बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३१
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३१
| सा एवमुक्ता उवाच मैत्रेयी— सर्व्वेयं पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्, नु किं स्याम्, किमहं वित्तसाध्येन कर्मणा अमृता, आहो न स्यामिति । नेति होवाच याज्ञवल्क्य इत्यादि समानमन्यत् ॥ | इस प्रकार कहे जानेपर उस मैत्रेयीने कहा, 'यदि यह सारी पृथिवी धनसे पूर्ण हो जाय तो क्या उस धनसाध्य कर्मसे मैं अमर हो जाऊँगी अथवा नहीं ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'नहीं' इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३-४ ॥ |
याज्ञवल्क्यजीका सान्त्वनापूर्वक समाधान
स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वै खलु नो भवती सती प्रियमवृधद्धन्त तर्हि भवत्येतद् व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ५ ॥
उन याज्ञवल्क्यजीने कहा, 'निश्चय ही तू पहले भी हमारी प्रिया रही है और इस समय भी तूने हमारे प्रिय (प्रसन्नता) को बढ़ाया है। अतः हे देवि ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तेरे प्रति इस ( अमृतत्वके साधन ) की व्याख्या करूँगा। तू मेरे व्याख्या किये हुए विषयका चिन्तन करना' ॥ ५ ॥
| स ह उवाच—प्रियैव पूर्वं खलु नः—अस्मभ्यं भवती, भवन्ती सती, प्रियमेव अवृधद् वर्धितवती निर्धारितवती असि; अतस्तुष्टोऽहम्, हन्त इच्छसि चेदमृतत्वसाधनं ज्ञातुम्, हे भवति, ते तुभ्यं तदमृतत्वसाधनं व्याख्यास्यामि ॥ ५ ॥ | उन्होंने कहा, तू निश्चय ही पहले भी हमारी प्रिया रही है, अब भी तूने हमारे प्रियकी ही वृद्धि की है, प्रसन्नताको ही बढ़ाया है—संतोषजनक निश्चय किया है, इसलिये मैं तुझपर प्रसन्न हूँ। अब यदि तू अमृतत्वका साधन जानना चाहती है तो हे भवति--हे देवि ! मैं तेरे प्रति उस अमृतत्वके साधनकी व्याख्या करूँगा ॥ ५ ॥ |
११३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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प्रियतम आत्माके लिये ही सब वस्तुएँ प्रिय होती हैं
स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति। न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । न वा अरे पशूनां कामाय पशवः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पशवः प्रिया भवन्ति । न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति । न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति। न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे वेदानां कामाय वेदाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदाः प्रिया भवन्ति । न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदँ सर्वं विदितम् ॥ ६ ॥
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३३
उन्होंने कहा—'अरी मैत्रेयि ! यह निश्चय है कि पतिके प्रयोजनके लिये पति प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये पति प्रिय होता है; स्त्रीके प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया नहीं होती, अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया होती है; पुत्रोंके प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय होते हैं; धनके प्रयोजनके लिये धन प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये धन प्रिय होता है; पशुओंके प्रयोजनके लिये पशु प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये पशु प्रिय होते हैं, ब्राह्मणके प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय होता है; क्षत्रियके प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय होता है; लोकोंके प्रयोजनके लिये लोक प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये लोक प्रिय होते है; देवोंके प्रयोजनके लिये देव प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये देव प्रिय होते हैं; वेदोंके प्रयोजनके लिये वेद प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये वेद प्रिय होते हैं; भूतोंके प्रयोजनके लिये भूत प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये भूत प्रिय होते हैं; सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं, अतः अरी मैत्रेयि ! आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और निदिध्यासन ( ध्यान ) करनेयोग्य है । हे मैत्रेयि ! निश्चय ही आत्माका दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान हो जानेपर इन सबका ज्ञान हो जाता है' ॥ ६ ॥
