भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 641, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 641

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३१


| मुक्तिः सोऽध्वर्युरादित्यभावेन दृष्टो मुक्तिः। सैव मुक्तिरेवातिमुक्तिरिति। पूर्ववत् आदित्यात्मभावमापन्नस्य हि नाहोरात्रे सम्भवतः ॥ ४ ॥ | है। आदित्यभावसे देखा हुआ वह अध्वर्यु मुक्ति ही है। पूर्ववत् वह मुक्ति ही अतिमुक्ति है, क्योंकि आदित्यभावको प्राप्त हुए पुरुषके लिये दिन-रात होने सम्भव नहीं हैं ॥ ४ ॥ |


तिथ्यादिरूप कालसे अतिमुक्तिका साधन

| इदानीं तिथ्यादिलक्षणादतिमुक्तिरुच्यते— | अब तिथ्यादिरूप कालसे अतिमुक्ति बतलायी जाती है— |

याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदꣳ सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामाप्तꣳ सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामभिपन्नं केन यजमानः पूर्वपक्षापरपक्षयोराप्तिमतिमुच्यत इत्युद्गात्रर्त्विजा वायुना प्राणेन प्राणो वै यज्ञस्योद्गाता तद्योऽयं प्राणः स वायुः स उद्गाता स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥५॥

'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो कुछ है, सब पूर्वपक्ष और अपरपक्षसे व्याप्त है; सब पूर्वपक्ष और अपरपक्षद्वारा वशमें किया हुआ है। किस उपायसे यजमान पूर्वपक्ष और अपरपक्षकी व्याप्तिसे पार होकर मुक्त होता है?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा— ] 'उद्गाता ऋत्विक्से और वायुरूप प्राणसे; क्योंकि उद्गाता यज्ञका प्राण ही है। तथा यह जो प्राण है, वही वायु है, वही उद्गाता है, वही मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है ॥ ५ ॥

| यदिदं सर्वम्—अहोरात्रयोरविशिष्टयोरादित्यः कर्ता, न प्रतिपदादीनां तिथीनाम्; तासां तु वृद्धिक्षयोपगमनेन प्रतिपत्प्रभृतीनां | यदिदं सर्वम्—ये जो अविशिष्ट (वृद्धिक्षयशून्य) दिन-रात हैं, इन सबका कर्ता आदित्य है किंतु वह प्रतिपदादि तिथियोंका कर्ता नहीं है; उन प्रतिपदादिके तो वृद्धि और क्षय देखे जाते हैं, अतः उनका कर्ता तो |