बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 640, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें६३० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ३]
| कालः, तस्मात् कालात् पृथगतिमुक्तिर्वक्तव्येतीदमारभ्यते, क्रियानुष्ठानव्यतिरेकेणापि प्रागूर्ध्वं च क्रियायाः साधनविपरिणामहेतुत्वेन व्यापारदर्शनात् कालस्य । तस्मात् पृथक्कालादतिमुक्तिर्वक्तव्येत्यत आह—<br><br>यदिदं सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तम्, स च कालो द्विरूपः—अहोरात्रादिलक्षणः, तिथ्यादिलक्षणश्च । तत्राऽहोरात्रादिलक्षणात्तावदतिमुक्तिमाह—अहोरात्राभ्यां हि सर्वं जायते वर्धते विनश्यति च, तथा यज्ञसाधनं च ।<br><br>यज्ञस्य यजमानस्य चक्षुरध्वर्युश्च । शिष्टान्यक्षराणि पूर्ववन्नेयानि । यजमानस्य चक्षुरध्वर्युश्च साधनद्वयमध्यात्मधिभूतपरिच्छेदं हित्वाऽधिदैवतात्मना दृष्टं यत् स | है, उस कालसे पृथक् जो अतिमुक्ति है [ अर्थात् जो उस कालसे मुक्त होनेका साधन है ] उसका वर्णन करना है, इसलिये यह आरम्भ किया जाता है, क्योंकि क्रियाके अनुष्ठानके बिना भी क्रियाके पूर्व और पश्चात् उसके साधनोंके विपरिणामके हेतुरूपसे कालका व्यापार देखा जाता है। अतः कालसे पृथक् अतिमुक्तिका वर्णन करना आवश्यक है, इसलिये श्रुति कहती है—<br><br>यह जो कुछ है सब दिन और रात्रिसे व्याप्त है, वह काल दो प्रकारका है—दिन-रात्रिरूप और तिथ्यादिरूप । उनमेंसे पहले अहोरात्रादिरूप कालसे अतिमुक्ति बतलायी जाती है—दिन-रातसे ही सब उत्पन्न होता, बढ़ता और नाशको प्राप्त होता है। इसी प्रकार यज्ञके साधन भी उन्हींसे उत्पन्न होते, बढ़ते और नष्ट होते हैं ।<br><br>यज्ञ यानी यजमानके नेत्र और अध्वर्यु—शेष अक्षरोंको पूर्ववत् लगाना चाहिये। अर्थात् यजमानके नेत्र और अध्वर्यु ये दोनों साधन अपने अध्यात्म और अधिभूत परिच्छेदको त्यागकर जब अधिदैवरूपसे देखे जाते हैं तो वही इनकी मुक्ति |