भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 628, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 628
६२०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| नमन्ते प्राणिनः। प्रभूतं हिरण्यं गोसहस्रदानं चेहोपलभ्यते; तस्मादन्यपरेणापि शास्त्रेण विद्याप्राप्त्युपायदानप्रदर्शनार्था आख्यायिका आरब्धा।<br><br>अपि च तद्विद्यसंयोगस्तैश्च सह वादकरणं विद्याप्राप्त्युपायो न्यायविद्यायां दृष्टः; तच्चास्मिन्नध्याये प्राबल्येन प्रदर्श्यते। प्रत्यक्षा च विद्वत्संयोगे प्रज्ञावृद्धिः। तस्माद् विद्याप्राप्त्युपायप्रदर्शनार्थैव आख्यायिका। | प्राणी अपने प्रति विनीत हो जाते हैं। यहाँ बहुत-से सुवर्ण और सहस्र गौओंका दान देखा जाता है; अतः यहाँ शास्त्रका प्रतिपाद्य विषय दूसरा होनेपर भी यह आख्यायिका विद्याप्राप्तिके उपायभूत दानको प्रदर्शित करनेके लिये आरम्भ की गयी है।<br><br>इसके सिवा किसी विद्यामें निष्णात पुरुषोंका संयोग और उनके साथ वाद करना भी न्यायविद्यामें विद्याप्राप्तिका उपाय देखा गया है; और वह वाद इस अध्यायमें बड़ी प्रौढ़िके साथ दिखाया जाता है। विद्वानोंके संयोगसे प्रज्ञाकी वृद्धि होती है—यह तो प्रत्यक्ष ही है। अतः यह आख्यायिका विद्याप्राप्तिका उपाय प्रदर्शित करनेके लिये ही है। |

राजा जनकका सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ताको सहस्र गौएँ दान करनेकी घोषणा करना

ॐ जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे तत्र ह कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता बभूवुस्तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कः स्विदेषां ब्राह्मणानामनूचानतम इति स ह गवाँ॒ सहस्रमवरुरोध दश दश पादा एकैकस्याः शृङ्गयोराबद्धा बभूवुः॥१॥

विदेहदेशमें रहनेवाले राजा जनकने एक बड़ी दक्षिणावाले यज्ञद्वारा यजन किया। उसमें कुरु और पाञ्चाल देशोंके ब्राह्मण एकत्रित हुए। उस

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित) · पृष्ठ 628, कुल 1402 में से · BharatKosha