बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 637, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 637
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२७
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| इति श्रुतेः। यज्ञस्य यजमानस्य या वाक् सैव होताधियज्ञे। कथम् ? तत्तत्र येयं वाग् यज्ञस्य यजमानस्य सोऽयं प्रसिद्धोऽग्निरधिदैवतम्। तदेतत् त्र्यन्नप्रकरणे व्याख्यातम्। स चाग्निर्होता "अग्निर्वै होता" इति श्रुतेः। | अनुसार यजमानका होता है। [ तात्पर्य यह है कि ] जो वाणी है, वही अधियज्ञमें यज्ञ यानी यजमानका होता है। किस प्रकार ? इस प्रकार कि यहाँ जो यह यज्ञ यानी यजमानकी वाणी है, वही प्रसिद्ध अधिदैव अग्नि है। उस इस अग्निकी त्र्यन्न प्रकरणमें व्याख्या की गयी है। तथा "अग्नि ही होता है" इस श्रुतिके अनुसार वह अग्नि ही होता है। |
| यदेतद् यज्ञस्य साधनद्वयम्—होता चर्त्विग् अधियज्ञम्, अध्यात्मं च वाक्, एतदुभयं साधनद्वयं परिच्छिन्नं मृत्युना आप्तं स्वाभाविकाज्ञानासङ्गप्रयुक्तेन कर्मणा मृत्युना प्रतिक्षणमन्यथात्वमापद्यमानं वशीकृतम्। तद् अनेनाधिदैवतरूपेणाग्निना दृश्यमानं यजमानस्य यज्ञस्य मृत्योरतिमुक्तये भवति। तदेतदाह—स मुक्तिः स होता अग्निर्मुक्तिः, अग्निस্বরূপदर्शनमेव मुक्तिः। | इस प्रकार यज्ञके जो ये दो साधन अधियज्ञ होता ऋत्विक् और अध्यात्म वाक् हैं; ये दोनों साधन परिच्छिन्न और मृत्युसे व्याप्त हैं तथा स्वाभाविक अज्ञान और आसक्तिप्रयुक्त कर्मरूप मृत्युसे प्रतिक्षण अन्यथात्वको प्राप्त हो रहे हैं और उसके द्वारा वशमें किये गये हैं। वे इस अधिदैवतरूप अग्निके द्वारा देखे जानेपर यजमानके यज्ञके मृत्युके अतिक्रमणके लिये होते हैं। इसीसे यह कहा है—वह मुक्ति है, वह होतारूप अग्नि मुक्ति है अर्थात् होताको अग्निरूप देखना ही उसकी मुक्ति है। |
| यदैव साधनद्वयमग्निरूपेण पश्यति, तदानीमेव हि स्वाभावि- | जिस समय भी यजमान इन दोनों साधनोंको अग्निरूपसे देखता है, उसी समय वह स्वाभाविक |