बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 646, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 646
६३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३
| केनचिद्वैगुण्येनारसम्भवः । तदिदानीमाहिताग्निः सन् यत् किञ्चित् कर्माग्निहोत्रादीनां यथासम्भवमादाय आलम्बनीकृत्य कर्मफलविद्वत्तायां सत्यां यत्कर्मफलकामो भवति, तदेव सम्पादयति । अन्यथा राजसूयाश्वमेधपुरुषमेधसर्वमेधलक्षणानाम् अधिकृतानां त्रैवर्णिकानामप्यसम्भवः—तेषां तत्पाठः स्वाध्यायर्थ एव केवलः स्यात्, यदि तत्फलप्राप्त्युपायः कश्चन न स्यात् । तस्मात्तेषां सम्पदैव तत्फलप्राप्तिः, तस्मात् सम्पदामपि फलवत्त्वम्, अतः सम्पद आरभ्यन्ते ॥ ६ ॥ | लिये प्रयत्न कर रहे हैं, उन्हें किसी भी दोषके कारण उसकी प्राप्ति असम्भव हो जाती है। अतः इस समय [सम्पद्के द्वारा] पुरुष आहिताग्नि होकर अग्निहोत्रादिमेंसे जिसका करना सम्भव हो ऐसे किसी कर्मको लेकर उसीके आश्रयसे, कर्म फलका ज्ञान होनेपर, जिस कर्म-फलकी इच्छा होती है उसीका सम्पादन कर लेता है। नहीं तो राजसूय, अश्वमेध, पुरुषमेध एवं सर्वमेधरूप कर्मोंके अधिकारी त्रैवर्णिकोंको भी उनका फल मिलना असम्भव है। यदि [धनाभावादिके कारण] उन राजसूयादिके फलकी प्राप्तिका कोई उपाय न हो तो उनका वह पाठ केवल स्वाध्यायके लिये ही होगा। अतः उन्हें उनकी सम्पत्तिसे ही उनके फलकी प्राप्ति हो जायगी ।¹ इसलिये सम्पदोंकी भी फलवत्ता है; अतः सम्पदोंका आरम्भ किया जाता है॥ ६ ॥ |
१. भावनाद्वारा किसी अन्य वस्तुका अन्यमें आरोप करना 'सम्पद्' कहलाता है। राजसूयादि कर्म बहुत द्रव्यसाध्य हैं तथा उनमेंसे प्रत्येक कर्मका सभी त्रैवर्णिकोंको अधिकार भी नहीं है। ऐसी अवस्थामें जो धनाभाव या अन्य वर्णमें उत्पन्न होनेके कारण उनमेंसे किसी कर्मको नहीं कर सकते, वे सम्पद्द्वारा उनका फल प्राप्त कर सकते हैं। यदि सम्पत्-कर्म न होता तो उनके लिये उन यज्ञोंका प्रतिपादन करनेवाला शास्त्र केवल स्वाध्यायमें ही उपयोगी हो सकता था; इसलिये सम्पदोंका प्रतिपादन बहुत उपयोगी है।