| आत्मनि खलु अरे मैत्रेयि दृष्टे; कथं दृष्ट आत्मनि ? इत्युच्यते—पूर्वमाचार्य्यागमाभ्यां श्रुते, पुनः तर्केणोपपत्त्या मते विचारिते, श्रवणं त्वागममात्रेण, मते उपपत्त्या, पश्चाद् | 'हे मैत्रेयि ! निश्चय ही आत्माका दर्शन हो जानेपर; किस प्रकार आत्माका दर्शन हो जानेपर, सो कहा जाता है—पहले आचार्य और शास्त्रद्वारा श्रवण और फिर तर्क एवं युक्तिसे मनन और विचार करनेपर; शास्त्रमात्रसे तो श्रवण, युक्तिसे मनन और पीछे विशेषरूपसे जान लेनेपर |
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११३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| विज्ञाते—एवमेतन्नान्यथेति<br><br>निर्धारिते; किं भवति ? इत्यु-<br><br>च्यते—इदं विदितं भवति; इदं<br><br>सर्वमिति यदात्मनोऽन्यत्,<br><br>आत्मव्यतिरेकेणाभावात् ॥६॥ | अर्थात् यह ऐसा ही है, अन्य प्रकारका नहीं है—ऐसा निश्चय कर लेनेपर क्या होता है ? सो बतलाया जाता है—यह ज्ञात हो जाता है अर्थात् यह सब जो कि आत्मासे भिन्न है, जान लिया जाता है; क्योंकि आत्मासे भिन्न कुछ है ही नहीं ॥ ६ ॥ |
भेददृष्टिसे हानि दिखाकर ‘सब कुछ आत्मा ही है’ इस तत्त्वका उपदेश—
ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानीदँ सर्वं यदयमात्मा ॥ ७ ॥
ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है, जो ब्राह्मणजातिको आत्मासे भिन्न समझता है। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है, जो क्षत्रियजातिको आत्मासे भिन्न जानता है। लोक उसे परास्त कर देते हैं, जो लोकोंको आत्मासे भिन्न जानता है। देवता उसे परास्त कर देते हैं, जो देवताओंको आत्मासे भिन्न समझता है। वेद उसे परास्त कर देते हैं, जो वेदोंको आत्मासे भिन्न जानता है। भूत उसे परास्त कर देते हैं, जो भूतोंको आत्मासे भिन्न समझते हैं। सब उसे परास्त कर देते हैं, जो सबको आत्मासे भिन्न जानता है। यह ब्राह्मणजाति, यह क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देव, ये वेद, ये भूत और ये सब जो कुछ भी हैं, यह सब आत्मा ही है ॥ ७ ॥
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३५
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३५
| तमयथार्थदर्शिनं परादात् पराकुर्यात्, कैवल्यासम्बन्धिनं कुर्यात्—अय्यमनात्मस्वरूपेण मां पश्यतीत्यपराधादिति भावः ।७। | तात्पर्य यह हे कि उस अनात्मदर्शीको 'यह मुझे आत्मासे भिन्नरूपमें देखता है' इस अपराधसे परादात्—पराकृत—परास्त अर्थात् कैवल्यसे सम्बन्धरहित कर देते हैं ॥ ७ ॥ |
सबको 'आत्मा' रूपसे ग्रहण करनेमें दृष्टान्त—
स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥
वह दृष्टान्त ऐसा है कि जिसपर लकड़ी आदिसे आघात किया जाता है, उस दुन्दुभि (नक्कारे) के बाह्य शब्दोंको जिस प्रकार कोई ग्रहण नहीं कर सकता, किंतु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको ग्रहण करनेसे उसका शब्द भी गृहीत हो जाता है ॥ ८ ॥
स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य॑ न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद् ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥
वह [दूसरा] दृष्टान्त ऐसा है कि जैसे मुँहसे फूँके जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें कोई समर्थ नहीं होता, किंतु शङ्ख या शङ्खके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ ९ ॥
स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ १० ॥
११३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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वह [ तीसरा ] दृष्टान्त ऐसा है कि जैसे बजायी जाती हुई वीणाके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें कोई समर्थ नहीं होता, किंतु वीणा या वीणाके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥१०॥
स यथाऽऽर्दैंधाग्नेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्ट ँ हुतमाशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निश्वसितानि ॥११॥ स यथा सर्वासामपा ँ समुद्र एकायनमेव ँ सर्वेषा ँ स्पर्शानां त्वगेकायनमेव ँ सर्वेषां गन्धानां नासिके एकायनमेव ँ सर्वेषा ँ रसानां जिह्वैकायनमेव ँ सर्वेषा ँ रूपाणां चक्षुरेकायनमेव ँ सर्वेषा ँ शब्दाना ँ श्रोत्रमेकायनमेव ँ सर्वेषा ँ संकल्पानां मन एकायनमेव ँ सर्वासां विद्याना ँ हृदयमेकायनमेव ँ सर्वेषां कर्मणा ँ हस्तावेकायनमेव ँ सर्वेषामा- नन्दानामुपस्थ एकायनमेव ँ सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेव ँ सर्वेषामध्वनां पादावेकायनमेव ँ सर्वेषां वेदानां वागेकायनम् ॥ १२ ॥
वह [ चौथा ] दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार जिसका ईंधन गीला है, ऐसे आधान किये हुए अग्निसे पृथक् धूएँ निकलते हैं, उसी प्रकार हे मैत्रेयि ! ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक (ब्राह्मण-मन्त्र), सूत्र (वैदिक वस्तुसंग्रहवाक्य), सूत्रोंकी
