बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 629, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 629
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६२१
राजा जनकको यह जाननेकी इच्छा हुई कि इन ब्राह्मणोंमें अनुवचन (प्रवचन) करनेमें सबसे बढ़कर कौन है ? इसलिये उसने एक सहस्र गौएँ गोशालामें रोक लीं। उनमेंसे प्रत्येकके सींगोंमें दश-दश पाद सुवर्ण बँधे हुए थे ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| जनको नाम ह किल सम्राड्राजा बभूव विदेहानाम्; तत्र भवो वैदेहः । स च बहुदक्षिणेन यज्ञेन, शाखान्तरप्रसिद्धो वा बहुदक्षिणो नाम यज्ञः, अश्वमेधो वा दक्षिणाबाहुल्याद्बहुदक्षिण इहोच्यते, तेनेजेऽयजत् । | जनक नामका सम्राट् विदेह देशका राजा था, विदेह देशमें उत्पन्न होने और रहनेके कारण उसे वैदेह कहते हैं। उसने एक बहुत दक्षिणावाले यज्ञसे, अथवा शाखान्तरमें प्रसिद्ध बहुदक्षिणनामक यज्ञसे, या अधिक दक्षिणावाला होनेसे यहाँ अश्वमेध ही बहुदक्षिण कहा गया है—उससे, यजन किया । |
| तत्र तस्मिन्यज्ञे निमन्त्रिता दर्शनकामा वा कुरूणां देशानां पञ्चालानां च ब्राह्मणाः, तेषु हि विदुषां बाहुल्यं प्रसिद्धम् अभिसमेता अभिसङ्गता बभूवुः । तत्र महान्तं विद्वत्समुदायं दृष्ट्वा तस्य ह किल जनकस्य वैदेहस्य यजमानस्य, को नु खल्वत्र ब्रह्मिष्ठ इति विशेषेण ज्ञातुमिच्छा विजिज्ञासा बभूव । कथम् ? कः स्विद् को नु खल्वेषां ब्राह्मणानाम् अनूचानतमः ? सर्वे इमेऽनूचानाः, कः स्विदेषामतिशयेनानूचान इति । | वहाँ उस यज्ञमें निमन्त्रित होकर अथवा उसे देखनेकी इच्छासे कुरु और पाञ्चाल देशोंके ब्राह्मण एकत्रित हुए, क्योंकि इन्हीं देशोंमें विद्वानोंकी बहुलता प्रसिद्ध है। वहाँ महान् विद्वत्समुदाय देखकर उस विदेहराज यजमान जनककी विशेषरूपसे यह जाननेकी इच्छा हुई कि इनमें कौन ब्रह्मिष्ठ है। कैसी इच्छा हुई ?—यह कि इन ब्राह्मणोंमें अनुवचन करनेमें सबसे अधिक समर्थ कौन है ? अनुवचन करनेवाले तो ये सभी हैं, किंतु इनमें अतिशय अनूचान ( प्रवचन करनेवाला ) कौन है ? यह उसने जानना चाहा । |