बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 639, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२९
| विशेषो वर्ण्यते । मृत्युप्राप्त्यतिमुक्तिस्तु सैव फलभूता, योद्गीथब्राह्मणेन व्याख्याता — 'मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते' ( १ । ३ । १२ ) इत्याद्या ॥ ३ ॥ | गया है। किंतु उसकी फलभूता जो मृत्युप्राप्तिसे अतिमुक्ति है, वह तो वही है, जिसकी उद्गीथब्राह्मणद्वारा 'मृत्युको पार करके दीप्त होता है' इस प्रकारसे व्याख्या की गयी है ॥ ३ ॥ |
अहोरात्रादिरूप कालसे अतिमुक्तिका साधन
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदꣳ सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तꣳ सर्वमहोरात्राभ्यामभिपन्नं केन यजमानोऽहोरात्रयोराप्तिमतिमुच्यत इत्यध्वर्युणर्त्विजा चक्षुषादित्येन चक्षुर्वै यज्ञस्याध्वर्युस्तद्यदिदं चक्षुः सोऽसावादित्यः सोऽध्वर्युः स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥ ४ ॥
'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो कुछ है, सब दिन और रात्रिसे व्याप्त है, सब दिन और रात्रिके अधीन है। तब किस साधनके द्वारा यजमान दिन और रात्रिकी व्याप्तिका अतिक्रमण कर सकता है? [ इसपर याज्ञवल्क्य बोला— ] 'अध्वर्यु-ऋत्विक और चक्षुरूप आदित्यके द्वारा। अध्वर्यु यज्ञका चक्षु ही है। अतः यह जो चक्षु है, वह यह आदित्य है और वह अध्वर्यु है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है ॥ ४ ॥
| याज्ञवल्क्येति होवाच । स्वाभाविकादज्ञानासङ्गप्रयुक्तात् कर्मलक्षणान्मृत्योरतिमुक्तिर्व्याख्याता। तस्य कर्मणः सासङ्गस्य मृत्योराश्रयभूतानां दर्शपूर्णमासादिकर्मसाधनानां यो विपरिणामहेतुः | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा। स्वाभाविक अज्ञानजनित आसक्तिसे होनेवाले कर्मरूप मृत्युसे अतिमुक्तिकी व्याख्या कर दी गयी जो उस आसक्तियुक्त कर्मरूप मृत्युके आश्रयभूत दर्श और पूर्णमासादि कर्मके साधनोंके विपरिणामका हेतुभूतकाल |