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११३७ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११३७ |
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व्याख्या, मन्त्रोंकी व्याख्या, इष्ट (यज्ञ), हुत (हवन किया हुआ), आशित (खिलाया हुआ), पायित (पिलाया हुआ) यह लोक, परलोक और सम्पूर्ण भूत हैं, सब इसीके निःश्वास हैं ॥ ११ ॥ वह [पाँचवाँ] दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार समस्त जलोंका समुद्र एक अयन [प्रलयस्थान] है, इसी प्रकार समस्त स्पर्शोंका त्वचा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त गन्धोंका दोनों नासिकाएँ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रसोंका जिह्वा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रूपोंका चक्षु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त शब्दोंका श्रोत्र एक अयन है, इसी प्रकार समस्त संकल्पोंका मन एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विद्याओंका हृदय एक अयन है, इसी प्रकार समस्त कर्मोंका दोनों हाथ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त आनन्दोंका उपस्थ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विसर्गोंका पायु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त मार्गोंका दोनों चरण एक अयन है और इसी प्रकार समस्त वेदोंका वाक् एक अयन है ॥ १२ ॥
| चतुर्थे शब्दनिश्र्वासेनैव लोकाद्यर्थनिश्र्वासः सामर्थ्यादुक्तो भवतीति पृथङ् नोक्तः । इह तु सर्वशास्त्रार्थोपसंहार इति कृत्वा- र्थप्राप्तोऽप्यर्थः स्पष्टीकर्तव्य इति पृथगुच्यते ॥ ११-१२ ॥ | चतुर्थ प्रपाठक [अर्थात् द्वितीय 'अध्याय] में शब्द-निःश्वासके द्वारा ही सामर्थ्यसे लोकादि अर्थनिःश्वास भी कह दिये गये—ऐसा विचार कर उन्हें अलग नहीं कहा। किंतु यहाँ तो सारे शास्त्रका उपसंहार करना है, इसलिये अर्थतः प्राप्त विषयको भी स्पष्ट कर देना चाहिये, इसीलिये उन्हें अलग कहा गया है ॥ ११-१२ ॥ |
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१. द्वितीय अध्यायके चतुर्थ ब्राह्मणका दसवाँ मन्त्र भी इसी प्रकार है, परंतु वहाँ 'व्याख्यानानि' तक कहा है। ये सब शब्दमय निःश्वास हैं। यहाँ 'इष्टं हुतं...सर्वाणि च भूतानि' इतना पाठ अधिक है। ये सब अर्थरूप निःश्वास हैं। अतः वहाँ शब्दनिश्र्वासोंसे ही अर्थनिःश्वासोंका भी उपलक्षण समझना चाहिये।
बृ० उ० ७२—
११३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| ११३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १३ ॥
उसमें [ छठा ] दृष्टान्त इस प्रकार है—जिस प्रकार नमकका डला अन्तर और बाह्यसे रहित सम्पूर्ण रसघन ही है, हे मैत्रेयि ! उसी प्रकार यह आत्मा अन्तर-बाह्य-भेदसे शून्य सम्पूर्ण प्रज्ञानघन ही है । यह इन भूतोंसे [ विशेषरूपसे ] उत्थित होकर उन्हींके साथ नष्ट हो जाता है । इस प्रकार मर जानेपर इसकी संज्ञा नहीं रहती । हे मैत्रेयि ! इस प्रकार मैं कहता हूँ—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ॥ १३ ॥
| सर्वकार्यप्रलयेऽविद्यानिमित्ते सैन्धवघनवदनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एक आत्मावतिष्ठते पूर्वं तु भूतमात्रासंसर्गविशेषाल्लब्धविशेषविज्ञानः सन्, तस्मिन् प्रविलापिते विद्यया विशेषविज्ञाने तन्निमित्ते च भूतसंसर्गे न प्रेत्य संज्ञा अस्ति—इत्येवं याज्ञवल्क्येनोक्ता ॥ १३ ॥ | अविद्याजनित सम्पूर्ण कार्यका सर्वथा लय हो जानेपर लवणखण्डके समान अन्तर और बाह्यसे रहित परिपूर्ण, प्रज्ञानघन एक आत्मा ही स्थित रहता है । पहले तो वह भूतमात्राके संसर्गविशेषसे विशेष विज्ञानको प्राप्त रहता है, फिर विद्याके द्वारा उस विशेष विज्ञान और उससे होनेवाले भूतमात्रके संसर्गके सर्वथा लीन कर दिये जानेपर मरणके पश्चात् उसकी संज्ञा नहीं रहती—ऐसा याज्ञवल्क्यने मैत्रेयीके प्रति कहा ॥ १३ ॥ |
निर्विशेष आत्माके विषयमें मैत्रेयीकी शङ्का और याज्ञवल्क्यका समाधान
सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान् मोहान्तमापीपिपन्न वा अहममं विजानामीति स होवाच न वा
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११३९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११३९
अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा ॥ १४ ॥
वह मैत्रेयी बोली, 'यहीं श्रीमान्ने मुझे मोहको प्राप्त करा दिया है। मैं इसे विशेषरूपसे नहीं समझती।' उन्होंने कहा, 'अरी मैत्रेयी! मैं मोहकी बात नहीं कह रहा हूँ। अरी! यह आत्मा निश्चय ही अविनाशी और अनुच्छेदरूप धर्मवाला है' ॥ १४ ॥
