भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 638, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 638
६२८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| कादासङ्गान्मृत्योर्विमुच्यते आध्यात्मिकात् परिच्छिन्नरूपादाधिभौतिकाच्च। तस्मात् स होता अग्निरूपेण दृष्टो मुक्तिर्मुक्तिसाधनं यजमानस्य। सा अतिमुक्तिः—यैव च मुक्तिः साऽतिमुक्तिः, अतिमुक्तिसाधनमित्यर्थः। साधनद्वयस्य परिच्छिन्नस्य या अधिदेवतारूपेणापरिच्छिन्नेनाग्निरूपेण दृष्टिः, सा मुक्तिः। यासौ मुक्तिरधिदेवतादृष्टिः सैव, अध्यात्माधिभूतपरिच्छेदविषयासङ्गास्पदं मृत्युमतिक्रम्य अधिदेवतात्वस्याग्निभावस्य प्राप्तिर्या फलभूता, सा अतिमुक्तिरित्युच्यते। तस्या अतिमुक्तेर्मुक्तिरेव साधनमिति कृत्वा सा अतिमुक्तिरित्याह। <br><br> यजमानस्य ह्यतिमुक्तिर्वागादीनामग्न्यादिभाव इत्युद्गीथप्रकरणे व्याख्यातम्। तत्र सामान्येन मुख्यप्राणदर्शनमात्रं मुक्तिसाधनमुक्तम्, न तद्विशेषः। वागादीनाम् अग्न्यादिदर्शनमिह | आसक्तिरूप मृत्युसे अर्थात् आध्यात्मिक और आधिभौतिक परिच्छिन्नरूपसे मुक्त हो जाता है। अतः अग्निरूपसे देखा गया वह होता मुक्ति यानी यजमानकी मुक्तिका साधन है। वह अतिमुक्ति है—जो ही मुक्ति है, वही अतिमुक्ति अर्थात् अतिमुक्तिका साधन है। इन दोनों परिच्छिन्न साधनोंकी जो अधिदैवरूप अपरिच्छिन्न अग्निरूपसे दृष्टि है, वही मुक्ति है। यह जो अधिदेवता-दृष्टिरूप मुक्ति है, वही अर्थात् अध्यात्म और अधिभूत परिच्छेदविषयक आसक्तिके स्थानभूत मृत्युको पार करके जो फलभूता अधिदैवत्व यानी अग्निभावकी प्राप्ति है, वही अतिमुक्ति कही जाती है। उस अतिमुक्तिका साधन मुक्ति ही है, इसलिये वह अतिमुक्ति है—ऐसा कहा गया है। <br><br> वागादिका अग्न्यादिभाव यजमानकी अतिमुक्ति है—इसकी व्याख्या उद्गीथप्रकरणमें की जा चुकी है। वहाँ मुख्य प्राणदर्शनमात्रको ही सामान्यरूपसे मुक्तिका साधन बतलाया है, उसका विशेष वर्णन नहीं किया। यहाँ वागादिमें अग्न्यादिदृष्टि करना यह विशेष बतलाया |