भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 636, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 636
६२६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३]
संस्कृतहिन्दी
यद्यिदं साधनजातम् अस्य कर्मण ऋत्विगग्नयादि मृत्युना कर्मलक्षणेन स्वाभाविकासङ्गसहितेन आप्तं व्याप्तम्, न केवलं व्याप्तमभिपन्नं च मृत्युना वशीकृतं च। केन दर्शनलक्षणेन साधनेन यजमानो मृत्योराप्तिमति मृत्युगोचरत्वम् अतिक्रम्य मुच्यते स्वतन्त्रो मृत्योरवशो भवतीत्यर्थः।इस कर्मका जो यह ऋत्विक् और अग्नि आदि साधनसमूह है, वह स्वाभाविक आसक्तिसहित कर्मरूप मृत्युसे व्याप्त है। केवल व्याप्त ही नहीं है, अपितु अभिपन्न अर्थात् मृत्युद्वारा वशमें किया हुआ है। सो किस दर्शनरूप साधनसे यजमान मृत्युकी प्राप्तिको पार कर अर्थात् मृत्युकी विषयताका अतिक्रमण कर मुक्त यानी स्वतन्त्र हो जाता है अर्थात् मृत्युके वशीभूत नहीं रहता।
ननूद्गीथ एवाभिहितं येनातिमुच्यते मुख्यप्राणात्मदर्शनेनेति।आक्षेप—किंतु जिस मुख्य प्राणात्मदर्शनसे वह मुक्त होता है, उसका वर्णन तो उद्गीथप्रकरणमें ही कर दिया है।
बाढमुक्तम्, योऽनुक्तो विशेषस्तत्र, तदर्थोऽयमारम्भ इत्यदोषः।समाधान—ठीक है, वहाँ वर्णन तो किया है; किंतु वहाँ जिस विशेषका उल्लेख नहीं किया, उसके लिये यह ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है; इसलिये इसमें कोई दोष नहीं है।
होत्रर्त्विजाग्निना वाचेत्याह याज्ञवल्क्यः। एतस्यार्थं व्याचष्टे।याज्ञवल्क्यने कहा, 'होता ऋत्विक्-रूप अग्निसे और वाक्‌से उसका अतिक्रमण किया जा सकता है।' श्रुति इस वाक्यका अर्थ करती है।
कः पुनर्होता येन मृत्युमतिक्रामति? इत्युच्यते—वाग्वै यज्ञस्य यजमानस्य "यज्ञो वै यजमानः"भला, जिसके द्वारा यजमान मृत्युको पार करता है वह 'होता' कौन है? यह बताया जाता है—वाक् ही यज्ञका अर्थात् "यज्ञ ही यजमान है" इस श्रुतिके