| सा होवाचात्रैव मा भगवान् तस्मिन्नेव वस्तुनि प्रज्ञानघन एव न प्रेत्य संज्ञा अस्ति, इति मोहान्तं मोहमध्यमापीपिपत्—आपीपदद् अवगमितवानसि संमोहितवानसीत्यर्थः। अतो न वा अहमिममात्मानमुक्तलक्षणं विजानामि विवेकत इति ।<br><br>स होवाच नाहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मा। यतो विनष्टुं शीलमस्येति विनाशी न विनाश्यविनाशी, विनाशशब्देन विक्रिया, अविनाशीत्यविक्रिय आत्मेत्यर्थः। अरे मैत्रेय्ययमात्मा प्रकृतोऽनुच्छित्तिधर्मा—उच्छित्तिरुच्छेदः, उच्छेदोऽन्तो विनाशः, उच्छित्तिधर्मोऽस्येत्यु- | वह बोली—यहीं इस प्रज्ञानघनके विषयमें ही, 'मरनेपर इसकी संज्ञा नहीं रहती' ऐसा कहकर श्रीमान्ने मुझे मोहमें—मोहके बीचमें 'आपीपिपत्' प्राप्त करा दिया है, अर्थात् मुझे संमोहित कर दिया है। अतः इस उपर्युक्त लक्षणवाले आत्माको मैं विवेकपूर्वक नहीं समझती।<br><br>उन्होंने कहा—मैं मोहकी बात नहीं कहता, क्योंकि हे मैत्रेयि! यह आत्मा अविनाशी है। जिसका विनष्ट होनेका स्वभाव हो उसे विनाशी कहते हैं, जो विनाशी न हो वह अविनाशी कहलाता है, विनाश शब्दसे विकार सूचित होता है, अतः आत्मा अविनाशी अर्थात् अविकारी है। अरी मैत्रेयि! यह आत्मा, जिसका प्रकरण है, अनुच्छित्तिधर्मा है—उच्छित्ति उच्छेदको कहते हैं, उच्छेद—अन्त अर्थात् विनाश, उच्छित्ति जिसका धर्म हो उसे |
११४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| च्छित्तिधर्मा, नोच्छित्तिधर्मा अनुच्छित्तिधर्मा। नापि विक्रियालक्षणो नाप्युच्छेदलक्षणो विनाशोऽस्य विद्यत इत्यर्थः ॥ १४ ॥ | उच्छित्तिधर्मा कहते हैं, जो उच्छित्तिधर्मा नहीं है वही अनुच्छित्तिधर्मा कहा गया है। तात्पर्य यह है कि इसका न तो विकाररूप विनाश होता है और न उच्छेद रूप ही ॥ १४ ॥ |
उपदेशका उपसंहार और याज्ञवल्क्यका संन्यास
| चतुर्ष्वपि प्रपाठकेष्वेक आत्मा तुल्यो निर्धारितः, परं ब्रह्म। उपायविशेषस्तु तस्याधिगमेऽन्यश्चान्यश्च, उपेयस्तु स एवात्मा यश्चतुर्थे 'अथात आदेशो नेति नेति' इति निर्दिष्टः। स एव पञ्चमे प्राणपणोपन्यासेन शाकल्ययाज्ञवल्क्यसंवादे निर्धारितः, पुनः पञ्चमसमाप्तौ, पुनर्जनकयाज्ञवल्क्यसंवादे, पुनरिहोपनिषत्समाप्तौ। चतुर्णामपि प्रपाठकानामेतदात्मनिष्ठता, नान्योऽन्तराले कश्चिदपि विवक्षितोऽर्थः—इत्येतत्प्रदर्शनायान्त उपसंहारः— स एष नेति नेत्यादिः। | चारों ही प्रपाठकोंमें एक ही समान आत्माका निश्चय किया गया है; वह परब्रह्म है। किंतु उसके बोधके लिये उपायविशेष भिन्न-भिन्न है, उपेय तो वह आत्मा ही है, जिसका चतुर्थ प्रपाठक [अर्थात् द्वितीय अध्याय] में 'अथात आदेशो नेति नेति' इस प्रकार निर्देश किया है। उसीका पञ्चम प्रपाठक (तृतीय अध्याय) में प्राणरूप पणके उल्लेखद्वारा शाकल्य-याज्ञवल्क्यसंवादमें निश्चय किया गया है; फिर पञ्चम प्रपाठककी समाप्तिमें, तत्पश्चात् जनक-याज्ञवल्क्य-संवादमें और फिर यहाँ उपनिषद्की समाप्तिमें भी उसीका निर्णय किया गया है। इन चारों ही प्रपाठकोंका तात्पर्य इस आत्मामें ही है; इनके बीचमें कोई और अर्थ विवक्षित नहीं है—यह दिखानेके लिये अन्तमें 'स एष नेति नेति' इत्यादि उपसंहार किया गया है। |
ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४१
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४१ |
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| यस्मात् प्रकारशतेनापि निरूप्यमाणे तत्त्वे नेति नेत्यात्मैव निष्ठा नान्येोपलभ्यते तर्केण वागमेन वा, तस्मादेतदेवामृतत्वसाधनं यदेतन्नेति नेत्यात्मपरिज्ञानं सर्वसंन्यासश्चेत्येतमर्थमुपसंजिहीर्षन्नाह— | चूँकि तत्त्वका सैकड़ों प्रकारसे निरूपण होनेपर भी उसका पर्यवसान 'नेति नेति' इस प्रकारसे निरूपण किये गये आत्मामें ही है, युक्ति अथवा शास्त्रसे कहीं अन्यत्र उसका तात्पर्य नहीं देखा जाता, अतः यह जो 'नेति नेति' इस प्रकार आत्माका परिज्ञान होना तथा सम्पूर्ण कर्मोंका संन्यास करना है, वही अमृतत्वका साधन है—इस प्रकार इस अर्थका उपसंहार करनेकी इच्छासे याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— |
यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरँ रसयते तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरँ शृणोति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरँ स्पृशति तदितर इतरं विजानाति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् तत्केन कं जिघ्रेत् तत् केन कँ रसयेत् तत् केन कमभिवदेत् तत् केन कँ शृणुयात् तत् केन कं मन्वीत तत् केन कँ स्पृशेत् तत् केन कं विजानीयाद् येनेदँ सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् स एष नेति नेत्यात्मागृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यति विज्ञातारमरे केन विजानीयादित्युक्तानुशासनासि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यो विजहार ॥ १५ ॥
