूयाश्वमेधपुरुषमेधसर्वमेधलक्षणानाम् अधिकृतानां त्रैवर्णिकानामप्यसम्भवः—तेषां तत्पाठः स्वाध्यायर्थ एव केवलः स्यात्, यदि तत्फलप्राप्त्युपायः कश्चन न स्यात् । तस्मात्तेषां सम्पदैव तत्फलप्राप्तिः, तस्मात् सम्पदामपि फलवत्त्वम्, अतः सम्पद आरभ्यन्ते ॥ ६ ॥लिये प्रयत्न कर रहे हैं, उन्हें किसी भी दोषके कारण उसकी प्राप्ति असम्भव हो जाती है। अतः इस समय [सम्पद्के द्वारा] पुरुष आहिताग्नि होकर अग्निहोत्रादिमेंसे जिसका करना सम्भव हो ऐसे किसी कर्मको लेकर उसीके आश्रयसे, कर्म फलका ज्ञान होनेपर, जिस कर्म-फलकी इच्छा होती है उसीका सम्पादन कर लेता है। नहीं तो राजसूय, अश्वमेध, पुरुषमेध एवं सर्वमेधरूप कर्मोंके अधिकारी त्रैवर्णिकोंको भी उनका फल मिलना असम्भव है। यदि [धनाभावादिके कारण] उन राजसूयादिके फलकी प्राप्तिका कोई उपाय न हो तो उनका वह पाठ केवल स्वाध्यायके लिये ही होगा। अतः उन्हें उनकी सम्पत्तिसे ही उनके फलकी प्राप्ति हो जायगी ।¹ इसलिये सम्पदोंकी भी फलवत्ता है; अतः सम्पदोंका आरम्भ किया जाता है॥ ६ ॥

१. भावनाद्वारा किसी अन्य वस्तुका अन्यमें आरोप करना 'सम्पद्' कहलाता है। राजसूयादि कर्म बहुत द्रव्यसाध्य हैं तथा उनमेंसे प्रत्येक कर्मका सभी त्रैवर्णिकोंको अधिकार भी नहीं है। ऐसी अवस्थामें जो धनाभाव या अन्य वर्णमें उत्पन्न होनेके कारण उनमेंसे किसी कर्मको नहीं कर सकते, वे सम्पद्द्वारा उनका फल प्राप्त कर सकते हैं। यदि सम्पत्-कर्म न होता तो उनके लिये उन यज्ञोंका प्रतिपादन करनेवाला शास्त्र केवल स्वाध्यायमें ही उपयोगी हो सकता था; इसलिये सम्पदोंका प्रतिपादन बहुत उपयोगी है।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३७

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३७


शस्त्रसम्बन्धी ऋचाएँ और उनसे प्राप्त होनेवाला फल

याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होता-
स्मिन् यज्ञे करिष्यतीति तिसृभिरिति कतमास्तास्तिस्र
इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया किं
ताभिर्जयतीति यत्किञ्चेदं प्राणभृदिति ॥ ७ ॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज कितनी ऋचाओंके द्वारा होता इस यज्ञमें शस्त्र-शंसन करेगा?' [याज्ञवल्क्यने कहा-] 'तीनके द्वारा।' [अश्वल—] 'वे तीन कौन-सी हैं? [याज्ञवल्क्य-] 'पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या।' [अश्वल-] 'इनसे यजमान किसको जीतता है?' [याज्ञवल्क्य—] 'यह जितना भी प्राणिसमुदाय है। [उस सबको जीत लेता है]' ॥ ७ ॥


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
याज्ञवल्क्येति होवाच अभिमुखीकरणाय। कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होतास्मिन् यज्ञे कतिभिः कतिसङ्ख्याभिर्ऋग्भिर्ऋग्जातिभिः अयं होतर्त्विगस्मिन् यज्ञे करिष्यति शस्त्रं शंसति। **आहेतरः—तिसृभि-**र्ऋग्जातिभिः। इत्युक्तवन्तं प्रत्याहेतरः—कतमास्तास्तिस्र इति। सङ्ख्येयविषयोऽयं प्रश्नः, पूर्वस्तु सङ्ख्याविषयः।अपने अभिमुख करनेके लिये अश्वलने 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा कहा। 'कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होतास्मिन् यज्ञे—आज यह होता इस यज्ञमें कितनी ऋचाओं अर्थात् कितनी संख्यावाली ऋग्जातियोंद्वारा शस्त्र-शंसन करेगा?' इसपर इतर (याज्ञवल्क्य) ने कहा, 'तीन ऋग्जातियोंद्वारा।' इस प्रकार कहनेवाले याज्ञवल्क्यसे अश्वलने कहा, 'वे तीन कौन-कौन हैं?' यह प्रश्न जिनकी [तीन—यह] संख्या की गयी है, उन ऋग्जातियोंके विषयमें है तथा इससे पहला प्रश्न उनकी संख्याके विषयमें था।