भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 627, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 627

तृतीय अध्याय

प्रथम ब्राह्मण

याज्ञवल्कीय काण्ड

'जनको ह वैदेहः' इत्यादि याज्ञवल्कीयं काण्डमारभ्यते। उपपत्तिप्रधानत्वादतिक्रान्तेन मधुकाण्डेन समानार्थत्वेऽपि सति न पुनरुक्तता। मधुकाण्डं ह्यागमप्रधानम्। आगमोपपत्ती ह्यात्मैकत्वप्रकाशनाय प्रवृत्ते शक्नुतः करतलगतबिल्वमिव दर्शयितुम्। 'श्रोतव्यो मन्तव्यः' इति ह्युक्तम्। तस्मादागमार्थस्यैव परीक्षापूर्वकं निर्धारणाय याज्ञवल्कीयं काण्डमुपपत्तिप्रधानमारभ्यते। आख्यायिका तु विज्ञानस्तुत्यर्था उपायविधिपरा वा। प्रसिद्धो ह्युपायो विद्वद्भिः शास्त्रेषु च दृष्टः—दानम्। दानेन ह्युप-अब 'जनको ह वैदेहः' इत्यादि याज्ञवल्कीय काण्ड आरम्भ किया जाता है। गत मधुकाण्डसे समानार्थता होनेपर भी यह काण्ड युक्तिप्रधान होनेके कारण इसमें पुनरुक्तिका दोष नहीं है; क्योंकि मधुकाण्ड शास्त्रप्रधान है। जब शास्त्र और युक्ति दोनों ही आत्मैकत्व प्रदर्शित करनेके लिये प्रवृत्त हों तो वे उसका हथेलीपर रखे हुए बिल्वफलके समान साक्षात्कार करा सकते हैं।<br><br>'श्रवण करना चाहिये, मनन करना चाहिये' ऐसा पहले कहा गया है; अतः शास्त्र-तात्पर्यको ही परीक्षापूर्वक निश्चय करनेके लिये यह युक्तिप्रधान याज्ञवल्कीय काण्ड आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है, वह तो विज्ञानकी स्तुतिके लिये और उसके उपायका विधान करनेके लिये है। दान—यह इसका प्रसिद्ध उपाय है और शास्त्रोंमें भी विद्वानोंने इसे ही देखा है, क्योंकि दानसे