११४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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जहाँ [अविद्यावस्थामें] द्वैत-सा होता है, वहीं अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको सूँघता है, अन्य अन्यका रसास्वादन करता है, अन्य अन्यका अभिवादन करता है, अन्य अन्यको सुनता है, अन्य अन्यका मनन करता है, अन्य अन्यका स्पर्श करता है और अन्य अन्यको विशेषरूपसे जानता है। किंतु जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे सूँघे, किसके द्वारा किसका रसास्वादन करे, किसके द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा किसे सुने, किसके द्वारा किसका मनन करे, किसके द्वारा किसका स्पर्श करे और किसके द्वारा किसे जाने ? जिसके द्वारा पुरुष इस सबको जानता है, उसे किस साधनसे जाने ? वह यह 'नेति-नेति' इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है—उसका ग्रहण नहीं किया जाता, अशीर्य है—उसका विनाश नहीं होता, असङ्ग है—आसक्त नहीं होता, अबद्ध है—वह व्यथित और क्षीण नहीं होता। हे मैत्रेयि ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने ? इस प्रकार तुझे उपदेश कर दिया गया। अरी मैत्रेयि ! निश्चय जान, इतना ही अमृतत्व है, ऐसा कहकर याज्ञवल्क्यजी परिव्राजक (संन्यासी) हो गये ॥ १५ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| एतावदेतावन्मात्रं यदेतन्नेति नेत्यद्वैतात्मदर्शनमिदं चान्यसहकारिकारणनिरपेक्षमेवारे मैत्रेय्यमृतत्वसाधनम् । यत् पृष्टवत्यसि 'यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूह्यमृतत्वसाधनम्' इति, तदेतावदेवेति विज्ञेयं त्वयेति हैवं किलामृतत्वसाधनमात्मज्ञानं प्रियायै भार्यायै उक्त्वा याज्ञवल्क्यः किं कृतवान् ? यत् पूर्वं प्रतिज्ञातं | हे मैत्रेयि ! 'एतावत्'—बस, इतना ही जो कि यह 'नेति नेति' इस प्रकार अद्वैत आत्माका साक्षात्कार करना है, वही किसी दूसरे सहकारी कारणकी अपेक्षासे रहित अमृतत्वका साधन है। तूने जो पूछा था कि श्रीमान् जो अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें,' सो वह साधन इतना ही है—ऐसा तुझे जानना चाहिये। इस प्रकार अपनी प्रिया भार्याको यह अमृतत्वका साधनरूप आत्मज्ञान बतलाकर याज्ञवल्क्यने क्या किया ? जिसकी उन्होंने पहले प्रतिज्ञा |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४३ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४३ |
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| संस्कृत मूल (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रव्रजिष्यन्नस्मीति तच्चकार विजहार प्रव्रजितवानित्यर्थः । | की थी कि मैं परिव्राजक (संन्यासी) होनेवाला हूँ वही किया अर्थात् परिव्राजक हो गये । |
| परिसमाप्ता ब्रह्मविद्या संन्यासपर्यवसाना । एतावानुपदेशः, एतद् वेदानुशासनम्, एषा परमनिष्ठा, एष पुरुषार्थकर्तव्यतान्त इति । | इस प्रकार जिसका संन्यासमें पर्यवसान हुआ है, वह ब्रह्मविद्या समाप्त हुई । इतना ही उपदेश है, यही वेदकी आज्ञा है, यही परमनिष्ठा है और यही पुरुषार्थ अर्थात् कर्तव्यताका अन्त है । |
| इदानीं विचार्यते शास्त्रार्थशास्त्रार्थपरामर्शो विवेकप्रतिपत्तये । मिथोविरुद्धवच- यत आकुलानि हि नोपन्यासश्च वाक्यानि दृश्यन्ते—<br>“यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात्”<br>“यावज्जीवं दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत” “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” (ईश० २) “एतद् वै जरामर्यं सत्रं यदग्निहोत्रम्” (महानारा० २५ । १) इत्यादीन्येकाश्रम्यज्ञापकानि, अन्यानि चाश्रमान्तरप्रतिपादकानि वाक्यानि—<br>“विदित्वा व्युत्थाय प्रव्रजन्ति”<br>“ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद् गृहाद् वनी भूत्वा प्रव्रजेत्” (जाबालोप० ४) “यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा” | अब शास्त्रके तात्पर्यका विवेकज्ञान होनेके लिये विचार किया जाता है, क्योंकि परस्परविरोधी वाक्य देखे जाते हैं— “जीवनपर्यन्त अग्निहोत्र करे”, “जीवनपर्यन्त दर्शपूर्ण-मासद्वारा यजन करे”, “इस लोकमें कर्म करते हुए ही सौ वर्षतक जीवित रहनेकी इच्छा करे”, “यह जो अग्निहोत्र है, जरामरणपर्यन्त होनेवाला सत्र है” इत्यादि वाक्य गार्हस्थ्यरूप एक ही आश्रमके ज्ञापक हैं और इनके सिवा दूसरे वाक्य अन्य आश्रमके प्रतिपादक हैं— “ज्ञान होनेपर गृहस्थाश्रमसे ऊँचे उठकर परिव्राजक हो जाते हैं”, “ब्रह्मचर्य समाप्त करके गृहस्थाश्रमी बने और गृहस्थसे वानप्रस्थ होकर परिव्राजक हो जाय”, “अथवा इसके विपरीत ब्रह्मचर्यसे, गृहसे या वनसे ही परिव्राजक |
