बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 644, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 644
| ६३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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ब्रह्मा यज्ञका मन ही है। और यह जो मन है, वही यह चन्द्रमा है, वह ब्रह्मा है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है।' इस प्रकार अतिमोक्षोंका वर्णन हुआ, अब सम्पदोंका निरूपण किया जाता है ॥ ६ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| यदिदं प्रसिद्धमन्तरिक्षमाकाशः अनारम्बणम् अनालम्बनम् इव-शब्दादस्त्येव तत्रालम्बनम्, तत्तु न ज्ञायत इत्यभिप्रायः। यत्तु तदज्ञायमानमालम्बनम्, तत् सर्वनाम्ना केनेति पृच्छ्यते; अन्यथा फलप्राप्तेरसम्भवात्। येनावष्टम्भेनाक्रमेण यजमानः कर्मफलं प्रतिपद्यमानः अतिमुच्यते, किं तदिति प्रश्नविषयः। केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति, स्वर्गं लोकं फलं प्राप्नोत्यतिमुच्यत इत्यर्थः। | यह जो प्रसिद्ध अन्तरिक्ष अर्थात् आकाश है, वह अनारम्बन-अनालम्बन-सा है। 'इव' शब्दसे यह अभिप्राय है कि इसमें आलम्बन तो है किंतु वह जाना नहीं जाता। यहाँ जो ज्ञात न होनेवाला आलम्बन है, वही 'केन' इस सर्वनामद्वारा पूछा जाता है। नहीं तो [ यदि आलम्बनका अभाव माना जायगा तो ] फलप्राप्ति ही सम्भव न होगी। यहाँ प्रश्नका विषय यह है कि जिस आश्रयके द्वारा यजमान कर्मफलको प्राप्त होता हुआ अतिमुक्त होता है, वह क्या है ? तात्पर्य यह है कि यजमान किस आश्रयसे स्वर्गलोकपर आरूढ़ होता है, यानी स्वर्गलोकरूप फलको प्राप्त करता अर्थात् अतिमुक्त हो जाता है। |
| ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चन्द्रेणेत्यक्षरन्यासः पूर्ववत्। तत्राध्यात्मं यज्ञस्य यजमानस्य यदिदं प्रसिद्धं मनः, सोऽसौ चन्द्रोऽधिदैवम्। मनोऽध्यात्मं चन्द्रमा अधिदैवत- | ब्रह्मरूप ऋत्विक्से और मन-रूप चन्द्रमासे-इन अक्षरोंकी योजना पूर्ववत् करनी चाहिये। यहाँ यज्ञ यानी यजमानका जो यह प्रसिद्ध अध्यात्म मन है, वही यह अधिदैव चन्द्रमा है। मन अध्यात्म है और |