बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 645, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 645
ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३५
| संस्कृत शाङ्करभाष्य | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| मिति हि प्रसिद्धम् । स एव चन्द्रमा ब्रह्मर्त्विक् । तेनाधिभूतं ब्रह्मणः परिच्छिन्नं रूपमध्यात्मं च मनस एतद्द्वयमपरिच्छिन्नेन चन्द्रमसो रूपेण पश्यति । तेन चन्द्रमसा मनसावलम्बनेन कर्मफलं स्वर्गं लोकं प्राप्नोत्यतिमुच्यते इत्यभिप्रायः । इतीत्युपसंहारार्थं वचनम् । इत्येवम्प्रकारा मृत्योरतिमोक्षाः । सर्वाणि हि दर्शनप्रकाराणि यज्ञाङ्गविषयाण्यस्मिन्नवसर उक्तानीति कृत्वोपसंहारः । इत्यतिमोक्षाः, एवम्प्रकारा अतिमोक्षा इत्यर्थः । | चन्द्रमा अधिदैवत है—यह प्रसिद्ध ही है। वही चन्द्रमा ब्रह्मा ऋत्विक् है। इसीसे अधिभूत ब्रह्माके और अध्यात्म मनके जो परिच्छिन्नरूप हैं—इन दोनोंको चन्द्रमाके अपरिच्छिन्नरूपसे देखता है। उस चन्द्रमारूप मनको आश्रय मानकर उससे अपने कर्मफलभूत स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है अर्थात् अतिमुक्त हो जाता है—ऐसा इसका अभिप्राय है। 'इत्यतिमोक्षाः' इस वाक्यमें 'इति' पद उपसंहारके लिये कहा गया है। अर्थात् इतने प्रकारके मृत्युसे अतिमोक्ष हैं। इस बीचमें यज्ञाङ्गविषयक सभी दर्शन-प्रकारोंका वर्णन कर दिया गया है—इसलिये यह उपसंहार किया है। 'इत्यतिमोक्षाः' अर्थात् इतने प्रकारके अतिमोक्ष हैं। |
| अथ सम्पदः—अथाधुना सम्पद उच्यन्ते। सम्पन्नाम केनचित्सामान्येनाग्निहोत्रादीनां कर्मणां फलवतां तत्फलाय सम्पादनं सम्पत्फलस्यैव वा। सर्वोत्साहेन फलसाधनानुष्ठाने प्रयतमानानां | 'अथ सम्पदः'—अब सम्पदोंका वर्णन किया जाता है। 'सम्पद्' का तात्पर्य यह है कि किसी भी समानतासे अग्निहोत्रादि फलयुक्त कर्मोंका उस फलके लिये सम्पादन (आरोप) किया जाय, अथवा सम्पद्के फल (देवलोकादि) का ही [उज्ज्वलत्वादि सामान्यके कारण आज्यादि आहुतियोंमें सम्पादन किया जाय]। जो लोग पूर्ण उत्साहसे किसी फलके साधनका अनुष्ठान करनेके |