१६४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| १६४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| (जाबालोप० ४) इति "द्वावेव पन्थानावतुनिष्क्रान्ततरौ भवतः क्रियापथश्चैव पुरस्तात् संन्यासश्च तयोः संन्यास एवातिरेचयति" इति "न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः" (महानारा० १०।५) इत्यादीनि। <br><br> तथा स्मृतयश्च—"ब्रह्मचर्यवान् प्रव्रजति", अविशीर्णब्रह्मचर्यो यमिच्छेत् तमावसेत्" तस्याश्रमविकल्पमेके ब्रुवते" <br><br> तथा—"वेदानधीत्य ब्रह्मचर्येण पुत्रपौत्रानिच्छेत् पावनार्थं पितॄणाम्। अग्नीनाधाय विधिवच्चेष्टयज्ञो वनं प्रविश्याथ मुनिर्बुभूषेत् ॥" "प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम्। आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात् ॥" इत्याद्याः। | हो जाय," ये "दो ही मार्ग अभ्युदय और निःश्रेयसके प्रधान साधन हैं, पहले कर्ममार्ग और फिर संन्यास, उनमें संन्यासहीको श्रुति अधिक ठहराती है", "कर्मसे, प्रजासे अथवा धनसे नहीं, किन्हीं-किन्हींने एकमात्र त्यागसे ही अमृतत्व प्राप्त किया है" इत्यादि। <br><br> इसी प्रकार "ब्रह्मचर्यवान् पुरुष परिव्राजक होता है", "जिसका ब्रह्मचर्य खण्डित नहीं हुआ है, वह जिस आश्रममें चाहे उसीमें निवास करे" "कोई-कोई उसके लिये आश्रमका विकल्प बतलाते हैं"¹ तथा "ब्रह्मचर्यके द्वारा वेदाध्ययन कर फिर पितृगणका उद्धार करनेके लिये पुत्र-पौत्रोंकी इच्छा करे और विधिवत् अग्न्याधान कर यज्ञानुष्ठान करनेके अनन्तर वनमें प्रवेश कर [अर्थात् वानप्रस्थ होकर] मुनि (संन्यासी) होनेकी इच्छा करे।।" "जिसमें सर्वस्व दक्षिणामें दे दिया जाता है, ऐसी प्राजापत्य-इष्टि (यज्ञ) करके अग्नियोंको आत्मामें स्थापित कर ब्राह्मणको घरसे निकल [कर संन्यासी हो] जाना चाहिये" इत्यादि स्मृतियाँ भी हैं। |
१. अर्थात् वह क्रमशः एक आश्रमसे दूसरेमें जाय अथवा बिना क्रमके ब्रह्मचर्यसे ही संन्यासी हो जाय। ये तीनों स्मृतिवाक्य आश्रमका विकल्प बतलानेवाले हैं। आगेके वाक्य क्रम सूचित करते हैं; इस प्रकार इनमें परस्परविरोध है।
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११४५
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११४५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| एवं व्युत्थानविकल्पक्रमयथेष्टाश्रमप्रतिपत्तिप्रतिपादकानि हि श्रुतिस्मृतिवाक्यानि शतश उपलभ्यन्त इतरेतरविरुद्धानि। आचारश्च तद्विदाम्, विप्रतिपत्तिश्च शास्त्रार्थप्रतिपत्तॄणां बहुविदामपि। अतो न शक्यते शास्त्रार्थो मन्दबुद्धिभिर्विवेकेन प्रतिपत्तुम्। परिनिष्ठितशास्त्रन्यायबुद्धिभिरेव ह्येषां वाक्यानां विषयविभागः शक्यतेऽवधारयितुम्। तस्मादेषां विषयविभागज्ञापनाय यथाबुद्धिसामर्थ्यं विचारयिष्यामः। | इस प्रकार व्युत्थानके विकल्प, क्रम और यथेष्ट आश्रमोंमें प्रवेश करनेका प्रतिपादन करनेवाले एक-दूसरेसे विरुद्ध सैकड़ों श्रुति-वचन और स्मृति-वाक्य देखे जाते हैं। श्रुति-स्मृतियोंके ज्ञाताओंके आचार भी विभिन्न हैं तथा [जैमिनिप्रभृति] शास्त्रमर्मज्ञोंमें बहुज्ञ होनेपर भी मतभेद देखा जाता है। अतः मन्द-बुद्धि पुरुषोंके लिये विवेकपूर्वक शास्त्रका मर्म समझना असम्भव है। जिनकी बुद्धि शास्त्र और युक्तिमें सब प्रकार निष्णात है, वे ही इन वाक्योंके विषयविभागका निर्णय कर सकते हैं। अतः इनके विषय-विभागको सूचित करनेके लिये हम अपनी बुद्धि और सामर्थ्यके अनुसार विचार करेंगे। |
| [पूर्वपक्षोत्थापनम्]<br>'यावज्जीव' श्रुत्यादिवाक्यानामन्यार्थासम्भवात् क्रियावसान एव वेदार्थः। "तं यज्ञपात्रैर्दहन्ति" इत्यन्त्यकर्मश्रवणाज्जरामर्यश्रवणाच्च लिङ्गाच्च "भस्मान्तँ शरीरम्" (बृ० उ० ५। १५। १) इति | पूर्व०—'यावज्जीवन अग्निहोत्र करे' इत्यादि वाक्योंका कोई दूसरा अर्थ न हो सकनेके कारण वेदका तात्पर्य कर्ममें ही समाप्त होनेवाला है। यह बात "उस (अग्निहोत्री) को यज्ञपात्रोंके सहित भस्म करते हैं" इस प्रकार अग्निहोत्रीके अन्त्येष्टि-कर्ममें यज्ञपात्रकी आवश्यकताका श्रवण होनेसे, जरा-मरणपर्यन्त अग्निहोत्रका विधान होनेसे तथा "शरीर भस्मान्त है" ऐसा गार्हस्थ्यसूचक लिङ्ग होनेसे भी ज्ञात |
११४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
