भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 642, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 642
६३२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| चन्द्रमाः कर्ता। अतस्तदापत्त्या पूर्वपक्षापरपक्षात्ययः, आदित्यापत्त्या अहोरात्रात्ययवत्। | चन्द्रमा है। अतः आदित्यभावकी प्राप्तिसे जैसे अहोरात्रका अतिक्रमण होता है, उसी प्रकार चन्द्रभावकी प्राप्तिसे पूर्वपक्ष और अपरपक्षका अतिक्रमण किया जा सकता है। | | तत्र यजमानस्य प्राणो वायुः, स एवोद्गाता—इत्युद्गीथब्राह्मणेऽवगतम् 'वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायत्' इति च निर्धारितम्। 'अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतीरूपमसौ चन्द्रः' इति च। | वहाँ (काण्वशाखाकी श्रुतिमें) यजमानका प्राण वायु है। वही उद्गाता है—यह बात उद्गीथब्राह्मणमें जानी गयी थी और यह निश्चय किया गया था कि उसने वाक्से और प्राणसे उद्गान किया इस प्राणका जल शरीर है और यह चन्द्र ज्योतीरूप है। | | प्राणवायुचन्द्रमसामेकत्वाच्चन्द्रमसा वायुना चोपसंहारे न कश्चिद्विशेषः। एवं मन्यमाना श्रुतिर्वायुनाऽधिदैवतरूपेणोपसंहरति। | वायु, प्राण और चन्द्रमाकी एकता होनेके कारण यदि [ उद्गीथब्राह्मणोक्त और उपर्युक्त श्रुतियोंका ] चन्द्रमा और वायुरूपसे [ अलग-अलग ] उपसंहार किया गया है तो उसमें कोई अन्तर नहीं है। ऐसा मानकर ही श्रुति इस मन्त्रका अधिदैव वायुरूपसे उपसंहार करती है। | | अपि च वायुनिमित्तौ हि वृद्धिक्षयौ चन्द्रमसः। तेन तिथ्यादिलक्षणस्य कालस्य कर्तुरपि कारयिता वायुः। अतो वायुरूपापन्नस्तिथ्यादिकालादतीतो भवतीत्युपपन्नतरं भवति। तेन | इसके सिवा चन्द्रमाके वृद्धि और क्षय भी वायुके ही कारण हैं। अतः वायु तिथ्यादिरूप कालके कर्ता ( चन्द्रमा ) का भी करानेवाला है। इसलिये वायुरूपको प्राप्त हुआ पुरुष तिथ्यादिरूप कालसे पार हो जाता है—यह कथन और भी युक्तियुक्त है। अतः अन्य श्रुति (माध्यन्दिनीय |