११४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| न हि पारिव्राज्यपक्षे भस्मान्तता शरीरस्य स्यात्। स्मृतिश्च—<br>“निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः। तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिञ्ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित्॥” इति। समन्त्रकं हि यत् कर्म वेदेनेह विधीयते तस्य श्मशानान्ततां दर्शयति स्मृतिः। अधिकाराभावप्रदर्शनाच्चात्यन्तमेव श्रुत्यधिकाराभावोऽकर्मिणो गम्यते। अग्न्युद्वासनापवादाच्च “वीरहा वा एष देवानां योऽग्निमुद्वासयते” इति। | होती है। संन्यास-पक्षमें तो शरीर-की भस्मान्तता हो ही नहीं सकती*। इसके सिवा “जिसके गर्भाधानसे लेकर श्मशानपर्यन्त सभी संस्कारोंका विधान मन्त्रों-द्वारा बताया गया है, उसीका इस शास्त्रमें अधिकार समझना चाहिये, किसी दूसरेका नहीं” ऐसी स्मृति भी है। यहाँ वेदने जिस कर्मका मन्त्रपूर्वक विधान किया है, वह कर्म श्मशानपर्यन्त होता है, ऐसा स्मृति प्रदर्शित कर रही है। अधिकारका अभाव प्रदर्शित करने-से तो कर्म न करनेवालेका श्रुतिमें सर्वथा ही अधिकार नहीं है—ऐसा जाना जाता है। इसके सिवा “जो अग्निका उच्छेद करता है, वह देवताओंका वीरहा है” इस प्रकार अग्न्युच्छेदकी निन्दा करनेसे भी यही सिद्ध होता है। |
| [तत्राक्षेपः] ननु व्युत्थानादिविधानाद्वैकल्पिकं क्रियावसानत्वं वेदार्थस्य। | सिद्धान्ती—[किंतु हमारे विचार-में तो] व्युत्थानादिका विधान होनेके कारण वेदार्थका क्रियामें समाप्त होना वैकल्पिक है। |
| [व्युत्थानादिश्रुतीनाम-न्यार्थत्वप्रतिपादनम्] न, अन्यार्थत्वाद् व्युत्थानादिश्रुतीनाम्। “यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति” “यावज्जीवं दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत”, इत्येवमादीनां | **पूर्व०—**नहीं, क्योंकि व्युत्था-नादि श्रुतियोंका तात्पर्य दूसरा ही है। [उसीको विशद करते हैं—] क्योंकि “जीवनपर्यन्त अग्निहोत्र करे” “जीवन-पर्यन्त दर्श-पूर्णमासद्वारा यजन करे” इत्यादि श्रुतियाँ जीवनमात्र- |
* क्योंकि संन्यासीके शरीरका दाहसंस्कार नहीं होता।
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११४७
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११४७
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| श्रुतीनां जीवनमात्रनिमित्तत्वाद् यदा न शक्यतेऽन्यार्थता कल्पयितुं तदा व्युत्थानादिवाक्यानां कर्मानधिकृतविषयत्वसंभवात् । | निमित्तवाली होनेके कारण, जब कोई अन्य तात्पर्य होनेकी कल्पना ही नहीं की जा सकती, तो व्युत्थानादि वाक्योंका कर्मके अनधिकारियोंके विषयमें होना सम्भव है। |
| “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः” (ईशा० २) इति च मन्त्रवर्णात् “जरया वा ह्येवास्मान्मुच्यते मृत्युना वा” इति च जरामृत्युभ्यामन्यत्र कर्मवियोगच्छिद्रासंभवात् कर्मिणां श्मशानान्तत्वं न वैकल्पिकम् । काणकुब्जादयोऽपि कर्मण्यनधिकृता अनुग्राह्या एव श्रुत्येति व्युत्थानाद्याश्रमान्तरविधानं नानुपपन्नम् । | “कर्म करते हुए ही सो वर्ष जीनेकी इच्छा करे” इस मन्त्रवर्णसे भी यही सिद्ध होता है; तथा “इससे वृद्धावस्थाके कारण मुक्त होता है अथवा मृत्युसे” इस प्रकार जरा और मृत्युके सिवा अन्यत्र कर्मका त्याग अथवा अवकाश सम्भव न होनेसे कर्मियोंका श्मशानान्त होना वैकल्पिक नहीं है। कर्मके अनधिकारी काने और कूबड़े लोगोंपर भी श्रुतिको अनुग्रह करना ही है, इसलिये उनके लिये व्युत्थानादि अन्य आश्रमोंका विधान करना अयुक्त नहीं है। |
| पारिव्राज्यक्रमविधानस्यानवकाशत्वमिति चेत् । | सिद्धान्ती—तो फिर [ ब्रह्मचर्यसे लेकर ] पारिव्राज्य (संन्यास) तकके आश्रमोंका क्रमविधान निरवकाश¹ होगा ! |
| न; विश्वजित्सर्वमेधयोर्वि- | पूर्व०—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि विश्वजित् और सर्वमेध यज्ञोंमें जीवन- |
१. अर्थात् उस विधिके पालनका अवसर न मिलनेसे श्रुतिमें उसका विधान व्यर्थ होगा।
११४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| पारिव्राज्यक्रमविधानस्यानवकाशत्ववारणम्<br><br>—जीवविध्यपवादत्वात् । यावज्जीवाग्निहोत्रादिविधेर्विश्वजित्सर्वमेधयोरेवापवादः, तत्र च क्रमप्रतिपत्तिसम्भवः 'ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद् गृहाद् वनी भूत्वा प्रव्रजेत्' इति । | भर अग्निहोत्र करनेकी विधिका यह क्रमविधायक वचन अपवाद (बाधक) है [ अतः व्यर्थ नहीं है ] । यावज्जीवन अग्निहोत्रादिकी जो विधि है, उसका विश्वजित् और सर्वमेध यज्ञमें ही अपवाद है¹ इसलिये वहाँ 'ब्रह्मचर्य समाप्त करके गृहस्थ बने और गृहस्थसे वनवासी होकर परिव्राजक हो' ऐसी आश्रमोंकी क्रमशः प्रतिपत्ति सम्भव है । | | विरोधानुपपत्तेः— न ह्येवंविषयत्वे पारिव्राज्यक्रमविधानवाक्यस्य कश्चिद् विरोधः क्रमप्रतिपत्तेः । अन्यविषयपरिकल्पनायां तु यावज्जीवविधानश्रुतिः स्वविषयात् संकोचिता स्यात् । क्रमप्रतिपत्तेस्तु विश्वजित्सर्वमेधविषयत्वान्न कश्चिद् बाधः । | इस प्रकार उन वाक्योंमें कोई विरोध नहीं आ सकता—पारिव्राज्यके क्रमका विधान करनेवाले वाक्यका ऐसा विषय मान लेनेपर क्रमप्रतिपत्तिका कोई विरोध नहीं रहता । उसका कोई अन्य विषय कल्पना करनेपर तो यावज्जीवन कर्मका विधान करनेवाली श्रुतिका अपने विषयसे संकोच कर देना होगा । क्रमप्रतिपत्तिका विषय तो विश्वजित् और सर्वमेध यज्ञ हैं, इसलिये उसका कोई बाध नहीं होता । | | परमतनिराकरणपूर्वकं स्वमतस्थापनम्<br><br>न, आत्मज्ञानस्यामृतत्वहेतुत्वाभ्युपगमात् । यत् तावत् 'आत्मेत्येवो- | **सिद्धान्ती—**ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि आत्मज्ञानको अमृतत्वका हेतु माना गया है । 'आत्मेत्येवोपासीत' |
१. क्योंकि विश्वजित् और सर्वमेध—इन दो यज्ञोंमें सर्वस्व दान कर दिया जाता है, इसलिये फिर अग्निहोत्रादि कर्मकी सामग्री न रहनेसे उनका होना असम्भव हो जाता है। अतः उन यज्ञोंमेंसे किसीका अनुष्ठान करनेवालेके लिये ही अन्याश्रममें जानेकी विधि है—ऐसा इसका तात्पर्य है।
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४९ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११४९ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| पासीत' इत्यारभ्य 'स एष नेति नेति' एतदन्तेन ग्रन्थेन यदुपसंहृतमात्मज्ञानं तदमृतत्वसाधनम्—इत्यभ्युपगतं भवता । | यहाँसे लेकर 'स एष नेति नेति' यहाँतकके ग्रन्थसे जिस आत्मज्ञानका उपसंहार किया गया है, वह अमृतत्वका साधन है—ऐसा आपने स्वीकार किया है। |
| तत्र 'एतावदेवामृतत्वसाधनम्, अन्यनिरपेक्षम्' इत्येतन्न मृष्यते । | पूर्व०—किंतु वहाँ अन्य किसी (कर्म आदि) की अपेक्षासे रहित केवल ज्ञान ही अमृतत्वका साधन है—यह कथन हम नहीं सह सकते ! |
| तत्र भवन्तं पृच्छामि किमर्थमात्मज्ञानं मर्षयति भवानिति ? | सिद्धान्ती—तो मैं श्रीमान्से पूछता हूँ कि आप आत्मज्ञानको किसलिये सहन करते हैं ? |
| शृणु तत्र कारणम्—यथा स्वर्गकामस्य स्वर्गप्राप्त्युपायमजानतोऽग्निहोत्रादि स्वर्गप्राप्तिसाधनं ज्ञापयति, तथेहाप्यमृतत्वप्रतिपित्सोरमृतत्वप्राप्त्युपायमजानतः "यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहि" इत्येवमाकाङ्क्षितममृतत्वसाधनम् "एतावदरे" इत्येवमादौ वेदेन ज्ञाप्यत इति । | पूर्व०—इसमें जो कारण है वह सुनिये—जिस प्रकार स्वर्गप्राप्तिका उपाय न जाननेवाले स्वर्गकामी पुरुषको श्रुति अग्निहोत्रादि स्वर्गप्राप्तिके साधन बतलाती है, उसी प्रकार यहाँ भी अमृतत्वप्राप्तिका साधन न जाननेवाले अमृतत्वप्राप्तिके अभिलाषीको वेदके द्वारा "एतावदरे खल्वमृतत्वम्" इत्यादि मन्त्रोंमें "यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहि" इत्यादि प्रकारसे इच्छा किये हुए अमृतत्वके साधनका बोध कराया जाता है। |
| एवं तर्हि यथा ज्ञापितमग्निहोत्रादि स्वर्गसाधनमभ्युपगम्यते | सिद्धान्ती—इस प्रकार तो, जैसे श्रुतिके द्वारा ज्ञात कराये हुए अग्निहोत्रादि स्वर्गके साधन माने जाते हैं, |
११५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ११५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| तथेहाप्यात्मज्ञानम्; यथा ज्ञाप्यते तथाभूतमेवामृतत्वसाधनमात्मज्ञानमभ्युपगन्तुं युक्तम्; तुल्यप्रामाण्यादुभयत्र । <br><br> यद्येवं किं स्यात् ? <br><br> सर्वकर्महेतूपमर्दकत्वादात्मज्ञानस्य विद्योद्भवे कर्मनिवृत्तिः स्यात् । दाराग्निसम्बद्धानां तावदग्निहोत्रादिकर्मणां भेदबुद्धिविषयसम्प्रदानकारकसाध्यत्वम् । अन्यबुद्धिपरिच्छेद्यां ह्यग्न्यादिदेवतां सम्प्रदानकारकभूतामन्तरेण न हि तत् कर्म निर्वर्त्यते । यया हि सम्प्रदानकारकबुद्ध्या सम्प्रदानकारकं कर्मसाधनत्वेनोपदिश्यते, सेह विद्यया निवर्त्यते— “अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स 'वेद'” ( बृ० उ० १ । ४ । १०) “देवास्तं परादुर्येऽन्यत्रात्मनो देवान् | उसी प्रकार यहाँ आत्मज्ञान भी समझना चाहिये। जिस प्रकार ज्ञान कराया गया है, उसी प्रकार आत्मज्ञानको अमृतत्वका साधन मानना उचित है; क्योंकि श्रुतिका प्रामाण्य दोनों जगह समान है। <br><br> पूर्व०-यदि ऐसा माना जाय तो इससे क्या सिद्ध होगा ? <br><br> सिद्धान्ती—आत्मज्ञान कर्मके सम्पूर्ण हेतुओंका निवर्तक है, इसलिये ज्ञानोदय होनेपर कर्मकी निवृत्ति हो जायगी। पत्नी और अग्निसे सम्बद्ध जो अग्निहोत्रादि कर्म हैं, वे भेदबुद्धिके विषय ¹सम्प्रदानकारकद्वारा साध्य हैं। अन्य बुद्धिसे परिच्छेद्य एवं सम्प्रदानकारकभूता अग्नि आदि देवताके बिना वह कर्म निष्पन्न नहीं हो सकता और जिस सम्प्रदान-कारक बुद्धिसे सम्प्रदानकारक कर्मके साधनरूपसे उपदेश किया जाता है, वह इस ज्ञानावस्थामें ज्ञानसे निवृत्त हो जाती है; जैसा कि “वह अन्य है मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है, वह नहीं जानता”, “जो देवताओंको अपनेसे भिन्न समझता है, देवता उसे परास्त कर देते हैं, |
१. जिसके उद्देश्यसे कुछ दिया जाता है; उसे सम्प्रदानकारक कहते हैं। अग्निसाध्य कर्मोंमें अग्निके उद्देश्यसे आहुति दी जाती है, इसलिये अग्निमें सम्प्रदान-कारकत्व है; अतः वह कर्म सम्प्रदानकारकसाध्य कहा जाता है।